Hymen breakage signs : देश में सेक्सुअल हेल्थ को लेकर जागरूकता की कमी आज भी एक बड़ी सामाजिक चुनौती बनी हुई है. विशेषज्ञों का मानना है कि बुनियादी जानकारी के अभाव में कई मिथक और गलत धारणाएं पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ती रही हैं. एक समाचार चैनल से बातचीत में स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. तनुश्री (नाम परिवर्तित) ने महिला शरीर, वर्जिनिटी, जी-स्पॉट और ऑर्गैज्म से जुड़े सवालों पर विस्तार से प्रकाश डाला.
वर्जिनिटी और हाइमेन को लेकर क्या है चर्चा
डॉ. तनुश्री ने कहा कि वर्जिनिटी एक सामाजिक अवधारणा है, जिसे महिलाओं के चरित्र से जोड़कर देखा जाता रहा है. आम धारणा है कि पहली बार यौन संबंध बनाने पर हर महिला को रक्तस्राव होता है. विशेषज्ञों के अनुसार यह धारणा वैज्ञानिक रूप से गलत है. उन्होंने स्पष्ट किया कि हाइमेन (झिल्ली) कोई कठोर परत नहीं होती जो हर बार फटती ही हो. यह एक लचीला ऊतक होता है, जो रबर बैंड की तरह खिंच सकता है. कई महिलाओं में यह जन्म से ही बहुत पतला या लगभग नही होता है. खेलकूद, तैराकी, साइकिलिंग या अन्य शारीरिक गतिविधियों के कारण भी यह पहले ही फैल सकता है. आंकड़ों के अनुसार बड़ी संख्या में महिलाओं को पहली बार संबंध के दौरान रक्तस्राव नहीं होता, और इसका वर्जिनिटी से कोई सीधा संबंध नहीं है.
जी-स्पॉट को लेकर क्या है धारणा
महिला शरीर में तथाकथित जी-स्पॉट को लेकर भी कई तरह की धारणाएं प्रचलित हैं. डॉ. तनुश्री ने बताया कि इसे किसी एक निश्चित बिंदु के रूप में समझना सही नहीं है. आधुनिक शोध से यह स्पष्ट हुआ है कि क्लिटोरिस केवल बाहरी भाग तक सीमित नहीं है, बल्कि उसका आंतरिक हिस्सा भी होता है जो योनि की ऊपरी दीवार के पास फैला रहता है. उन्होंने कहा कि जिसे पहले जी-स्पॉट कहा जाता था, वह दरअसल क्लिटोरिस के आंतरिक हिस्से से जुड़ा संवेदनशील क्षेत्र है. यह कोई छोटा सा बटन नहीं बल्कि ऊतक का एक क्षेत्र है, जिसमें नसों की अधिकता होती है. हर महिला के लिए यह संवेदनशीलता अलग-अलग हो सकती है.
महिलाओं में ऑर्गैज्म…क्यों है अलग अनुभव?
यौन सुख या ऑर्गैज्म को लेकर भी कई भ्रांतियां हैं. समाज में अक्सर यह मान लिया जाता है कि पुरुषों के लिए क्लाइमेक्स आसान और महिलाओं के लिए कठिन होता है. विशेषज्ञों का कहना है कि यह तुलना अधूरी समझ पर आधारित है. डॉ. तनुश्री के अनुसार महिलाओं में ऑर्गैज्म केवल पेनिट्रेशन (प्रवेश) पर निर्भर नहीं होता. यौन संबंध एक व्यापक अनुभव है जिसमें भावनात्मक जुड़ाव, फोरप्ले और संवाद की अहम भूमिका होती है. कई महिलाएं केवल पेनिट्रेटिव सेक्स से क्लाइमेक्स तक नहीं पहुंच पातीं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि वे ऑर्गैज्म का अनुभव नहीं कर सकतीं. उन्होंने यह भी कहा कि महिलाओं में ऑर्गैज्म का अनुभव अत्यंत व्यक्तिगत होता है और इसे बाहरी संकेतों से हमेशा नहीं पहचाना जा सकता. इसलिए संवाद, समझ और आपसी सहमति अत्यंत महत्वपूर्ण हैं.
संवाद की कमी से बढ़ रही समस्याएं
विशेषज्ञों का मानना है कि महिलाओं के यौन स्वास्थ्य पर खुलकर चर्चा न होने के कारण कई समस्याएं अनदेखी रह जाती हैं. वजाइनल ड्रायनेस (योनि में सूखापन), संबंध के दौरान दर्द या असहजता जैसी समस्याएं अक्सर बातचीत की कमी के कारण बढ़ जाती हैं. कई महिलाएं इन्हें सामान्य मानकर चुपचाप सहती रहती हैं. डॉ. तनुश्री का कहना है कि यदि यौन संबंध के दौरान दर्द हो रहा है, तो यह संकेत है कि किसी विशेषज्ञ से सलाह लेने की जरूरत है. सही जानकारी और चिकित्सा परामर्श से इन समस्याओं का समाधान संभव है.
सेक्सुअल हेल्थ पर चर्चा से बढ़ रही जागरूकता
हाल के वर्षों में सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के माध्यम से सेक्सुअल हेल्थ पर खुलकर चर्चा शुरू हुई है. विशेषज्ञ अब वीडियो, पोस्ट और इंटरैक्टिव सत्रों के जरिए युवाओं तक वैज्ञानिक जानकारी पहुंचा रहे हैं. हालांकि, ग्रामीण और छोटे शहरों में अब भी जागरूकता की कमी साफ दिखाई देती है. विशेषज्ञों का मानना है कि स्कूल स्तर से ही वैज्ञानिक और संवेदनशील सेक्स एजुकेशन की शुरुआत होनी चाहिए, ताकि युवाओं को अपने शरीर, अधिकारों और स्वास्थ्य के बारे में सही जानकारी मिल सके. सेक्सुअल हेल्थ केवल शारीरिक नहीं, बल्कि मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य का भी हिस्सा है. मिथकों और सामाजिक दबावों से बाहर निकलकर यदि वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाया जाए, तो महिलाओं और पुरुषों दोनों के लिए स्वस्थ और संतुलित संबंध संभव हैं.