Bihar election : बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के पहले चरण में इस बार रिकॉर्ड तोड़ मतदान हुआ है. चुनाव आयोग के मुताबिक, छह नवंबर को हुए मतदान में 18 जिलों की 121 सीटों पर 65.8 प्रतिशत वोटिंग दर्ज की गई. यह न सिर्फ़ 2020 के विधानसभा चुनाव बल्कि 1952 से अब तक हुए सभी लोकसभा और विधानसभा चुनावों में भी सबसे अधिक है. इस चरण में तीन करोड़ 75 लाख से अधिक मतदाताओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया.
बिहार में पहली बार इतना मतदान
भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने इस बार के मतदान को ऐतिहासिक करार दिया. आंकड़ों के अनुसार, 1951-52 से लेकर 2020 तक बिहार विधानसभा चुनावों में मत प्रतिशत केवल तीन बार ही 60 प्रतिशत से ऊपर गया था जिसमें 1990 में- 62.04%, 1995 में-61.79% और 2000 में- 62.57%. लेकिन 2025 में यह आंकड़ा सीधे 64.66 प्रतिशत पर पहुंच गया. साल 2020 के पहले चरण में सिर्फ़ 56.1% मतदान हुआ था, यानी इस बार लगभग आठ प्रतिशत की वृद्धि हुई है. हालांकि उस समय पहले चरण में 71 सीटों पर मतदान हुआ था, जबकि इस बार 121 सीटों पर वोट डाले गए.
मतदान बढ़ने की क्या है बड़ी वजह
मतदान प्रतिशत बढ़ने को लेकर विशेषज्ञों के बीच अलग अलग राय हैं. कई चुनाव विश्लेषक मानते हैं कि इसकी एक प्रमुख वजह SIR (Special Intensive Revision) यानी विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया भी हो सकती है. उनका तर्क है कि इस प्रक्रिया के तहत मृत, विस्थापित या गैर-मौजूद मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाए गए. आंकड़ों के मुताबिक, जून 2025 तक बिहार में 7.89 करोड़ मतदाता थे, लेकिन एसआईआर के बाद 30 सितंबर को जारी अंतिम सूची में मतदाता घटकर 7.42 करोड़ रह गए , यानी की लगभग 6% की कमी हुई . तो चुनाव विश्लेषकों का कहना है कि जब निष्क्रिय या फर्जी वोट हटे, तो सक्रिय मतदाताओं का प्रतिशत स्वाभाविक रूप से बढ़ा.
इसके साथ साथ विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि एसआईआर के बाद मतदाताओं के एक हिस्से में उत्सुकता और सतर्कता दोनों बढ़ी हैं. लोग अब वोट डालकर अपनी आधिकारिक मौजूदगी साबित करना चाहते हैं. उनके मुताबिक, ग्रामीण इलाकों में यह धारणा भी बनी कि अगर नाम मतदाता सूची से गायब हो गया या वोट नहीं डाला, तो सरकार की कल्याणकारी योजनाओं का लाभ बंद हो सकता है. इस डर ने भी बड़ी संख्या में लोगों को बूथ तक पहुंचाया.
एंटी इनकम्बेंसी फैक्टर भी अहम
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि इस बार मतदान प्रतिशत बढ़ने के पीछे एंटी इनकम्बेंसी वेव (विरोधी लहर) भी एक बड़ा कारण हो सकता है. उनका कहना है कि प्रो-इनकम्बेंसी यानी सरकार के पक्ष में लहर आम तौर पर इतनी बड़ी संख्या में मतदाताओं को बाहर नहीं निकाल पाती.
मतदान के जेंडर ब्रेकअप से खुलेगा असली राज
हालांकि अब तक चुनाव आयोग ने यह आंकड़ा जारी नहीं किया है कि कुल 64.66% मतदान में पुरुष और महिला मतदाताओं की हिस्सेदारी कितनी रही. विशेषज्ञों का मानना है कि यह ब्रेकअप सामने आने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि वोटिंग प्रतिशत बढ़ने में किस वर्ग ने निर्णायक भूमिका निभाई. बिहार में इस बार के पहले चरण के रिकॉर्ड मतदान ने न सिर्फ़ राजनीतिक दलों को चौंकाया है बल्कि विश्लेषकों के लिए भी कई नए सवाल खड़े किए हैं. क्या यह मतदाता जागरूकता का परिणाम है, एसआईआर की सख्ती का असर, या फिर सत्ता-विरोध की लहर का संकेत, इसका जवाब आने वाले नतीजों में छिपा है.