Unnao rape case : उन्नाव रेप केस मामले में देश की सर्वोच्च अदालत ने पूर्व भाजपा विधायक कुलदीप सिंह सेंगर को राहत देने वाले दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगा दी है. शीर्ष अदालत के इस फैसले के बाद सेंगर फिलहाल जेल में ही रहेगा.
सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप
दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा 23 दिसंबर 2025 को सेंगर की आजीवन कारावास की सजा निलंबित कर जमानत देने के फैसले को CBI ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी. CBI की दलील पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी और कहा कि इतने गंभीर अपराध में दी गई राहत की गहराई से समीक्षा आवश्यक है. अदालत ने सेंगर को चार सप्ताह में जवाब दाखिल करने का समय दिया है और मामले की अगली सुनवाई जनवरी के अंतिम सप्ताह में तय की है.
उन्नाव रेप केस की पूरी टाइमलाइन
- 4 जून 2017
उन्नाव की एक नाबालिग लड़की, जो नौकरी के सिलसिले में तत्कालीन विधायक कुलदीप सिंह सेंगर से मिलने गई थी, उसके साथ रेप किया गया.
- अगस्त 2017
पीड़िता ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई और एफआईआर में सीधे तौर पर सेंगर का नाम लिया. इसके बावजूद शुरुआती स्तर पर कार्रवाई बेहद धीमी रही.
- फरवरी–अप्रैल 2019
पीड़िता ने जब जिला अदालत का दरवाजा खटखटाया, तो हालात और बिगड़ गए. एक काउंटर शिकायत में पीड़िता के पिता को आर्म्स एक्ट के तहत गिरफ्तार कर लिया गया. कुछ ही दिनों बाद पुलिस कस्टडी में उनकी मौत हो गई, जिसने पूरे मामले को राष्ट्रीय बहस का मुद्दा बना दिया. इसी दौरान सेंगर के खिलाफ POCSO एक्ट के तहत मामला दर्ज किया गया.
- दिसंबर 2019
दिल्ली की विशेष अदालत ने कुलदीप सिंह सेंगर को दोषी करार देते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई. साथ ही आर्थिक जुर्माना भी लगाया गया.
- 23 दिसंबर 2025
लगभग 7 साल 5 महीने जेल में बिताने का हवाला देते हुए दिल्ली हाईकोर्ट ने सेंगर की सजा को निलंबित कर जमानत दे दी. हालांकि अदालत ने यह भी कहा कि वह पीड़िता या उसके परिवार से संपर्क नहीं करेगा और कुछ सख्त शर्तें लगाई गईं.
- 26 दिसंबर 2025
CBI ने दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, यह कहते हुए कि ऐसे मामलों में राहत देना न्याय व्यवस्था पर सवाल खड़े करता है.
- 29 दिसंबर 2025
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगाते हुए सेंगर की रिहाई पर विराम लगा दिया है. फिलहाल वह जेल में ही रहेगा.
क्यों अहम है सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला
CBI ने अदालत में दलील दी कि यह मामला सिर्फ एक व्यक्ति की सजा का नहीं, बल्कि नाबालिग से रेप, सत्ता के दुरुपयोग और पीड़िता को डराने-धमकाने की पूरी श्रृंखला का प्रतीक है. सरकार की ओर से कहा गया कि अगर ऐसे मामलों में सजा निलंबन को सामान्य प्रक्रिया बना दिया गया, तो इससे समाज में गलत संदेश जाएगा.