राजनीति का स्त्रीवाद समाजिक बदलाव का नया व्याकरण..! बिहार गढ़ रहा नया परिभाषा

Feminism in politics : राजनीति का स्त्रीवाद केवल तीन शब्दों का शीर्षक भर नहीं, बल्कि अपने आप में एक बहुस्तरीय किताब है. यह किताब भारत की जटिल सामाजिक परतों, स्त्री की बदलती भूमिका और राजनीति की evolving प्रवृत्तियों को जोड़कर एक ऐसे समय की तस्वीर पेश करती है, जहां स्त्री को परिभाषित करना या राजनीति को समझना किसी सोशल मीडिया ट्रेंड का काम नहीं है. इसलिए भी तो सोशल मीडिया के कथित विशेषज्ञ हों, व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी के स्वयंभू विद्वान हों या फिर कुछ विचारधाराओं से संचालित समूह सबकी व्याख्या अलग-अलग पोटलियों में बंधी नजर आती है. अब देखें तो यह वैसा ही मिश्रण है जिसमें तेल और पानी को हिलाकर चाहे जितना एक करने की कोशिश की जाए लेकिन तेल अंततः ऊपर तैर ही आता है. यानी कि राजनीति और स्त्रीवाद को लेकर होने वाला विमर्श अक्सर वास्तविकता से काफी दूर होता है. जिसे मिलाने वाला अपनी जरूरत के हिसाब से मिलाने की पूरी कोशिश करता है.

अब देखें तो वक्त और जरूरत के अनुसार भारत में राजनीति हमेशा किसी न किसी वाद के सहारे अपने एजेंडे को गढ़ती रही है, कभी समाजवाद, कभी साम्राज्यवाद के विरुद्ध संघर्ष, तो कभी जाति और पहचान की राजनीति के जरिए राजनेताओं ने सत्ता की कुर्सी तक सफर किया.  उदाहरण के लिए देखें तो  समाजवाद के दौर में राजनीति को जाति-पात, छुआछूत और ऊंच-नीच के लेंस से देखने का चलन बढ़ा, और एक विचारधारा विशेष ने इसे अपना राजनीतिक हथियार बनाया. जो काफी सफल भी हुआ. बिहार की राजनीति का लालू अध्याय भी तो इसी का परिणाम है. खैर राजनीति के इस अध्याय को पढ़ने की कोशिश करते हैं. समाज में बराबर का हिस्सेदार होते हुए भी राजनीति के पन्ने से स्त्री लगभग गायब रही. अब बात भारत की हो या बिहार की राजनीति में समाजवाद खुब फला फुला.पर असल सवाल यह है कि इस समाजवादी ढांचे में स्त्री कहाँ थी? और उससे भी बड़ा प्रश्न अब राजनीतिक दल स्त्रीवाद को क्यों साध रहे हैं? दरअसल में यही वह मोड़ है जहां हमें भारतीय राजनीति में स्त्री की बढ़ती भूमिका को नए आयाम के रूप में समझना होगा. जिसका ताजा उदाहरण बिहार के विधानसभा चुनाव के नतीजे में देखने मिला है.

बिहार की राजनीति सदियों से जाति, संप्रदाय और गठजोड़ की गुत्थियों से तय होती आई है. लेकिन 2025 के विधानसभा चुनाव ने इस राजनीति की दिशा ही बदल दी. इस बार परिणाम किसी जातीय समीकरण की देन नहीं थे.न ही किसी बड़े चुनावी चमत्कार का असर था. इस बार सत्ता की चाबी स्त्रियों के हाथ में थी. नीतीश कुमार, जो पिछली कई चुनावी चुनौतियों के बाद राजनीतिक भविष्य की बची-खुची राह तलाशते हुए प्रतीत हो रहे थे, उनकी नैया महिलाओं ने किनारे लगा दी. महिला वोटों की अप्रत्याशित भागीदारी ने न सिर्फ एनडीए को बहुमत दिलाया, बल्कि जदयू का स्ट्राइक रेट 80% के पार पहुंचा दिया. विश्लेषकों के अनुसार विपक्ष द्वारा बदलाव की आकांक्षी और बेरोजगार और युवा वोटरों की अनिश्चितता का मुकाबला महिलाओं में विश्वास बनाकर किया और नीतीश कुमार सरकार की योजनाओं आरक्षण, छात्रवृत्ति, साइकिल योजना, शराबबंदी और महिलाओं को रोजगार के लिए खाते में 10 हजार देने से महिला मतदाताओं में एक विशेष पहचान बनाई, जो चुनाव में निर्णायक साबित हुआ.

जिस समय महिलाओं का जनादेश बिहार का राजनीतिक भविष्य तय कर रहा था, उसी समय बिहार का सबसे बड़ा राजनीतिक परिवार लालू परिवार में स्त्रीवाद का एक अलग, बेहद निजी और कड़वा अध्याय खुल रहा था. लालू प्रसाद यादव की बेटी रोहिणी आचार्य के आरोपों ने इस बात को उजागर किया कि ‘स्त्रीवाद’ की राजनीति हमेशा सार्वजनिक भागीदारी की कहानी नहीं होती, कई बार यह परिवारों के भीतर की सत्ता-संघर्ष की अभिव्यक्ति भी बन जाती है. रोहिणी का कहना है कि उन्होंने परिवार के लिए अपना बलिदान दिया, लेकिन बदले में उन्हें उपेक्षा मिली. यह राजनीतिक महत्वाकांक्षा है या कुछ और इसका फैसला तो वक़्त करेगा लेकिन जो भी हो, यह राजनीति के स्त्रीवाद का दूसरा चरित्र सामने रखता है.

दरअसल राजनीति के चश्मे से देखें तो स्त्रीवाद की परिभाषा हमेशा आधा अधुरा तय किया गया है. स्त्रीवाद को अक्सर दो हिस्सों में बांटकर देखा जाता है. एक जो चुनावी राजनीति में महिलाओं की भागीदारी को मजबूत करता है दूसरा जो परिवार और निजी क्षेत्र में स्त्री की भूमिका पर सवाल उठाता है लेकिन वास्तव में परिभाषा इससे कहीं व्यापक है. जो केवल सत्ता परिवर्तन, या राजनीतिक साझेदारी तक सीमित नहीं है बल्कि सामाजिक मूल्यों, मान्यताओं और समय के साथ बदलती परिभाषाओं का प्रतिबिंब भी है. अब देखें तो राजनीति में महिला कार्ड खेलने की परंपरा पुरानी है. लेकिन महिलाओं का स्वयं सत्ता-निर्माण का केंद्र बन जाना नई बात है. और यही इस दौर का बड़ा परिवर्तन है. आज जब बिहार की महिलाएँ जाति और संप्रदाय के कैलकुलेशन को दरकिनार कर अपनी स्वतंत्र राजनीतिक इच्छा व्यक्त करती हैं, तब यह सवाल उठता ही है..क्या स्त्रीवाद जो  परिवार की चारदीवारी से बाहर निकलकर सत्ता के समीकरण बदलने की क्षमता रखता है उसे हमारा समाज किस नजरिए से देखेगा ?

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