Bihar Politics : नीतीश कुमार एक बार फिर से चर्चा में हैं. लेकिन चर्चा की वहज पूरानी है. दरअसल 8 जनवरी को पूर्व सांसद केसी त्यागी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर मांग की कि जिस तरह पिछले साल चौधरी चरण सिंह और कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न दिया गया, उसी तरह नीतीश कुमार को भी यह सम्मान मिलना चाहिए. इसके दो दिन बाद ही केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी ने कहा कि भारत रत्न नीतीश कुमार… ये शब्द सुनने में कितना अच्छा लगता है. इसके बाद फिर चिराग पासवान ने भी नीतीश कुमार को इस सम्मान के योग्य बताया. लेकिन जब नीतीश कुमार के लिए देश के सबसे बड़े सम्मान भारत रत्न की मांग की जा रही थी और राजनीतिक माहौल पूरी तरह से नीतीश कुमार के पक्ष में बनता दिख रहा था, तभी जदयू ने यू-टर्न ले लिया. हालांकि नीतीश कुमार के लिए भारत रत्न की मांग कोई नई नहीं है. बीते कुछ वर्षों में जदयू और एनडीए के कई नेता समय-समय पर यह मांग उठाते रहे हैं. लेकिन इस बार मामला इसलिए ज्यादा गरम हो गया क्योंकि यह मांग पार्टी के सबसे भरोसेमंद और रणनीतिक चेहरों में रहे केसी त्यागी की ओर से आई है. शायद यही वजह है कि जदयू अचानक असहज हो गई. पार्टी को सफाई भी देनी पड़ी, दूरी बनानी पड़ी और यहां तक कि त्यागी की पार्टी में भूमिका पर भी सवाल उठाए जाने लगे. लेकिन सवाल यह नहीं है कि नीतीश कुमार भारत रत्न के योग्य हैं या नहीं. असली सवाल यह है कि जदयू इस मांग से डर क्यों गई?
नीतीश कुमार के लिए भारत रत्न की मांग पर जदयू क्यों घबराई?
केसी त्यागी से पहले संजय झा, लवली आनंद, छोटू सिंह जैसे नेताओं ने भारत रत्न की मांग की लेकिन पार्टी ने या तो चुप्पी साध ली या फिर अनदेखा कर दिया. लेकिन अब जैसे ही केसी त्यागी ने वही बात दोहराई, पार्टी के भीतर बेचैनी फैल गई. राष्ट्रीय प्रवक्ता राजीव रंजन प्रसाद ने कहा कि यह त्यागी की व्यक्तिगत राय है. नीरज कुमार ने कहा कि पार्टी का इससे कोई लेना-देना नहीं है वहीं बिजेंद्र यादव और अशोक चौधरी ने भी इसे निजी बयान बताया और यहां तक कि यह तक कह दिया गया कि त्यागी पार्टी में हैं भी या नहीं, इसका पता नहीं. यानी जिस नेता को कभी नीतीश कुमार की आवाज माना जाता था, आज उसी को पार्टी से लगभग अलग-थलग कर दिया गया. दरअसल राजनीतिक गलियारों में एक समय कहा जाता था कि अगर नीतीश कुमार को समझना है तो केसी त्यागी से बात कीजिए. वरिष्ठ पत्रकार अभिरंजन कुमार और शिवानंद तिवारी जैसे लोग मानते हैं कि त्यागी वही नेता रहे हैं जो नीतीश कुमार के मन की बात सार्वजनिक करते थे. तो फिर सवाल उठता है कि क्या यह सचमुच त्यागी की व्यक्तिगत राय है? या फिर यह नीतीश की वही पुरानी रणनीति है जिसमें पहले बात कहलवाई जाती है और फिर खंडन करवा दिया जाता है?
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कई वरिष्ठ पत्रकार इसे नीतीश कुमार की पुरानी रणनीति बताते हैं. उनका कहना है कि पहले भी प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति बनने की चर्चाएं इसी तरह करवाई जाती रही हैं. अब जब ये पद संभव नहीं दिखते, तो भारत रत्न की चर्चा सामने लाई जा रही है. लेकिन इस बार दांव उल्टा पड़ गया. क्योंकि भारत रत्न की मांग सीधे-सीधे केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री से जुड़ी है. जदयू को डर है कि कहीं यह मांग बीजेपी को असहज न कर दे. एनडीए के भीतर संदेश न जाए कि नीतीश कुमार खुद को मोदी के समकक्ष खड़ा करना चाहते हैं.
जदयू की घबराहट की क्या है बजह
आज की सच्चाई यह है कि बिहार में जदयू एनडीए पर निर्भर है और नीतीश कुमार की सरकार बीजेपी के सहारे चल रही है. ऐसे में भारत रत्न जैसी मांग कहीं सत्ता संतुलन को न बिगाड़ दे, यही जदयू की सबसे बड़ी चिंता है.इसीलिए पार्टी चाहती है कि यह मांग व्यक्तिगत राय बनकर रह जाए और आधिकारिक लाइन न बने. नीतीश कुमार का राजनीतिक कद छोटा नहीं है. बिहार के विकास, सामाजिक न्याय और सुशासन की राजनीति में उनका योगदान निर्विवाद है. भारत रत्न पर चर्चा होना स्वाभाविक है. लेकिन जदयू की घबराहट बताती है कि यह मामला सम्मान से ज्यादा सत्ता-संतुलन का है. ऐसे में डर इस बात है कि नीतीश कुमार को भारत रत्न मिले या न मिले, लेकिन कहीं इसकी राजनीति में पार्टी ही न फंस जाए. यही वजह है कि इस बार भारत रत्न की मांग पर जदयू डर गई है और यही वजह है कि केसी त्यागी को भी अकेला छोड़ दिया गया है. अब देखना यह है कि यह मांग सिर्फ एक सियासी बयान बनकर रह जाती है या आने वाले दिनों में केंद्र सरकार के दरवाजे तक पहुंचती है. ये भी पढ़ें : मकर संक्रांति के बाद नीतीश कुमार की 16वीं यात्रा