Health News : विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और इसकी कैंसर अनुसंधान शाखा इंटरनेशनल एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर (IARC) द्वारा जारी एक ऐतिहासिक वैश्विक विश्लेषण में खुलासा हुआ है कि दुनिया भर में होने वाले हर दस नए कैंसर मामलों में से चार को रोका जा सकता है। रिपोर्ट के अनुसार तंबाकू सेवन, शराब का उपयोग, मोटापा, शारीरिक निष्क्रियता, वायु प्रदूषण और एचपीवी तथा हेलिकोबैक्टर पाइलोरी जैसे संक्रमण प्रमुख परिवर्तनीय जोखिम कारक हैं।
185 देशों के आंकड़ों पर आधारित अध्ययन
यह व्यापक अध्ययन 185 देशों के डेटा और 36 प्रकार के कैंसर पर आधारित है। रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2022 में दर्ज 18.7 मिलियन नए कैंसर मामलों में से लगभग 7.1 मिलियन मामले ऐसे कारणों से जुड़े थे जिन्हें प्रभावी सार्वजनिक स्वास्थ्य रणनीतियों के माध्यम से रोका जा सकता था। तंबाकू अकेले लगभग 15% नए कैंसर मामलों के लिए जिम्मेदार पाया गया। इसके बाद संक्रमणजन्य कारण (लगभग 10%) और शराब का सेवन (करीब 3%) प्रमुख योगदानकर्ताओं के रूप में सामने आए। डब्ल्यूएचओ विशेषज्ञों ने इसे कैंसर जोखिम पर पहला व्यापक वैश्विक विश्लेषण बताया है, जो रोकथाम के विशाल अवसरों की ओर संकेत करता है।
भारत में तंबाकू सबसे बड़ा जोखिम
जानकार कहते है कि कैंसर की रोकथाम केवल सैद्धांतिक अवधारणा नहीं है, बल्कि यह पूरी तरह संभव है। उन्होंने बताया कि भारत में तंबाकू अब भी कैंसर का सबसे बड़ा रोके जा सकने वाला कारण है। धूम्रपान और बिना धुएं वाले तंबाकू दोनों ही मुंह, फेफड़े, स्वरयंत्र, अन्नप्रणाली और मूत्राशय के कैंसर का खतरा कई गुना बढ़ा देते हैं। भारत में मुंह के कैंसर का बोझ विशेष रूप से अधिक है, जिसका मुख्य कारण तंबाकू चबाने की व्यापक आदत है। बीड़ी, सिगरेट, गुटखा और खैनी को उन्होंने स्थापित कैंसरकारक बताते हुए तंबाकू नियंत्रण कानूनों के सख्त क्रियान्वयन, धूम्रपान छोड़ने के कार्यक्रमों को मजबूत करने और जन-जागरूकता अभियानों को प्राथमिकता देने की आवश्यकता पर बल दिया।
जीवनशैली से जुड़े कैंसर मामलों में वृद्धि
हालांकि तंबाकू अभी भी प्रमुख कारक है, लेकिन जीवनशैली से संबंधित कैंसर तेजी से बढ़ रहे हैं। जानकारों के अनुसार, मोटापा, असंतुलित आहार, गतिहीन जीवनशैली, शराब सेवन और बढ़ता वायु प्रदूषण स्तन, कोलोरेक्टल और प्रोस्टेट कैंसर के मामलों में वृद्धि से जुड़े हुए हैं। तेजी से बढ़ते शहरीकरण ने भारतीयों के खान-पान और जीवनशैली में बड़े बदलाव लाए हैं। लंबे समय तक बैठना, अति-प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों का सेवन और खराब चयापचय स्वास्थ्य कैंसर जोखिम को बढ़ा रहे हैं। विशेषज्ञों का सुझाव है कि सप्ताह में 150 से 300 मिनट तक मध्यम तीव्रता का व्यायाम,जैसे तेज चलना, साइकिल चलाना या तैराकी,स्वस्थ वजन बनाए रखने, इंसुलिन संवेदनशीलता सुधारने, सूजन कम करने और हार्मोनल संतुलन बनाए रखने में सहायक है।
योग की पूरक भूमिका
रिपोर्ट में पारंपरिक स्वास्थ्य पद्धतियों की भी चर्चा की गई है। जानकारों के अनुसार, सूर्य नमस्कार, प्राणायाम और ध्यान जैसी विधियाँ फेफड़ों की कार्यक्षमता में सुधार करती हैं, तनाव हार्मोन को कम करती हैं और प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत बनाती हैं। दीर्घकालिक तनाव को कैंसरजनन से जुड़े सूजन और हार्मोनल मार्गों से जोड़ा गया है। विशेषज्ञ मानते हैं कि ध्यान और श्वास अभ्यास इन जैविक प्रक्रियाओं को सकारात्मक रूप से प्रभावित कर सकते हैं। हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि योग साक्ष्य-आधारित चिकित्सा का विकल्प नहीं, बल्कि एक पूरक जीवनशैली हस्तक्षेप है।
शीघ्र पहचान भी उतनी ही जरूरी
विशेषज्ञों का कहना है कि कैंसर नियंत्रण केवल रोकथाम तक सीमित नहीं है; समय पर पहचान भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। भारत में जागरूकता की कमी, सामाजिक कलंक और सीमित स्क्रीनिंग सुविधाओं के कारण कई मामलों में कैंसर का निदान देर से होता है। जानकारों के अनुसार स्तन कैंसर के लिए मैमोग्राफी, गर्भाशय ग्रीवा कैंसर के लिए पैप स्मीयर और एचपीवी परीक्षण, उच्च जोखिम वाले धूम्रपान करने वालों के लिए लो-डोज सीटी स्कैन तथा कोलोरेक्टल कैंसर के लिए कोलोनोस्कोपी से रोग का पता प्रारंभिक चरण में लगाया जा सकता है। कुछ उच्च जोखिम वाले मामलों में पीईटी-सीटी इमेजिंग रोग की सटीक अवस्था निर्धारित करने और उपचार योजना बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
राष्ट्रीय स्तर पर बहु-स्तरीय रणनीति की जरूरत
डब्ल्यूएचओ के अनुमान को सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ चेतावनी के रूप में देख रहे हैं। उनका कहना है कि तंबाकू नियंत्रण, स्वस्थ जीवनशैली को बढ़ावा, पारंपरिक स्वास्थ्य पद्धतियों का समुचित एकीकरण और समयबद्ध स्क्रीनिंग कार्यक्रमों के माध्यम से भारत में कैंसर का बोझ उल्लेखनीय रूप से घटाया जा सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार कैंसर रातोंरात समाप्त नहीं होगा। लेकिन जब हर दस में से चार मामले रोके जा सकते हैं, तो सवाल यह नहीं है कि क्या हम रोक सकते हैं, बल्कि यह है कि क्या हम रोकने के लिए पर्याप्त कदम उठाएंगे?