Sleepwalking : आपने कई बार सुना होगा कि कुछ लोग नींद में चलते हैं या नींद में बातें करने लगते हैं। पहली नजर में यह अजीब लगता है, लेकिन मेडिकल साइंस के मुताबिक यह एक आम लेकिन संवेदनशील समस्या है। कई मीडिया रिपोर्ट में बताया गया है कि नींद में चलना (Sleepwalking) और नींद में बोलना (Sleep Talking) दोनों ही नींद से जुड़ी ऐसी समस्याएं हैं, जिन्हें नज़रअंदाज़ करना कई बार खतरनाक साबित हो सकता है।
क्या होती है यह समस्या?
डॉक्टरों की भाषा में नींद में चलने और बोलने को Parasomnia कहा जाता है। इसका मतलब है नींद के दौरान शरीर या दिमाग का असामान्य व्यवहार करना। नींद में चलना अक्सर गहरी नींद (Non-REM Sleep) के दौरान होता है, जब दिमाग पूरी तरह जागा हुआ नहीं होता, लेकिन शरीर हिलने-डुलने लगता है। नींद में बोलना कभी हल्की नींद में, तो कभी गहरी नींद में यह किसी भी स्टेज में हो सकता है। अक्सर ऐसा करने वाला व्यक्ति सुबह उठकर यह याद भी नहीं रख पाता कि वह रात में चला या बोला था।
किन लोगों को होती है यह परेशानी?
रिपोर्ट के मुताबिक बच्चों में यह समस्या ज्यादा देखने को मिलती है, खासकर 4 से 12 साल की उम्र में। वयस्कों में भी करीब 3 से 4 प्रतिशत लोग नींद में चलने की समस्या से प्रभावित होते हैं। नींद में बोलना बहुत आम है और जीवन में कभी न कभी ज्यादातर लोग इसका अनुभव कर चुके होते हैं। अगर माता-पिता में यह समस्या रही हो, तो बच्चों में होने की संभावना और बढ़ जाती है, यानी यह वंशानुगत भी हो सकती है। विशेषज्ञों के अनुसार इसके पीछे कई वजहें हो सकती हैं. इसमें नींद की कमी, देर रात तक जागना, मोबाइल का ज्यादा इस्तेमाल, मानसिक तनाव और चिंता, बुखार या बीमारी, शराब, नशा या नींद की दवाइयां, अन्य नींद से जुड़ी बीमारियां, जैसे स्लीप एपनिया ये सभी कारण दिमाग के नींद चक्र को बिगाड़ देते हैं, जिससे व्यक्ति नींद में हरकतें करने लगता है।
कितना खतरनाक हो सकता है यह?
नींद में चलना सिर्फ टहलने तक सीमित नहीं रहता। कई बार व्यक्ति सीढ़ियों से गिर सकता है, बाहर सड़क तक निकल सकता है, दरवाजा, खिड़की खोल सकता है, खुद को या दूसरों को चोट पहुंचा सकता है. यही वजह है कि डॉक्टर इसे हल्के में लेने की सलाह नहीं देते, खासकर अगर यह बार-बार हो रहा हो।
कब डॉक्टर को दिखाना जरूरी है?
अगर नींद में चलने या बोलने की समस्या बार-बार हो रही हो, व्यक्ति को चोट लग रही हो, बहुत तेज चिल्लाना, डर जाना या हिंसक व्यवहार दिख रहा हो तो तुरंत किसी स्लीप स्पेशलिस्ट या डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए। कई मामलों में डॉक्टर स्लीप स्टडी (Sleep Test) कराने की सलाह भी देते हैं। विशेषज्ञ कुछ आसान उपाय बताते हैं, जो इस समस्या को काफी हद तक कम कर सकते हैं. इसमें रोज रोज एक तय समय पर सोना और उठना, सोने से पहले मोबाइल, टीवी और कैफीन से दूरी, शराब और नशीले पदार्थों से बचना, तनाव कम करने के लिए योग, ध्यान और हल्की एक्सरसाइज, बच्चों के कमरे में सुरक्षा का विशेष ध्यान रखें, दरवाजे बंद रखें, खिड़कियों में कुंडी लगाएं, सीढ़ियों के पास गेट लगाएं. डॉक्टरों का कहना है कि नींद में चलना और बोलना कोई रहस्यमयी बीमारी नहीं, बल्कि दिमाग और नींद के असंतुलन का नतीजा है। अगर समय रहते इस पर ध्यान दिया जाए, तो इसे पूरी तरह कंट्रोल किया जा सकता है।