बिहार में NDA के भीतर सियासी हलचल… राज्यसभा सीट को लेकर जीतन राम मांझी ने बढ़ाया दबाव

Bihar politics : बिहार में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के भीतर एक बार फिर सियासी सरगर्मी तेज हो गई है. हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (सेक्युलर) के प्रमुख और केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी ने राज्यसभा सीट को लेकर गठबंधन पर दबाव बढ़ा दिया है. मांझी ने साफ शब्दों में कहा है कि यदि उनकी पार्टी को राज्यसभा में प्रतिनिधित्व नहीं मिला तो वे केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा देने से भी पीछे नहीं हटेंगे.

वादा किया गया था राज्यसभा सीट

जीतन राम मांझी का दावा है कि NDA में शामिल होने के समय उनकी पार्टी से राज्यसभा सीट का वादा किया गया था. उन्होंने कहा कि अब जब बिहार से राज्यसभा की सीटें खाली होने वाली हैं, तो उनकी पार्टी को उसका हक मिलना चाहिए. मांझी ने यह भी संकेत दिया कि यदि जरूरत पड़ी तो उनके बेटे और बिहार सरकार में मंत्री संतोष कुमार सुमन भी अपने पद से इस्तीफा दे सकते हैं. मांझी ने अपनी मांग के समर्थन में हालिया बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों का हवाला दिया. उन्होंने कहा कि HAM(S) ने जिन छह सीटों पर चुनाव लड़ा, उनमें से पांच पर जीत हासिल की, जो पार्टी के प्रभाव और जनाधार को दर्शाता है. ऐसे में पार्टी को राज्यसभा में प्रतिनिधित्व देना पूरी तरह जायज है.

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2026 में खाली होंगी बिहार की 5 राज्यसभा सीटें

जानकारी के मुताबिक, अप्रैल 2026 में बिहार से राज्यसभा की पांच सीटें खाली होने वाली हैं. NDA के अंदरूनी गणित के अनुसार, इनमें से दो सीटें भाजपा, दो जद(यू) और एक सीट लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) को मिल सकती हैं. ऐसे में हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा के लिए फिलहाल कोई स्पष्ट जगह नहीं दिख रही है, जिसे लेकर मांझी नाराज नजर आ रहे हैं. मांझी के इस सख्त रुख से NDA के भीतर असहजता बढ़ गई है. जद(यू) और भाजपा के कुछ नेताओं का मानना है कि राज्यसभा सीटों को लेकर अभी अंतिम फैसला नहीं हुआ है और मांझी का इस तरह सार्वजनिक दबाव बनाना जल्दबाजी है. वहीं, गठबंधन के भीतर यह भी चर्चा है कि मांझी अपने राजनीतिक कद और दलित वोट बैंक को ध्यान में रखते हुए मोलभाव की रणनीति अपना रहे हैं.

दलित राजनीति और गठबंधन की मजबूरी

बिहार की राजनीति में जीतन राम मांझी एक बड़े दलित चेहरे माने जाते हैं. ऐसे में NDA के लिए उन्हें नजरअंदाज करना भी आसान नहीं है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले लोकसभा और विधानसभा चुनावों को देखते हुए भाजपा और जद(यू) किसी भी सहयोगी दल को नाराज करने के मूड में नहीं हैं.

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