M factor in Bihar elections : जातिय राजनीति के गढ़ में नीतीश कुमार का पैंतरा अब काम करता दिख रहा है. दरअसल बिहार की राजनीति हमेशा से समीकरणों की राजनीति रही है. राजनीतिक दल कभी एम–वाई फैक्टर (मुस्लिम–यादव) तो कभी EBC की सीढ़ी चढ़ कर सत्ता की कुर्सी तक पहुंचे मगर अब बिहार विधानसभा चुनाव में एक नया एम फैक्टर उभरा है -महिला. जो लगभग सत्ता सुनिश्चित करने की ताकत रखती है. महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश जैसे राज्य इसके बड़े उदाहरण है. अब सवाल यही है कि क्या यह महिला फैक्टर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सियासी थकान का तोड़ बन पाएगा?
चुपचाप वोट देने वाली सबसे बड़ी ताकत
पिछले तीन चुनावों में महिलाओं की भागीदारी लगातार बढ़ी है. 2010 में जब नीतीश कुमार ने पंचायत चुनावों में 50% आरक्षण और शराबबंदी जैसे फैसले किए, तब से ग्रामीण इलाक़ों में महिला मतदाताओं का झुकाव बड़े पैमाने पर जेडीयू की ओर गया. 2020 के विधानसभा चुनाव में महिला मतदान प्रतिशत पुरुषों से लगभग 6% अधिक रहा , यह संकेत है कि बिहार की राजनीति में महिलाएं साइलेंट वोटर बन कर निर्णायक खिलाड़ी साबित हो रही हैं.
नीतीश की नीतियों का असर
महिलाओं को स्वावलंबन की दिशा में आगे बढ़ाने का दावा नीतीश कुमार की राजनीति की सबसे बड़ी पहचान रहा है. मुख्य मंत्री कन्या उत्थान योजना, साइकिल योजना और शराबबंदी और अब दशहजारी इन सबने उन्हें एक महिलाओं के मसीहा के रूप में स्थापित किया. मगर इस बार समीकरण कुछ अलग हैं. शराबबंदी के कारण परिवारों में शांति तो आई, पर कई जगह इसका उल्टा असर भी दिखा, घरेलू हिंसा, अवैध शराब कारोबार और पुलिसिया सख्ती को लेकर असंतोष भी है. वहीं, महंगाई और बेरोज़गारी के मुद्दे पर महिला मतदाता अब भावनाओं से ज़्यादा रोजमर्रा की मुश्किलों से प्रभावित होती दिख रही हैं. हालांकि इसका खास असर होता नहीं दिख रहा.
गाँवों में स्व-सहायता समूहों (SHG) से जुड़ी महिलाएँ अब न केवल आत्मनिर्भर बनी हैं, बल्कि राजनीतिक रूप से भी जागरूक हैं. वे सिर्फ़ योजनाओं की घोषणाओं पर नहीं, बल्कि उनके ज़मीनी असर पर नज़र रखती हैं. महिलाएँ अब यह समझने लगी हैं कि मतदान सिर्फ़ सरकार चुनने का नहीं, अपनी प्राथमिकताओं को आवाज़ देने का साधन है.