Tejashwi Yadav politics : मीडिया रिपोर्ट की मानें तो राष्ट्रीय जनता दल (RJD) की राजनीति में शनिवार, 25 जनवरी का दिन ऐतिहासिक होने जा रहा है. पटना के एक होटल में आयोजित पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी प्रसाद यादव को पार्टी का कार्यकारी अध्यक्ष चुना जाना तय है. यानी की इस फैसले के बाद से राजद में लालू यादव महज कार्यकर्ता रह जाएंगे और तेजस्वी यादव पार्टी के सर्वेसर्वा हो जाएंगे. यह फैसला भले ही औपचारिक लग रहा हो लेकिन इसके राजनीतिक मायने बेहद गहरे हैं. दरअसल यह RJD में सत्ता के वास्तविक हस्तांतरण की शुरुआत मानी जा रही है.
अभी लालू यादव ही अध्यक्ष रहेंगे लेकिन तेजस्वी के हाथ होगी सत्ता
अपने मौजुदा कार्यकाल के हिसाब से लालू प्रसाद यादव 2028 तक राष्ट्रीय अध्यक्ष बने रहेंगे, लेकिन कार्यकारी अध्यक्ष के तौर पर तेजस्वी यादव को वही अधिकार मिलेंगे, जो अब तक राष्ट्रीय अध्यक्ष के पास थे. यानी कागज पर अध्यक्ष लालू होंगे, लेकिन पार्टी की कमान पूरी तरह तेजस्वी यादव के हाथ में होगी और 2028 के बाद तेजस्वी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनना सिर्फ एक औपचारिकता रह जाएगा.
स्वास्थ्य, कोर्ट और उम्र तीनों से जूझ रहे लालू
लालू प्रसाद यादव लंबे समय से गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं,कानूनी मामलों और राजनीतिक असफलताओं से जूझ रहे हैं. राजनीतिक जानकारों का कहना है कि लालू अब शारीरिक रूप से सक्रिय राजनीति के लिए सक्षम नहीं रह गए हैं. हाल के विधानसभा और लोकसभा चुनावों में यह साफ दिखा कि लालू की मौजूदगी अब पार्टी के लिए वोट खींचने का फैक्टर नहीं रही. राजनीतिक विश्लेषण में यह बात भी सामने आई है कि हालिया विधानसभा चुनाव में जिन सीटों पर लालू यादव ने प्रचार किया, वहां महागठबंधन को हार का सामना करना पड़ा. इससे यह धारणा मजबूत हुई कि लालू अब राजनीतिक रूप से प्रभावहीन हो चुके हैं. RJD के सहयोगी दल खासतौर पर कांग्रेस और वाम दल भी धीरे-धीरे लालू यादव की छवि से दूरी बनाने की कोशिश में लगे थे.
पार्टी से पहले परिवार हाथ से निकला?
राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी आम है कि एक समय पूरी पार्टी को संभालने वाले लालू यादव अब अपना परिवार भी एकजुट नहीं रख पा रहे हैं. परिवार के भीतर खींचतान, सार्वजनिक बयानबाज़ी और राजनीतिक मतभेद यह संकेत देते हैं कि लालू की पकड़ अब पहले जैसी नहीं रही. राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि लालू प्रसाद यादव की शारीरिक अवस्था अब उन्हें सक्रिय भूमिका निभाने की इजाज़त नहीं देती. लोकसभा और विधानसभा चुनाव में बड़ी हार के बाद यह RJD के लिए आत्ममंथन का समय है. अब तक RJD लालू के चेहरे पर चलती थी. लेकिन अब वे खुद पार्टी को अपनी छत्रछाया से मुक्त कर रहे हैं और तेजस्वी को पूरा मौका दे रहे हैं. हालांकि सच तो ये भी है कि उनके सामने कोई दूसरा विकल्प भी नहीं है.
RJD के राष्ट्रीय अध्यक्ष की ताकत क्या होती है?
RJD का राष्ट्रीय अध्यक्ष पार्टी का सर्वेसर्वा होता है. उसके पास पार्टी का नाम, झंडा और चुनाव चिन्ह बदलने का अधिकार रहता है.वो सांसद-विधायक चुनाव में टिकट वितरण का अंतिम फैसला ले सकता है. इसके साथ साथ चुनाव चिन्ह पर अध्यक्ष का हस्ताक्षर होता है, पार्टी नेताओं पर अनुशासनात्मक कार्रवाई का अधिकार, राष्ट्रीय और राज्य कार्यकारिणी के सदस्यों की नियुक्ति, पार्टी को कोर ग्रुप का गठन और राष्ट्रीय कार्यकारिणी बैठकों में अंतिम निर्णय लेना का अधिकार रहता है. कार्यकारी अध्यक्ष बनने के बाद ये तमाम शक्तियां तेजस्वी यादव के पास होंगी.
28 साल में 13 बार अध्यक्ष
5 जुलाई 1997 को RJD की स्थापना हुई, तब से लेकर अब तक लालू यादव ही राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे. जून 2025 में वे 13वीं बार राष्ट्रीय अध्यक्ष चुने गए थे. लेकिन अब पार्टी इतिहास के एक नए मोड़ पर खड़ी है. आज की बैठक सिर्फ संगठनात्मक बदलाव नहीं, बल्कि RJD के पोस्ट-लालू युग की औपचारिक शुरुआत मानी जा रही है. अब सवाल यह है कि क्या तेजस्वी यादव पार्टी को लालू के जंगल राज वाले छवि से पार्टी को बाहर निकाल पाएंगे? और RJD को दोबारा सत्ता की राजनीति में स्थापित कर पाएंगे?