बिहार का जनादेश और विपक्ष का आत्ममंथन… क्या वाकई खत्म हो रही है राजद की राजनीति?

Bihar politics : 2014 के बाद से भारतीय राजनीति में जिस तरह के बड़े बदलाव देखने को मिले, उसने एक बात साफ कर दी है कि जनता अब सिर्फ नारों से नहीं बल्कि एक ठोस भरोसे से फैसले लेती है. यही वजह थी कि वर्षों तक देश की सत्ता पर काबिज रही भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को जनता ने 2014 में ऐतिहासिक झटका दिया. भ्रष्टाचार, नेतृत्वहीनता और नीतिगत भ्रम के आरोपों ने कांग्रेस को ऐसे राजनीतिक दलदल में धकेला, जहाँ से उबरना उसके लिए आज भी चुनौती बना हुआ है. कुछ हद तक यही कहानी अब बिहार में भी दोहराई जाती दिख रही है. हालिया बिहार विधानसभा चुनाव में विपक्षी महागठबंधन की करारी हार केवल चुनावी गणित की हार नहीं है, बल्कि यह राजनीतिक विश्वसनीयता और जनविश्वास की हार भी है. इस हार का केंद्र में है राष्ट्रीय जनता दल और उसका नेतृत्व महागठबंधन.

वादों की भरमार लेकिन भरोसे की कमी

महागठबंधन की ओर से चुनाव से पहले जिविका दीदी को हर महिना ₹30,000 देने, हर घर एक सरकारी नौकरी देने, बेरोजगारी मिटाने और पलायन रोकने जैसे बड़े-बड़े वादे किए गए. लेकिन सवाल यह है कि क्या जनता को इन वादों पर भरोसा हुआ? चुनाव नतीजे बताते हैं नहीं. नतीजे यह भी बता रहे कि बिहार की जनता अब सिर्फ घोषणा नहीं, काम का ट्रैक रिकॉर्ड देखती है. रोजगार, शिक्षा, उद्योग, स्वास्थ्य और कानून-व्यवस्था ये सब बिहार की प्राथमिक ज़रूरतें हैं. लेकिन इन मुद्दों पर विपक्ष जनता को यह भरोसा नहीं दिला सका कि वह सत्ता में आकर इन्हें वास्तव में लागू कर पाएगा.

तेजस्वी फैक्टर भी नहीं चला

तेजस्वी यादव को एक युवा चेहरे के तौर पर ज़रूर पेश किया गया, लेकिन चुनाव यह साबित कर गया कि केवल युवा होना ही पर्याप्त नहीं होता, जब तक नेतृत्व में स्पष्टता, प्रशासनिक भरोसा और नैतिक विश्वसनीयता न हो. इसके उलट, कई बयानों और आक्रामक राजनीतिक भाषा ने उनकी छवि को और नुकसान पहुंचाया. कभी दबंग राजनीति की ओर इशारा तो कभी सत्ता में आने के बाद सब दिखा देने जैसे बयान ने उस डर को और पुख्ता किया जिसे बिहार आज भी जंगल राज की स्मृति से जोड़ता है.

20 साल बनाम 20 साल की यादें

बिहार की राजनीति का एक कड़वा सच यह है कि जनता आज भी 2005 से पहले के दौर को पूरी तरह भूली नहीं है. आज भी जब तुलना होती है तो वर्तमान शासन की सबसे बड़ी ताकत कानून-व्यवस्था और सुशासन बनकर सामने आती है. यही वजह है कि लगातार दो दशकों से सत्ता में बनी व्यवस्था को जनता एक बार फिर मौका दे देती है. जबकि राजद अब भी उस दौर की छाया से पूरी तरह बाहर नहीं निकल पाई है. राजद के राजनीतिक इतिहास पर नजर डालें तो एक सच्चाई बेहद साफ है, 2005 के बाद बिना नीतीश कुमार के साथ के, राजद सत्ता तक नहीं पहुंच सकी है. 2015 इसका एकमात्र अपवाद रहा, जब गठबंधन की मजबूती ने रास्ता खोला. इस चुनाव ने एक बार फिर यह संदेश दे दिया कि राजद की स्वीकार्यता आज भी सीमित सामाजिक आधार से आगे नहीं बढ़ पाई है.

मशीनों पर आरोप या आत्मविश्लेषण से बचाव?

विपक्ष द्वारा चुनाव के बाद जनादेश को समझने से ज्यादा उसे नकारने की कोशिश में लगने लगी. ईवीएम, वोट चोरी, आचार संहिता उल्लंघन जैसे आरोपों के बीच विपक्ष असल मुद्दे को पीछे छोड़ गया. जबकी टिकट वितरण, सीट शेयरिंग, आपसी खींचतान और रणनीतिक भ्रम,इन सबने महागठबंधन को अंदर से कमजोर कर दिया. दुर्भाग्य यह है कि इन बुनियादी कमियों पर गहन आत्ममंथन के बजाय हार का ठीकरा बाहरी कारणों पर फोड़ा जा रहा है. यह चुनाव संकेत दे गया है कि अगर संगठन, नेतृत्व और विचारधारा के स्तर पर ठोस बदलाव नहीं हुए, तो आने वाले वर्षों में राजद के सामने अस्तित्व का संकट और गहरा सकता है. जिस तरह केंद्र की राजनीति में कांग्रेस हाशिए पर चली गई, उसी राह पर बिहार में राजद जाती दिखाई दे रही है. हालांकि राजनीति में कुछ भी अंतिम नहीं होता, लेकिन इतिहास उसको मौका देता है जो अपनी गलतियों से सीखते हैं. महागठबंधन अगर भविष्य में वापसी चाहता है, तो उसे आरोपों से बाहर निकलकर आत्मालोचना, संगठन सुधार और विश्वसनीय नेतृत्व पर काम करना ही होगा.

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