AI का डर और डूब गया शेयर बाजार..! क्या सच में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के कारण खत्म हो जाएगी नौकरी

Will AI replace jobs : आज हर तरफ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) को लेकर चर्चा तेज है. नई तकनीक जहां एक ओर काम करने के तरीके बदल रही है, वहीं दूसरी ओर इसको लेकर नौकरियों के खत्म होने की आशंकाएं भी बढ़ रही हैं. आईटी सेक्टर में हालिया गिरावट और AI की तेज़ी से बढ़ती क्षमताओं ने इस बहस को और तीखा बना दिया है.देश और दुनिया में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) को लेकर उत्साह और आशंका दोनों चरम पर हैं. AI आधारित टूल्स और ऑटोमेशन तकनीक के तेज विस्तार ने निवेशकों और कर्मचारियों के बीच असमंजस की स्थिति पैदा कर दी है.

जिसका नतीजा हुआ कि हाल के कारोबारी सत्रों में आईटी सेक्टर में भारी गिरावट दर्ज की गई है. प्रमुख आईटी कंपनियों जैसे TCS और Infosys के शेयरों में करीब 6% तक की गिरावट देखी गई. बाजार विशेषज्ञों के मुताबिक कुछ ही दिनों के अंदर आईटी कंपनियों के मार्केट कैप से लगभग 6 लाख करोड़ रुपये तक की वैल्यू कम हो गई. निवेशकों को आशंका है कि AI आधारित ऑटोमेशन पारंपरिक आईटी सेवाओं की मांग को प्रभावित कर सकता है. हालांकि आईटी सेक्टर के एक वरिष्ठ विश्लेषक ने कहा कि AI से उत्पादकता बढ़ेगी, लेकिन सर्विस-आधारित मॉडल पर निर्भर कंपनियों को अपने बिजनेस मॉडल में बदलाव करना होगा.

क्या आम लोगों की नौकरियां छीन लेगा AI?

कस्टमर सर्विस, डेटा एंट्री, बेसिक प्रोग्रामिंग और सपोर्ट जैसी भूमिकाओं में AI चैटबॉट्स और ऑटोमेशन टूल्स तेजी से जगह बना रहे हैं. जिसको लेकर निजी और सरकारी क्षेत्रों में काम कर रहे लाखों कर्मचारियों के मन में यह सवाल है कि क्या AI उनकी नौकरी के लिए खतरा बनेगा. उदाहरण के तौर पर ChatGPT जैसे AI टूल्स अब ग्राहक सेवा, कंटेंट निर्माण और कोडिंग में सहायता कर रहे हैं. कई फैक्ट्रियों और रेस्टोरेंट्स में रोबोट्स का इस्तेमाल बढ़ रहा है. सरकारी क्षेत्र में भी ई-गवर्नेंस परियोजनाओं में AI का समावेश हो रहा है. हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि AI पूरी तरह रोजगार खत्म नहीं करेगा लेकिन कुछ नौकरियों की प्रकृति बदलेगा और नई तकनीक के साथ नए कौशल और नई भूमिकाएं भी जन्म लेती हैं.

भारत में कंप्यूटरीकरण का विरोध

जानकारी के लिए बता दें कि AI को लेकर जो भय आज दिख रहा है,वैसा ही डर का माहौल 1980 और 1990 के दशक में भारत में कंप्यूटरीकरण के समय भी था. भारत में कंप्यूटर का आगमन 1950 के दशक में हुआ, लेकिन 1980 के दशक में इसका व्यापक प्रसार शुरू हुआ. जब Rajiv Gandhi प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने देश में कंप्यूटरीकरण को बढ़ावा दिया जिसके बाद फिर 1984 में रंगराजन कमेटी ने बैंकों में कंप्यूटर लगाने की सिफारिश की. उस समय ट्रेड यूनियनों ने इसका कड़ा विरोध किया. 1984 को एंटी-कंप्यूटरीकरण ईयर घोषित किया गया. बैंक कर्मचारियों ने हड़तालें कीं और आशंका जताई कि कंप्यूटर से 20-30% स्टाफ कम हो जाएगा. रेलवे में भी कंप्यूटरीकृत रिजर्वेशन सिस्टम लागू करने के दौरान भी All India Railwaymen’s Federation ने विरोध प्रदर्शन किया तो वहीं केरल में वामपंथी दलों ने भी कंप्यूटरीकरण को बुर्जुआ साजिश करार दिया. इस दौरान सरकारी दफ्तरों में मशीनों को नुकसान पहुंचाने की घटनाएं भी सामने आईं.

