Prashant Kishor : राजनीतिक रणनीतिकार से नेता बने प्रशांत किशोर की पार्टी जन सुराज अपने पहले ही विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद गंभीर राजनीतिक संकट के दौर से गुजर रही है. 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में एक भी सीट नहीं जीत पाने वाली जन सुराज पार्टी अब संगठनात्मक टूट, बड़े चेहरों के इस्तीफे और भविष्य की रणनीति को लेकर असमंजस की स्थिति में नजर आ रही है. चुनाव में पार्टी ने 238 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे, लेकिन पार्टी को महज लगभग 3 से 4 प्रतिशत वोट ही मिले और अधिकांश उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई. जिस पार्टी को बिहार की राजनीति में तीसरे मोर्चे के रूप में देखा जा रहा था, उसका पहला प्रयोग पूरी तरह विफल साबित हुआ.
चुनावी हार के बाद संगठन में भूचाल
चुनावी नतीजों के तुरंत बाद जन सुराज पार्टी ने अपने सभी नामित आंतरिक कमेटियों को भंग कर दिया. पार्टी नेतृत्व ने नवंबर में यह फैसला लिया कि अब पार्टी में बूथ स्तर तक निर्वाचित समितियां बनाई जाएंगी ताकि जमीनी स्तर पर संगठन को मजबूत किया जा सके. पार्टी नेताओं का कहना है कि चुनाव में मिली हार से सबक लेते हुए अब संगठन को नए सिरे से खड़ा किया जाएगा. पार्टी का मानना है कि जल्दबाजी में खड़ा किया गया संगठन चुनावी दबाव नहीं झेल सका.
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पार्टी को लगा कई बड़ा झटका
जन सुराज को सबसे बड़ा झटका तब लगा जब भोजपुरी सिनेमा के लोकप्रिय गायक और अभिनेता रितेश पांडे ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया. रितेश पांडे ने रोहतास जिले की करगहर सीट से चुनाव लड़ा था. इस्तीफा देते हुए रितेश पांडे ने कहा कि वह अब अपने संगीत करियर पर ध्यान देना चाहते हैं और मौजूदा हालात में राजनीति के जरिए जनता की सेवा कर पाना संभव नहीं है. रितेश पांडे जन सुराज का चेहरा माने जाते थे और युवाओं के बीच उनकी अच्छी पकड़ थी. चुनाव प्रचार के दौरान वे लगातार पार्टी के लिए रोड शो और सभाएं कर रहे थे. उनके इस्तीफे को पार्टी के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है.
RCP सिंह की घर वापसी की अटकलें
इसी बीच पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री RCP सिंह को लेकर भी राजनीतिक हलकों में हलचल तेज हो गई है. RCP सिंह, जिनकी पार्टी आप सबकी आवाज का विलय जन सुराज में हुआ था, अब फिर से मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की जदयू में लौट सकते हैं. हाल ही में RCP सिंह ने नीतीश कुमार की तारीफ करते हुए उन्हें अपना पुराना मार्गदर्शक बताया, जिससे राजनीतिक गलियारों में उनके जदयू में लौटने की अटकलें तेज हो गई हैं. हालांकि RCP सिंह ने अभी तक औपचारिक तौर पर कोई घोषणा नहीं की है, लेकिन उनके बयान और गतिविधियों से यह साफ हो रहा है कि वे जन सुराज में असहज महसूस कर रहे हैं.
प्रशांत किशोर की चुप्पी और रणनीति
चुनावी हार के बाद से प्रशांत किशोर सार्वजनिक तौर पर काफी कम नजर आ रहे हैं. हालांकि उन्होंने हार की जिम्मेदारी खुद लेते हुए कहा था कि जनता उनके प्रयोग को स्वीकार नहीं कर पाई. दिसंबर में कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी से उनकी मुलाकात ने भी सियासी अटकलों को हवा दी थी. माना जा रहा है कि प्रशांत किशोर फरवरी से फिर से बिहार की राजनीति में सक्रिय होंगे और संगठन के पुनर्गठन में खुद कमान संभालेंगे. वहीं राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बिहार की जातिगत और क्षेत्रीय राजनीति में नई पार्टी के लिए जगह बनाना बेहद मुश्किल काम है. जदयू-भाजपा गठबंधन और राजद-कांग्रेस महागठबंधन के बीच जन सुराज खुद को स्थापित नहीं कर पाई.
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हालांकि पार्टी का दावा है कि यह सिर्फ शुरुआत है और आने वाले चुनावों में बेहतर प्रदर्शन किया जाएगा, लेकिन मौजूदा हालात जन सुराज के भविष्य पर सवाल खड़े कर रहे हैं. जन सुराज पार्टी के लिए यह समय अस्तित्व की लड़ाई जैसा है. बड़े चेहरों के जाने, संगठनात्मक कमजोरी और जनता के भरोसे की कमी ने पार्टी को गहरे संकट में डाल दिया है. अब देखना होगा कि प्रशांत किशोर इस राजनीतिक प्रयोग को दोबारा खड़ा कर पाते हैं या यह प्रयोग इतिहास के पन्नों में सिमट कर रह जाएगा.