Bihar Politics: बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के नतीजों ने महागठबंधन और राजद (RJD) को जिस तरह झकझोरा है, वैसी कल्पना शायद पार्टी के किसी वरिष्ठ नेता ने भी नहीं की होगी। तेजस्वी यादव के नेतृत्व में लड़ी गई इस लड़ाई का परिणाम इतना निराशाजनक रहा कि पार्टी 50 सीट तक भी नहीं पहुंच सकी, यह एक ऐसा रिकॉर्ड जो 2015 और 2020 के प्रदर्शन की तुलना में बेहद कमजोर है। स्वाभाविक है कि अब हार के कारणों की पड़ताल होगी, बैठकें होंगी, और निष्कर्ष निकाले जाएंगे। इसी विमर्श के केंद्र में एक नाम सबसे अधिक चर्चा में है वो नाम है संजय यादव। जो तेजस्वी यादव के सबसे भरोसेमंद सलाहकार माने जाते हैं और बीते समय में राजद और खुद तेजस्वी की रणनीति के प्रमुख सूत्रधार जो पार्टी के भीतर विवादों के एक बड़े केंद्र बिंदु भी है.
कौन हैं संजय यादव
हरियाणा के महेंद्रगढ़ से आने वाले संजय यादव की पृष्ठभूमि तकनीकी और मैनेजमेंट की है, M.Sc (कंप्यूटर साइंस) और MBA। एक कारोबारी कंपनी में डेटा एनालिस्ट के रूप में करियर की शुरुआत की और धीरे-धीरे राजनीति की दुनिया में प्रवेश किया। दिल्ली के क्रिकेट मैदानों से लेकर राजनीतिक बैठक तक तेजस्वी से उनकी दोस्ती पुरानी बताई जाती है। 2012 के बाद तेजस्वी ने उन्हें अपनी विचार-मंडली में शामिल किया और फिर वही दोस्ती धीरे-धीरे पार्टी में पूरी तरह सक्रिय भूमिका तक पहुंच गई। आज वे RJD के राज्यसभा सांसद भी हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या वास्तव में संजय यादव RJD की हार का कारण बने है? या फिर वो सिर्फ एक सुविधाजनक बलि का बकरा हैं, जिसके ऊपर हार का ठीकरा फोड़ना मौजुदा समय में सबसे आसान है? उनको लेकर कहा जाता है कि उनकी सबसे बड़ी ताकत, डेटा एनालिसिस, मैनेजमेंट और चुनावी ब्रांडिंग है लेकिन उनकी सबसे बड़ी आलोचना राजनीतिक ज़मीन की सटीक समझ के अभाव को लेकर भी खूब होता है.
तेजस्वी की राजनीति के डीफॉल्ट सेंटर कैसे बने संजय यादव
बीते एक दशक में RJD की रणनीति, नेतृत्व शैली और मीडिया कम्युनिकेशन में जो बदलाव आया है, उसमें संजय यादव की भूमिका निर्णायक रही। 2015 के चुनाव में उन्होंने आरएसएस प्रमुख की आरक्षण संबंधी टिप्पणी को मुद्दा बनाकर अभियान को धार दी,जिसका तत्कालीन महागठबंधन को बड़ा लाभ मिला। इसके बाद लालू प्रसाद यादव के जेल जाने के दौरान पार्टी में एक खालीपन था। इसी दौर में संजय ने संगठन और नेतृत्व तक अपनी पकड़ मजबूत की और तेजस्वी के सबसे भरोसेमंद व्यक्ति के रूप में उभरे। 2025 के चुनाव में यह स्थिति पूरी तरह स्पष्ट दिखी, चाहे रैलियां हों, गठबंधन की बातचीत हो, या विचार-विमर्श की गुप्त बैठकें, तेजस्वी के ठीक बगल में सबसे अधिक दिखने वाला चेहरा कोई था तो वो संजय यादव।
2025 चुनाव में उनकी रणनीति फेल?
संजय यादव ने इस चुनाव में RJD को परंपरागत जातीय राजनीति से ऊपर उठाकर आधुनिक इश्यू-बेस्ड कैम्पेन की तरफ मोड़ने की कोशिश की। तेजस्वी लगातार यह संदेश देते रहे कि वे सिर्फ Y+M (यादव + मुस्लिम) राजनीति नहीं करते। पार्टी की सोशल मीडिया और आईटी रणनीति संजय की देखरेख में चली। सीट बंटवारा तक में उनका दखल माना गया। लेकिन सवाल यही है कि क्या रणनीति में यह बदलाव बिहार की सामाजिक ज़मीन के अनुकूल था? या इससे पार्टी ने अपने पारंपरिक सामाजिक आधार को नाराज़ कर दिया?
संजय यादव पर गंभीर आरोप…लालू परिवार में फूट का कारण भी ?
RJD के भीतर कई नेता और लालू परिवार के सदस्य संजय की बढ़ती ताकत से असहज थे। तेज प्रताप पहले ही उन्हें जयचंद कह चुके हैं, यह इशारा केवल राजनीतिक मतभेद का नहीं बल्कि गहरे अविश्वास का संकेत है। लालू की बेटी रोहिणी भी संजय के हस्तक्षेप को लेकर नाराज़गी जता चुकी हैं। तो कई कद्दावर नेताओं ने आरोप लगाए कि टिकट बंटवारे में उनकी मनमानी रही। कुछ जगहों पर ऐसे उम्मीदवार उतारे गए जिन्हें स्थानीय सामाजिक समीकरणों की समझ नहीं थी। सबसे गंभीर आरोप यह है कि संजय के कारण तेजस्वी जनता से दूरी बनाए हुए दिखे और लालू की तरह गांव-गांव का कनेक्शन, रातों के दौरे, निरंतर संवाद, ये सब कम होता गया। तेजस्वी यादव की अधिकार यात्रा के दौरान बस में वह सीट जहां तेजस्वी बैठते थे, वहां संजय यादव बैठे दिखे। पार्टी के भीतर यह संदेश देने के लिए पर्याप्त था कि संजय खुद को नंबर-2 मानने लगे हैं। विरोधियों और असंतुष्ट नेताओं को इससे एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा मिल गया। तो क्या संजय यादव ही RJD की हार के जिम्मेदार हैं?