दही-चूड़ा भोज में बिहार की पॉलिटिकल डिप्लोमेसी का देशी अंदाज…जानें क्या है इसका इतिहास

Dahi chura bhoj : बिहार की राजनीति में मकर संक्रांति का दही-चूड़ा भोज सिर्फ एक परंपरा नहीं, बल्कि सत्ता के समीकरण साधने, रिश्ते बनाने-बिगाड़ने और सियासी संकेत देने का मजबूत मंच बन चुका है. दशकों से यह भोज राजनीतिक डिप्लोमेसी का देसी संस्करण माना जाता है, जिसकी शुरुआत लालू प्रसाद यादव ने 90 के दशक में की थी. आज हालात यह है कि दही-चूड़ा भोज में कौन पहुंचा, कौन नहीं पहुंचा और किसने किसे बुलाया, आदि सवाल बिहार की राजनीति के लिहाज से काफी मायने रखते हैं.

लालू यादव ने शुरू की थी डिनर डिप्लोमेसी का देसी अंदाज

90 के दशक में जब जॉर्ज फर्नांडीस और नीतीश कुमार जनता दल से अलग होकर अपनी राजनीतिक राह बना रहे थे, तब लालू यादव बिहार में अपनी पकड़ मजबूत करने में जुटे थे. उसी दौर में उन्होंने दिल्ली की डिनर डिप्लोमेसी का देसी रूप निकालते हुए दही-चूड़ा भोज की शुरुआत की. मुख्यमंत्री बनने के बाद लालू यादव ने इसे दो दिवसीय आयोजन का रूप दिया. जहां पहले दिन नेताओं और पार्टी कार्यकर्ताओं के लिए भोज होता था और फिर दूसरे दिन मुख्यमंत्री आवास से सटी झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले समर्थकों को प्रेमपूर्वक बुलाकर अपने हाथों से परोसकर दही-चूड़ा खिलाया जाता था. लालू यादव इसे जनसंपर्क और राजनीतिक संदेश देने का बड़ा मंच मानते थे. उनके करीबी नेता रघुवंश प्रसाद सिंह ने भी इस परंपरा को अपनाया, हालांकि उनका आयोजन पत्रकारों तक सीमित रहा. बाद में जेडीयू नेता वशिष्ठ नारायण सिंह इस परंपरा को पटना से दिल्ली तक ले गए. धीरे-धीरे यह चलन रामविलास पासवान जैसे दिग्गज नेताओं तक पहुंचा, जिसमें आगे चलकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी शामिल हुए.

रामविलास पासवान का 2015 का भोज और एनडीए के संकेत

2015 में लोक जनशक्ति पार्टी के संस्थापक रामविलास पासवान ने दिल्ली में भव्य दही-चूड़ा भोज का आयोजन किया था. इस भोज में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी और प्रकाश जावड़ेकर जैसे बीजेपी के बड़े नेता शामिल हुए थे. रामविलास पासवान पहले ही एनडीए में शामिल हो चुके थे, लेकिन इस भोज को बिहार विधानसभा चुनाव से पहले गठबंधन की मजबूती के संकेत के तौर पर देखा गया. उसी साल नीतीश कुमार एनडीए छोड़कर लालू यादव के साथ महागठबंधन में जा चुके थे, ऐसे में रामविलास पासवान का भोज एनडीए की एकजुटता का प्रदर्शन माना गया.

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इसके बाद फिर 2017 में जब बिहार में महागठबंधन की सरकार थी तो मकर संक्रांति के मौके पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार राबड़ी आवास पहुंचे और लालू यादव के दही-चूड़ा भोज में शामिल हुए. इस दौरान लालू यादव ने नीतीश कुमार के माथे पर दही का टीका लगाते हुए कहा था कि यह बीजेपी के जादू-टोने से बचाने के लिए है. मीडिया के सामने लालू ने इसे बिहार की राजनीति में दोस्ती की मजबूत तस्वीर पेश करने की कोशिश की. हालांकि कुछ ही महीनों बाद यह तस्वीर बदल गई. नीतीश कुमार ने महागठबंधन छोड़कर एक बार फिर बीजेपी का दामन थाम लिया और लालू का टोटका बेअसर साबित हुआ.

जेल में रहते हुए भी दही-चूड़ा की चिंता

इसके बाद फिर 2018 में चारा घोटाले के मामलों में जेल में बंद लालू यादव ने दही-चूड़ा भोज को आधार बनाकर जमानत की गुहार तक लगा दी थी. दरअसल जब 12 जनवरी 2018 को रांची हाई कोर्ट में उनकी जमानत याचिका खारिज हुई तो लालू यादव ने अदालत में भावनात्मक अपील करते हुए कहा कि हुजूर, जमानत नहीं दीजिएगा तो दही-चूड़ा भोज कैसे देंगे? हजारों लोग आते हैं. हम नहीं रहेंगे तो बेइज्जती होगी. इस पर जस्टिस शिवपाल सिंह ने कहा, चिंता मत कीजिए, हम लोग यहीं दही-चूड़ा खा लेंगे. लालू तुरंत बोले नहीं हुजूर, मेरे साथ भोज खाने पर लोग आपको भी बदनाम कर देंगे.

सियासी डिप्लोमेसी का संकेत है दही-चूड़ा

आज बिहार की राजनीति में दही-चूड़ा भोज सिर्फ मकर संक्रांति की परंपरा नहीं रहा. यह सत्ता के समीकरण साधने, गठबंधन मजबूत करने और विरोधियों को संदेश देने का मंच बन चुका है. कौन किसके यहां दही-चूड़ा खाने पहुंचा, किसने किसे न्योता दिया और किसने दूरी बनाई, इन्हीं सवालों में बिहार की राजनीति का भविष्य छिपा रहता है. यही वजह है कि दही-चूड़ा अब सिर्फ व्यंजन नहीं, बल्कि बिहार की सियासी डिप्लोमेसी की पहचान बन चुका है.

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