Bihar election : बिहार विधानसभा चुनाव के रंग में इस बार एक ऐसी सियासी कहानी उभर रही है, जिसमें परिवार, विरासत और वफादारी तीनों आमने-सामने हैं। लालू प्रसाद यादव के दो बेटे तेजस्वी और तेज प्रताप न अब सिर्फ़ अलग-अलग पार्टियों के नेता नहीं, बल्कि एक-दूसरे के राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी भी बन चुके हैं।
तेजस्वी बनाम तेजप्रताप की जंग
जानकार बताते है कि तेजस्वी बनाम तेजप्रताप की जंग वैसे तो बहुत पहले शुरू हो गई थी लेकिन इसकी अधिकारी शुरूआत हुई..लालू यादव के उस फैसले से जिसके बाद पिता लालू यादव ने अपने बड़े बेटे को परिवार और पार्टि दोनों जगह से निष्कासित कर दिया. हालांकि अभी तक यह जंग एक तरफा दिख रहा था लेकिन फिर जब 16 अक्टूबर को तेज प्रताप यादव ने अपनी दिवंगत दादी मरछिया देवी की तस्वीर के साथ महुआ सीट से नामांकन दाखिल किया तो यह दोतरफा हो गया. जानकारी के लिए बता दें कि यह वही सीट है जहां से 2015 में उनके राजनीतिक सफर की शुरुआत हुई थी।लेकिन 2015 और 2025 में 10 साल का बहुत बड़ा अंतर है. लालू के बड़े लाल इस बार अकेले चल रहे हैं. नामांकन में भी उनके साथ परिवार का कोई नहीं था. अब इसके ठीक विपरित देखें तो एक दिन पहले ही उनके छोटे भाई और राजद नेता तेजस्वी यादव ने अपने माता-पिता और बहन मीसा भारती की मौजूदगी में राघोपुर से नामांकन दाखिल किया था। कभी एक ही मंच से लालू परिवार का प्रतिनिधित्व करने वाले दोनों भाई अब बिहार की दो राजनीतिक ध्रुवों का चेहरा हैं।
दो दिशाओं में बंटा लालू परिवार
तेजस्वी यादव इस चुनाव में राजद और महागठबंधन के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार हैं। उनका लक्ष्य नीतीश कुमार सरकार को सत्ता से हटाना और परिवर्तन लाना। तो तेज प्रताप यादव की लड़ाई राजनीतिक अस्तित्व की है। राजद से निष्कासन के बाद उन्होंने मई में टीम तेज प्रताप बनाई और फिर खुद को जनशक्ति जनता दल (जेजेडी) का अध्यक्ष घोषित किया। पार्टी ने 243 में से 43 सीटों पर उम्मीदवार उतारे हैं जो ज्यादातर यादव बहुल और राजद के पारंपरिक गढ़ों से है। तेज प्रताप के समर्थक इसे लालू की असली विरासत बताते हैं। तेज प्रताप खुद भी कहते हैं हरे झंडे वाला राजद नकली है, असली लालू जी की पार्टी हमारी है।
भाई बनाम भाई की चुनावी लड़ाई
लालू परिवार की बिरासत रही महुआ और राघोपुर की दोनों सीटें अब भाईयों की ताकत और भावनात्मक अपील की कसौटी बन चुकी हैं। तेजस्वी यादव ने महुआ में राजद प्रत्याशी मुकेश रोशन के समर्थन में रैली करते हुए बिना नाम लिए कहा कि पार्टी ही सब कुछ है। पार्टी रहेगी तो सब कुछ रहेगा। तो तेज प्रताप ने भी उसी तर्ज़ पर पलटवार किया और कहा कि लोकतंत्र में जनता सर्वोच्च है, कोई पार्टी या परिवार नहीं। महुआ मेरी कर्मभूमि है, यह पार्टी और परिवार से ऊपर है। तेज प्रताप की रैलियाँ छोटी और व्यक्तिगत हैं, जहां वे स्वच्छ राजनीति और सच्ची सेवा की बात करते हैं। जबकि तेजस्वी का अभियान हेलीकॉप्टर से लेकर जनसभाओं तक संगठित और रणनीतिक है जो महागठबंधन के नेताओं के साथ बेरोजगारी, शासन और बदलाव के मुद्दों पर केंद्रित है।
नुकसान महागठबंधन को या फायदा एनडीए को?
राजद के पास राज्यव्यापी संगठन, बूथ-स्तर की टीम और मुस्लिम-यादव वोटबैंक का ठोस आधार है। तेज प्रताप की पार्टी नई है जो सीमित संसाधन और निजी नेटवर्क पर आधारित। महुआ और आसपास की सीटों पर उनके लिए सहानुभूति लहर देखने को मिल रही है। यादव समुदाय का एक हिस्सा मानता है कि पार्टी से उनका निष्कासन कठोर था। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यादव मतदाताओं के भीतर यह विभाजन राजद के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है। कई यादव बहुल सीटों पर जेजेडी के उम्मीदवार मैदान में हैं। अगर यादव वोटों का छोटा हिस्सा भी तेज प्रताप की तरफ गया, तो इसका सीधा फायदा एनडीए को मिल सकता है, ख़ासकर उन सीटों पर जहां मुकाबला बेहद कड़ा है। लेकिन चुनाव नतीजे जो भी हों, ये चुनाव लालू परिवार की विरासत और वफादारी की परिभाषा बदलने वाला चुनाव बन चुका है। एक ओर लालू के वारिस के रूप में सत्ता के केंद्र में तेजस्वी यादव हैं, तो दूसरी ओर तेज प्रताप यादव अपनी पहचान और सम्मान की लड़ाई लड़ रहे हैं.