चीफ जस्टिस की नियुक्ति कैसे होती है? जानिए प्रक्रिया, परंपरा, विवाद और MOP का पूरा इतिहास

Chief Justice appointed process : भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) की नियुक्ति को लेकर देश में एक लंबी और स्थापित परंपरा रही है। सुप्रीम कोर्ट के सबसे वरिष्ठ न्यायाधीश को ही यह जिम्मेदारी सौंपी जाती है। लेकिन यह सिर्फ एक परंपरा नहीं, बल्कि इसका विस्तृत ढांचा सुप्रीम कोर्ट जजों की नियुक्ति के लिए प्रक्रिया ज्ञापन (Memorandum of Procedure–MOP) में भी दर्ज है। CJI की नियुक्ति से जुड़ी यह प्रक्रिया कैसे चलती है, कब शुरू होती है और क्या कभी परंपरा टूटी है,इस पूरी रिपोर्ट में विस्तार से समझिए।

सबसे वरिष्ठ जज को ही CJI बनाने की परंपरा

परंपरा के तहत सुप्रीम कोर्ट में सबसे वरिष्ठ न्यायाधीश, यानी नियुक्ति और सेवा अवधि के आधार पर वरिष्ठता रखने वाले जज, को ही अगला मुख्य न्यायाधीश बनाया जाता है। 1999 में तैयार किए गए एमओपी में यह सिद्धांत औपचारिक रूप से दर्ज किया गया कि भारत के मुख्य न्यायाधीश के पद पर नियुक्ति सुप्रीम कोर्ट के सबसे वरिष्ठ न्यायाधीश को की जानी चाहिए, बशर्ते उन्हें इस पद के लिए उपयुक्त माना जाए। इससे पहले भी परंपरा यही थी कि सेवानिवृत्त हो रहे CJI के बाद वरिष्ठतम जज को ही शीर्ष पद दिया जाए।

नियुक्ति प्रक्रिया कब शुरू होती है?

एमओपी के अनुसार, प्रक्रिया तब शुरू होती है जब केंद्रीय विधि मंत्री, मौजूदा CJI की सेवानिवृत्ति से लगभग एक माह पहले उनसे अगले मुख्य न्यायाधीश के नाम की सिफारिश मांगते हैं। सिफारिश के बाद CJI द्वारा भेजी गई सिफारिश को विधि मंत्री प्रधानमंत्री के पास भेजते हैं। प्रधानमंत्री इस नाम की अनुशंसा राष्ट्रपति को करते हैं और राष्ट्रपति औपचारिक नियुक्ति जारी करते हैं। तकनीकी रूप से अंतिम निर्णय केंद्र सरकार का होता है, लेकिन परंपरा के अनुसार केंद्र हमेशा वही नाम मंज़ूर करता है जिसे CJI सुझाते हैं।

CJI का कार्यकाल कितना होता है?

सुप्रीम कोर्ट के सभी जजों की तरह CJI भी 65 वर्ष की उम्र में सेवानिवृत्त हो जाते हैं। इसलिए उनका कार्यकाल इस बात पर निर्भर करता है कि वे अपने पूर्ववर्ती की सेवानिवृत्ति के समय कितने वरिष्ठ और कितने समय शेष बचा है। क्या कभी इस परंपरा को तोड़ा गया? तो इसका जबाव है हां परंपरा दो बार टूटी और दोनों बार प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के कार्यकाल में। पहली बार यह वर्ष 1973 में तब टूटा जब जस्टिस एएन रे की नियुक्ति हुई. उस समय वरिष्ठता क्रम में जस्टिस जेएम शेलत, केएस हेगड़े और एएन ग्रोवर आगे थे। लेकिन तीनों को दरकिनार करते हुए जस्टिस एएन रे को CJI बनाया गया। ज्ञात हो कि इंदिरा सरकार का यह फैसला ठीक एक दिन बाद आया था जब सुप्रीम कोर्ट ने केशवानंद भारती केस में मूल संरचना सिद्धांत (Basic Structure Doctrine) को मान्यता दी थी। जस्टिस रे 13-जजों के बेंच में अल्पमत में थे।

दुसरी बार यह पंरपरा टुटी वर्ष 1977 में जब जस्टिस एमएच बेग को नियुक्ति किया गया .इस बार वरिष्ठतम जज एचआर खन्ना को दरकिनार किया गया। खन्ना उसी जज थे जिन्होंने एडीएम जबलपुर मामले (हैबियस कॉर्पस केस) में आपातकाल के दौरान मौलिक अधिकारों को निलंबित करने के खिलाफ ऐतिहासिक असहमति दर्ज की थी। सरकार ने उनके बजाय जस्टिस एमएच बेग को CJI बनाया। इन दोनों मामलों को न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर हस्तक्षेप के रूप में आलोचना झेलनी पड़ी।

एमओपी (MOP) कैसे अस्तित्व में आया?

सुप्रीम कोर्ट ने तीन ऐतिहासिक फैसलों , प्रथम न्यायाधीश मामला (1981) ,द्वितीय न्यायाधीश मामला (1993) और तृतीय न्यायाधीश मामला (1998) के जरिए कोलेजियम सिस्टम की स्थापना की, जिसमें सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठतम जज न्यायाधीशों की नियुक्ति और पदोन्नति की सिफारिश करते हैं। केंद्र सरकार इन सिफारिशों को मानने के लिए बाध्य होती है। जिसके बाद 1999 में MOP तैयार हुआ इसमें बताया गया कि CJI की नियुक्ति में केंद्र की भूमिका, सुप्रीम कोर्ट व हाई कोर्ट की जिम्मेदारियां, सिफारिश की प्रक्रिया और समयसीमा की प्रधानता होगी. यह महत्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि कोलेजियम प्रणाली संविधान में लिखी नहीं, बल्कि न्यायिक व्याख्या से बनी व्यवस्था है।

2015 के बाद MOP को बदलने की कोशिश

केंद्र सरकार ने 2014 में न्यायिक नियुक्तियों में अधिक भूमिका देने के लिए राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) बनाया। लेकिन 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने इसे असंवैधानिक बताते हुए रद्द कर दिया। इस फैसले के बाद केंद्र और सुप्रीम कोर्ट ने 2016 से MOP में संशोधन करने पर दोबारा विचार करना शुरू किया। हालांकि सरकार ने 2023 तक कई बार कहा कि नया MOP अभी भी फाइनल नहीं हुआ है। भारत के CJI की नियुक्ति एक निर्धारित प्रक्रिया और लंबे समय से चली आ रही परंपरा पर आधारित है। हालांकि राजनीतिक हस्तक्षेप और टकराव की घटनाएँ भी इतिहास में दर्ज हैं, लेकिन आज कोलेजियम प्रणाली और MOP मिलकर इस प्रक्रिया की पारदर्शिता और स्वतंत्रता को बनाए रखने का प्रयास करते हैं।

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