सुधारों के बाद बदली तस्वीर

विरोध के बाद भी 1991 के आर्थिक सुधारों के दौरान भारत में कंप्यूटरीकरण ने गति पकड़ी. बैंकों में एटीएम आए, रेलवे में ऑनलाइन टिकटिंग शुरू हुई, और निजी क्षेत्र में आईटी सेवाओं का विस्तार हुआ. 1980 से 2000 के बीच जिन सेक्टरों में कंप्यूटरीकरण हुआ, वहां उत्पादकता और लोगों के आय में लगभग 50% तक वृद्धि दर्ज की गई. हालांकि अनस्किल्ड वर्कर्स की आय में समान अनुपात में वृद्धि नहीं हुई. कई पारंपरिक भूमिकाएं समाप्त हुईं, लेकिन साथ ही सॉफ्टवेयर, नेटवर्किंग और आईटी सेवाओं में नई नौकरियां भी पैदा हुईं. नतीजा हुआ कि आज भारत को आईटी हब के रूप में पहचान मिली है. India की सॉफ्टवेयर इंडस्ट्री तेज़ी से बढ़ी क्योंकि बड़ी संख्या में युवाओं ने कंप्यूटर और प्रोग्रामिंग सीखी.

हालांकि भारत ही नहीं दुनिया के कई देशों ने भी तकनीकी बदलावों का विरोध झेला. अमेरिका में 1960 के दशक में ऑटोमेशन के खिलाफ यूनियनें सक्रिय थीं. ब्रिटेन में 1984 की माइनर्स स्ट्राइक के दौरान तकनीकी बदलाव भी एक मुद्दा बना. वहीं जापान ने 1980 के दशक में रोबोटिक्स को तेजी से अपनाया और उसकी अर्थव्यवस्था को मजबूती मिली. विशेषज्ञों का कहना है कि जो देश और कंपनियां तकनीक को अपनाती हैं और अपने वर्कफोर्स को नए कौशल से लैस करती हैं, वही आगे बढ़ती हैं.

भारत की अर्थव्यवस्था को नई ऊंचाइयों पर ले जाएगा AI

AI को रोकना संभव नहीं है, ठीक वैसे ही जैसे कंप्यूटरीकरण को रोका नहीं जा सका. लेकिन यह भी सच है कि हर तकनीकी क्रांति कुछ नौकरियों को खत्म करती है और कुछ नई पैदा करती है. आर्थिक विश्लेषकों का मानना है कि सरकार और कंपनियों को स्किल डेवलपमेंट, री-स्किलिंग और अप-स्किलिंग पर जोर देना होगा. शिक्षा प्रणाली में AI और डिजिटल कौशल को शामिल करना समय की मांग है. एक वरिष्ठ टेक विशेषज्ञ के शब्दों में कहें तो AI दुश्मन नहीं है, यह एक टूल है. जो इसे अपनाएगा और सीख लेगा, वही भविष्य की अर्थव्यवस्था में नेतृत्व करेगा. डर और अफवाहों के बजाय अगर नीति, प्रशिक्षण और नवाचार पर ध्यान दिया जाए, तो AI भारत की अर्थव्यवस्था को नई ऊंचाइयों पर ले जा सकता है.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *