अस्थिरता के दौर में जवाबदेहियों का जनमत…भारत-अमेरिका और चीन के बीच बांग्लादेश का कूटनीतिक इम्तिहान !

Bangladesh politics : जब दुनिया तकनीकी प्रगति और महिला सशक्तिकरण के नए आयाम छू रही है, ऐसे समय में भारत के पड़ोसी देश बांग्लादेश का जनादेश कई मायनों में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है. 12 फरवरी को हुए 13वें संसदीय चुनाव के नतीजों ने दो-तिहाई बहुमत के साथ राजनीतिक तस्वीर लगभग स्पष्ट कर दी है. 36 वर्षों में पहली बार ऐसा होने जा रहा है कि देश के सर्वोच्च पद पर कोई पुरुष आसीन होगा, हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि शेष है.

चुनावी परिणामों में Bangladesh Nationalist Party (बीएनपी) के पक्ष में आए रुझान स्वयं में बड़ी सुर्खी हैं. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह परिणाम काफी हद तक अपेक्षित था. इसके पीछे कई तर्क दिए जा रहे हैं. चुनाव से पहले Awami League को चुनाव में भाग लेने की अनुमति नहीं दी गई, जिससे राजनीतिक संतुलन प्रभावित हुआ. दूसरी ओर Jamaat-e-Islami Bangladesh ने अपनी दावेदारी मजबूत बताई, लेकिन जानकारों के अनुसार उसकी जमीनी पकड़ और व्यापक जनविश्वास अभी उतना सुदृढ़ नहीं है जितना सत्ता प्राप्ति के लिए आवश्यक होता है.

जनता का एक बड़ा वर्ग अवामी लीग को सत्ता से हटाना चाहता था, किंतु वह जमात-ए-इस्लामी को विकल्प के रूप में स्वीकार करने के पक्ष में नहीं था. ऐसे परिदृश्य में बीएनपी का मजबूत प्रदर्शन लगभग तय माना जा रहा था. अब जबकि परिणाम सामने आ चुके हैं और यह संकेत मिल रहे हैं कि 17 वर्षों से देश से बाहर रह रहे पूर्व प्रधानमंत्री Khaleda Zia के पुत्र Tarique Rahman देश के अगले प्रधानमंत्री बन सकते हैं, तो अनेक महत्वपूर्ण प्रश्न सामने खड़े हो गए हैं.

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बांग्लादेश इस समय राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक अस्थिरता के दौर से गुजर रहा है. भारत जैसे बड़े पड़ोसी देश के साथ उसके संबंधों में भी पिछले कुछ समय में तनाव देखा गया है. राजनीतिक, कूटनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक इन सभी मोर्चों पर नीतिगत चुनौतियाँ मौजूद हैं. ऐसे समय में स्पष्ट जनादेश के साथ बीएनपी को लगभग दो दशक बाद सत्ता में वापसी का अवसर मिलना अत्यंत महत्वपूर्ण है. लेकिन बड़े सवाल है कि नई सरकार की विदेश नीति कैसी होगी? भारत, चीन और पाकिस्तान जैसे पड़ोसी देशों के साथ संबंध किस दिशा में आगे बढ़ेंगे? वैश्विक स्तर पर United States और China के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा के बीच दक्षिण एशिया में बांग्लादेश की रणनीतिक भूमिका क्या होगी? क्या नई सरकार अमेरिका के साथ निकटता बढ़ाएगी या संतुलित विदेश नीति अपनाएगी? क्या नीति-निर्माण में बाहरी प्रभावों को सीमित करने की कोशिश होगी? जिसके जबाव आने वाले दिनों में साफ हो जाएगा…

आंतरिक स्तर पर भी चुनौतियां कम नहीं हैं. 24 अगस्त 2025 को तत्कालीन प्रधानमंत्री Sheikh Hasina के पद से हटने के बाद देश में जो सांप्रदायिक और सामाजिक तनाव उभरा, क्या नई सरकार उस पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित कर पाएगी? क्या जनादेश को समस्याओं के समाधान की दिशा में निर्णायक कदम माना जाए, या यह केवल राजनीतिक परिवर्तन का संकेत है? इन तमाम प्रश्नों में सबसे महत्वपूर्ण है भारत-बांग्लादेश संबंधों का भविष्य. हाल के वर्षों में आई कटुता को दूर करने के लिए नई सरकार को संतुलित और व्यावहारिक कूटनीतिक रणनीति अपनानी होगी. प्रधानमंत्री Narendra Modi सहित भारत के विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा तारिक रहमान को दी गई बधाई तथा विदेश मंत्री S. Jaishankar की ओर से व्यक्त संवेदनाएं इस बात का संकेत देती हैं कि दोनों देशों के बीच संबंधों में नई पहल की संभावनाएँ मौजूद हैं. स्पष्ट है कि यह जनादेश केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि बांग्लादेश की आंतरिक स्थिरता और क्षेत्रीय कूटनीति की दिशा तय करने वाला एक निर्णायक मोड़ साबित हो सकता है.

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