दूसरे चरण में कौन कहां मजबूत किसकी क्या है कमजोरी… ? बिहार चुनाव का फाइनल राउंड तय करेगा सत्ता का समीकरण

Bihar second phase voting : बिहार विधानसभा चुनाव के दूसरे चरण का प्रचार अभियान रविवार शाम थम गया है. अब बारी मतदाताओं की है, जो मंगलवार (11 नवंबर) को 20 जिलों की 122 सीटों पर मतदान करेंगे. इस चरण में 1302 उम्मीदवार मैदान में हैं, जिनकी किस्मत का फैसला 3.70 करोड़ से अधिक मतदाता करेंगे. यह चरण निर्णायक माना जा रहा है, क्योंकि इसी के बाद 14 नवंबर को नतीजे घोषित किए जाएंगे. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व में एनडीए सत्ता बचाने के लिए जोर आज़माइश में है, जबकि तेजस्वी यादव की अगुवाई में महागठबंधन सत्ता में वापसी के लिए बेताब है. दोनों गठबंधन अपने-अपने सामाजिक समीकरणों और राजनीतिक रणनीतियों पर दांव लगा रहे हैं.

क्या है  एनडीए की ताकत और उसकी कमजोरी

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार एनडीए की सबसे बड़ी ताकत हैं. सुशासन बाबू की छवि और उनके विकास कार्यों का हवाला एनडीए बार-बार देता रहा है. इसके अलावा बीजेपी और जेडीयू दोनों ही संगठित कार्यकर्ताओं और संघ परिवार से जुड़े संगठनों के सहयोग से चुनावी मैदान में मजबूती से डटे हैं. जिसका फायदा भी होता दिख रहा है. एनडीए सरकार ने सामाजिक सुरक्षा पेंशन, महिला सहायता योजनाएं और बुनियादी ढांचे के विकास जैसी कई कल्याणकारी योजनाओं को आगे रखकर जनता को साधने की कोशिश की है. जिसका असर पहले चरण में खूब दिखा..तो अब दूसरे चरण में भी इसकी उम्मीद है.नीतीश कुमार लगभग दो दशक से बिहार की राजनीति के केंद्र में हैं, जिससे मतदाताओं में सत्ता-विरोधी भावनाएं उभर सकती हैं. हालांकि जमीनी तौर पर ऐसा कुछ दिख नहीं रहा है. रोजगार, पलायन, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी सुविधाओं का ना होना अपना असर दिखा सकता हैं. बेरोजगारी, कानून-व्यवस्था और सामाजिक न्याय जैसे मुद्दों पर महागठबंधन का हमला एनडीए की मुश्किलें बढ़ा सकता है तो प्रशांत किशोर की चुनावी मौजूदगी सवर्ण वोट बैंक में सेंध लगा सकती है, जिससे एनडीए को नुकसान का डर है.

महागठबंधन की ताकत और कमजोरी

मुस्लिम-यादव वोट बैंक महागठबंधन की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत है. करीब 32% वोट शेयर के साथ यह समीकरण कई सीटों पर निर्णायक हो सकता है, तो युवाओं में तेजस्वी की लोकप्रियता: तेजस्वी यादव की छवि एक युवा और ऊर्जावान नेता की बनी है. बेरोजगारी और शिक्षा जैसे मुद्दों पर उनकी पकड़ युवाओं को आकर्षित कर रही है. हालांकि कांग्रेस और आरजेडी के बीच सीट बंटवारे से लेकर रणनीति तक असहमति दिखी है. इससे अभियान की एकजुटता पर असर पड़ सकता है. बिहार में कांग्रेस के पास प्रभावी स्थानीय चेहरों का अभाव है.

इसकी वजह से महागठबंधन के भीतर कांग्रेस सहायक दल की भूमिका में सिमटी हुई दिखती है. इसके साथ साथ उम्मीदवार चयन और प्रचार रणनीति में मतभेद से संगठनात्मक अनुशासन कमजोर हो सकता है. दलित-अति पिछड़े वोट बैंक पर एनडीए की मजबूत पकड़ महागठबंधन के लिए चुनौती बनी हुई है.

दूसरे चरण का यह मतदान बिहार की सत्ता की दिशा तय करेगा. एक ओर नीतीश कुमार और पीएम मोदी के नाम पर एनडीए अपनी उपलब्धियों के सहारे मैदान में है, तो दूसरी ओर तेजस्वी यादव नेतृत्व, बेरोजगारी और सामाजिक न्याय जैसे मुद्दों पर जनसमर्थन जुटाने की कोशिश में हैं. अब देखना यह होगा कि मंगलवार को जनता किस पर भरोसा जताती है.

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