Bihar politics : बिहार में नई सरकार के गठन के बाद राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा को लेकर राजनीतिक गलियारों में एक बड़ा सवाल उठने लगा है, क्या उन्होंने बेटे दीपक प्रकाश को मंत्री बनाकर खुद के लिए मुश्किलें खड़ी कर ली हैं? हालिया घटनाक्रम को देखें तो यह सवाल केवल चर्चा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पार्टी के भीतर बगावत और असंतोष के रूप में सामने आने लगा है. उपेंद्र कुशवाहा ने अपने बेटे दीपक प्रकाश को पंचायती राज मंत्री बनाया है, जबकि दीपक किसी भी सदन,विधानसभा या विधान परिषद के सदस्य नहीं हैं. इस फैसले के बाद RLM के भीतर असंतोष खुलकर सामने आ गया. पार्टी के कई नेताओं ने इसे खुला परिवारवाद बताते हुए विरोध किया और इस्तीफे दे दिए.
विधायक भी हुए दूर
हालात की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पार्टी के 4 में से 3 विधायक माधव आनंद, रामेश्वर महतो और आलोक सिंह ने कुशवाहा से दूरी बना ली है. 24 दिसंबर को पटना में आयोजित लिट्टी-चोखा भोज में ये तीनों विधायक शामिल नहीं हुए. इसके बजाय, वे भाजपा के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष नितिन नबीन से मिलने उनके आवास पहुंचे. इस मुलाकात की तस्वीरें भी सार्वजनिक हुईं, जिसके बाद सियासी हलचल और तेज हो गई. तीनों विधायक इसके बाद दिल्ली रवाना हो गए, जिसे संभावित राजनीतिक समीकरणों से जोड़कर देखा जा रहा है.
पार्टी में इस्तीफों की झड़ी
बेटे को मंत्री बनाए जाने के फैसले का विरोध केवल विधायकों तक सीमित नहीं रहा. 27 नवंबर को पार्टी के 7 बड़े नेताओं ने इस्तीफा दे दिया, जिनमें RLM के प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र कुशवाहा और उपाध्यक्ष जितेंद्र नाथ शामिल थे. महेंद्र कुशवाहा ने अपने इस्तीफे को लेकर कहा था कि उपेंद्र कुशवाहा अक्सर राजनीति में नैतिक मूल्यों की बात करते हैं, लेकिन सत्ता के लिए उन्होंने अपने परिवार को तरजीह दी. RLM के संस्थापक सदस्य और व्यवसायिक प्रकोष्ठ के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अनंत कुमार ने पूरे व्यवसायिक प्रकोष्ठ के साथ इस्तीफा दे दिया और जल्द JDU में शामिल होने का ऐलान किया. उनका कहना था कि पार्टी अपने मूल उद्देश्य से भटक गई है.
कोइरी समाज और कुशवाहा की राजनीति
उपेंद्र कुशवाहा कोइरी/कुशवाहा समाज से आते हैं. बिहार में इस समाज की आबादी करीब 4.2% है और मगध, शाहाबाद, सीवान, भागलपुर-बांका, पूर्णिया और बेतिया-मोतिहारी क्षेत्र की लगभग 40–45 सीटों पर इसका प्रभाव माना जाता है. लंबे समय तक उपेंद्र कुशवाहा इस समाज के सबसे प्रभावशाली नेता माने जाते रहे हैं. लेकिन जानकारों का कहना है कि लगातार पार्टी बदलने और अब परिवार को राजनीति में आगे लाने से समाज के भीतर गलत संदेश जा रहा है. 2020 विधानसभा चुनाव में उपेंद्र कुशवाहा ने AIMIM के साथ तीसरा मोर्चा बनाकर 99 सीटों पर चुनाव लड़ा. उनकी तत्कालीन पार्टी RLSP को एक भी सीट नहीं मिली, लेकिन 1.8% वोट शेयर जरूर रहा. 2025 विधानसभा चुनाव में RLM ने सिर्फ 6 सीटों पर चुनाव लड़ा और 4 सीटें जीत लीं. NDA में शामिल होने से भाजपा-JDU को भी इसका बड़ा फायदा हुआ. क्षेत्रवार आंकड़े उपेंद्र कुशवाहा के इस प्रभाव को और साफ करते हैं. हालांकि राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि उपेंद्र कुशवाहा का यह प्रभाव उस दौर की है जब उपेंद्र कुशवाहा ने अपने बेटे को राजनीति में लॉन्च नहीं किया था.
परिवारवाद का आरोप और तुलना
कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उपेंद्र कुशवाहा अब लालू यादव और दिवंगत रामविलास पासवान की तर्ज पर परिवार को राजनीति में स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं. लेकिन उनकी पार्टी न तो RJD जितनी बड़ी है और न ही LJP(R) जैसी सामाजिक पकड़ रखती है. छोटी पार्टी में परिवार को प्राथमिकता देने से बिखराव की आशंका और बढ़ जाती है. पत्नी को पहले विधानसभा का टिकट और अब बेटे को मंत्री बनाना,इन फैसलों ने उपेंद्र कुशवाहा को उनके ही बनाए राजनीतिक नैरेटिव के सामने खड़ा कर दिया है. पार्टी में टूट, विधायकों की दूरी और NDA के भीतर असहजता यह संकेत दे रही है कि बेटे को मंत्री बनाना उनके लिए फिलहाल फायदे का सौदा नहीं साबित हो रहा. आने वाले महीनों में यह साफ हो जाएगा कि उपेंद्र कुशवाहा इस राजनीतिक संकट से निकल पाते हैं या उनकी पार्टी और सियासी पकड़ और कमजोर होती है.
राज्यसभा और NDA की रणनीति
2024 लोकसभा चुनाव हारने के बाद अगस्त 2024 में NDA ने उपेंद्र कुशवाहा को राज्यसभा भेजा था. उनका कार्यकाल 9 अप्रैल 2026 को समाप्त हो रहा है. पार्टी में बढ़ती नाराजगी और परिवारवाद के आरोपों के बीच अटकलें हैं कि इस बार भाजपा अपने कोटे से उन्हें दोबारा राज्यसभा नहीं भेजेगी. सूत्रों के मुताबिक, नीतीश कुमार की नजर NDA की राज्यसभा की तीन सीटों पर है और परिवारवाद का मुद्दा हाल के दिनों में NDA के लिए सबसे बड़ी किरकिरी बना हुआ है.