रेवड़ी कल्चर पर सरकार को फटकार..! अदालत ने डायरेक्ट कैश ट्रांसफर पर भी उठाया सवाल

Supreme Court on freebies culture : देश में चल रही मुफ्त योजनाओं यानी तथाकथित रेवड़ी कल्चर को लेकर बहस एक बार फिर तेज हो गई है. 19 फरवरी को Supreme Court of India में सुनवाई के दौरान न्यायालय ने चुनावों से पहले घोषित की जाने वाली मुफ्त योजनाओं पर गंभीर सवाल उठाए और राज्यों को संतुलित वित्तीय नीति अपनाने की नसीहत दी.

सुनवाई के दौरान अदालत ने क्या कहा ?

यह टिप्पणी उस समय की गई जब अदालत Tamil Nadu Power Distribution Corporation Limited की एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी. याचिका में 2024 के विद्युत संशोधन नियमों के नियम 23 को चुनौती दी गई है, जिसके तहत उपभोक्ताओं की आर्थिक स्थिति की परवाह किए बिना मुफ्त बिजली देने का प्रावधान किया गया है. मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ कर रही थी. पीठ ने कहा कि एक कल्याणकारी राज्य के रूप में सरकार का दायित्व है कि वह आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों को सहायता प्रदान करे, लेकिन जो लोग भुगतान करने में सक्षम हैं और जो नहीं हैं, उनके बीच अंतर किए बिना सार्वभौमिक सब्सिडी देना उचित नीति नहीं मानी जा सकती. अदालत ने तीखी टिप्पणी करते हुए पूछा कि अगर सरकार सुबह से शाम तक मुफ्त राशन, मुफ्त गैस, मुफ्त बिजली और सीधे खाते में नकद राशि देती रहेगी तो लोग काम क्यों करेंगे? क्या इससे काम करने की आदत प्रभावित नहीं होगी?

किस तरह का कल्चर विकसित हो रहा है?’

पीठ ने कहा कि यह केवल किसी एक राज्य का मुद्दा नहीं है, बल्कि पूरे देश में यह प्रवृत्ति देखने को मिल रही है. अदालत ने चिंता जताई कि चुनावों के आसपास अचानक नई योजनाओं की घोषणा क्यों की जाती है और क्या यह दीर्घकालिक विकास की कीमत पर अल्पकालिक राजनीतिक लाभ लेने का प्रयास तो नहीं है. अदालत ने कहा कि राज्यों को यह विचार करना चाहिए कि सीमित संसाधनों का उपयोग सड़कों, अस्पतालों, स्कूलों और बुनियादी ढांचे के विकास में किया जाए या चुनावी वादों के तहत मुफ्त वितरण में. न्यायालय ने यह भी पूछा कि यदि कोई राज्य राजस्व अधिशेष में भी है, तो क्या उसकी जिम्मेदारी नहीं बनती कि वह धन का उपयोग स्थायी विकास योजनाओं में करे?

डायरेक्ट कैश ट्रांसफर पर भी सवाल

सुनवाई के दौरान अदालत ने डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) योजनाओं पर भी चिंता व्यक्त की. पीठ ने कहा कि सरकारों को लोगों के लिए रोजगार के अवसर पैदा करने चाहिए ताकि वे आत्मनिर्भर बन सकें और आत्मसम्मान के साथ जीवन जी सकें. यदि मुफ्त सुविधाएं और नकद हस्तांतरण लगातार बढ़ते रहेंगे, तो इससे श्रम भागीदारी पर प्रभाव पड़ सकता है.

तमिलनाडु की मुफ्त बिजली योजना

याचिका में बताया गया है कि राज्य सरकार घरेलू उपभोक्ताओं को हर दो महीने में लगभग 100 यूनिट तक मुफ्त बिजली देती है. उपभोक्ता चाहे जितनी भी खपत करें, शुरुआती 100 यूनिट का बिल नहीं लिया जाता. अदालत ने सवाल उठाया कि बिजली दरों की घोषणा के बाद अचानक इस प्रकार की योजना क्यों लागू की गई. इस मामले में अदालत ने केंद्र सरकार और अन्य पक्षों को नोटिस जारी किया है. हालांकि यह पहली बार नहीं है जब शीर्ष अदालत ने मुफ्त योजनाओं पर टिप्पणी की हो. इससे पहले भी विभिन्न सुनवाइयों के दौरान अदालत ने मुफ्त राशन और अन्य लोकलुभावन योजनाओं को लेकर चिंता जताई थी और पूछा था कि ऐसे कार्यक्रम कब तक जारी रहेंगे.

राजनीतिक संदर्भ और आर्थिक प्रभाव

विशेषज्ञों का मानना है कि चुनावों से पहले राजनीतिक दल अक्सर मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए नकद सहायता, मुफ्त बिजली-पानी या अन्य सब्सिडी की घोषणा करते हैं. हालांकि, कई राज्यों की वित्तीय स्थिति पहले से दबाव में है और बढ़ते राजकोषीय घाटे के बीच इन योजनाओं की स्थिरता पर सवाल उठ रहे हैं. अदालत ने स्पष्ट किया कि वह इस मुद्दे से जुड़ी अन्य याचिकाओं पर भी विचार कर रही है. फिलहाल, इस मामले की अगली सुनवाई में केंद्र सरकार और संबंधित पक्षों के जवाब के बाद आगे की कार्रवाई तय की जाएगी.

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