नक्सलवाद का अंत अब दूर नहीं… मारा गया माओवाद का सरगना, जानें कौन था हिडमा

Naxal commander Hidma : छत्तीसगढ़ के सुकमा ज़िले का जन्मा आदिवासी परिवेश का नक्सलवादी जिसे लोग हिडमा या संतोष के नाम से भी जानते है. लंबे समय से छत्तीसगढ़ के बस्तर इलाके में नक्सली हिंसा के लिए पहचाने जाने वाला माडवी हिडमा अब इतिहास का हिस्सा बन गया हैं.उसकी पत्नी राजे और 4 अन्य नक्सलियों के साथ उसको मार गिराया है. उसकी मौत केवल नक्सली कमांडर का सफाया नहीं है, बल्कि नक्सलवाद के उस संभावित अंत का संकेत हैं, जिसे सुरक्षा बलों ने दशकों से खोदकर निकला हैं. एक समय था जब बस्तर के घने जंगलो में उसकी आहट से ही सुरक्षा बलों को चेतावनी मिल जाती थी.

कौन हैं माडवी हिडमा?

छत्तीसगढ़ और आसपास के जंगलों में सालों से सर्च ऑपरेशन चलाने वाली सुरक्षा एजेंसियों के लिए हिडमा सबसे बड़ा सिरदर्द था. हिडमा पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी यानी PLGA के बटालियन का नंबर 1 कमांडर था,जो दंडकारणीय क्षेत्र (छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश, उड़ीसा, तेलंगाना और महाराष्ट्र) के हिस्सों में फैली 3सबसे ताकतवर नक्सलियों की यूनिट थी.उस पर 1 करोड़ का इनाम था. हिडमा न सिर्फ एक जनरल कमांडर, बल्कि आदिवासी आवाज का एक गोरिल्ला रणनीतिकार भी था. माडवी हिडमा का जन्म 1984 के आसपास हुआ था, दसवीं तक पढ़ा हिडमा 1990 के दशक के अंत में नक्सली संगठन में शामिल हो गया.

उसकी युद्धक क्षमताओं (fighter abilities) को देखते हुए, उसे CPI(माओवादी) की केंद्रीय कमेटी में शामिल किया गया, हिडमा को सिर्फ एक कमांडर नहीं बल्कि गोरिल्ला युद्ध का मास्टर स्ट्रेटजिस्ट कहा जाता था. कई बड़े हमलों में हिडमा का नाम शामिल है, जैसे 2010 का दंतेवाड़ा हमला (CRPF जवान मारे गए) जहां इसने कमांडर पापा राव की मदद की थी , 2013 में झीरम घाटी(दरभा वैली), जहां कांग्रेस के काफिले में हमला हुआ था जिसमें तत्कालीन राज्य कांग्रेस अध्यक्ष नन्द कुमार पटेल, महेंद्र कर्मा और पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल3समेत 27 लोग मारे गए थे, 2017 में बुरकापाल हमले में भी उसका हाथ था जिसमें CRPF के 24 जवान शहीद हुए थे.

कैसे हुआ हिडमा का अंत

आंध्र प्रदेश के मारेदुमिल्ली जंगलों में माडवी हिडमा को 18 नवंबर की सुबह उसकी पत्नी और 4 अन्य नक्सलियों के साथ मार गिराया. इसे छत्तीसगढ़ पुलिस और अन्य सुरक्षा एजेंसियों ने नक्सलवाद के लिए बड़ा झटका बताया कई विश्लेषकों के अनुसार हिड़मा की मौत PLGA (People’s liberation Guerrilla army) बटालियन नंबर 1 की कमर तोड़ सकती है. यह बटालियन नक्सलियों की सबसे ताकतवर यूनिट में से एक मानी जाती है. हिड़मा की मौत से केंद्रीय कमेटी में अच्छी खासी दरार आ सकती है क्योंकि PLGA और कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के नेताओं पर अब और दवाब पड़ेगा.

क्या सच में हिडमा का खात्मा नक्सलवाद को करेगा खत्म?

क्या हिडमा की मौत नक्सलवाद की आखिरी कील थी, हिडमा का जाना निश्चित रूप से नक्सली संगठनो के लिए धक्का है, लंबे समय से नेतृत्व परिवर्त से जूझता रहा है. जब एक नेता जाता है तो दूसरा उभर सकता है खासकर अगर उसकी रणनीतियां गहरी हो. नक्सलवाद सिर्फ हथियारों का खेल नहीं आदिवासी जमीनी असमानताएं, गरीबी और विकास की खाई से जुड़ा संघर्ष है.
हिड़मा की मौत नक्सलवाद के लिए एक निर्णायक मोड़ जरूर है, वही PLGA की ताकत और उसके हमले की क्षमता पर असर डालेगा. अगर इसमें सिर्फ सैन्य दबाव रहेगा और विकास की योजना कमजोर रहेगी तो नक्सलवाद फिर से उभर सकता है.

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