लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले में विरोधाभास…जानें क्या है पूरा मामला

Live-in Relationships Laws : हाल ही में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के दो अलग-अलग मामलों में लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर दिए गए आदेशों ने कानूनी और सामाजिक बहस को जन्म दे दिया है. पहली नजर में ये फैसले एक-दूसरे से भिन्न प्रतीत होते हैं, लेकिन कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि दोनों मामलों के संदर्भ अलग होने के कारण अदालत का रुख भी अलग रहा.

इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसलों पर बहस

25 मार्च को न्यायमूर्ति जेजे मुनीर और न्यायमूर्ति तरुण सक्सेना की पीठ ने एक मामले में कहा कि यदि एक शादीशुदा व्यक्ति किसी वयस्क महिला के साथ उसकी सहमति से रह रहा है, तो इसे अपराध नहीं माना जा सकता. अदालत ने इस मामले में अगली सुनवाई तक याचिकाकर्ताओं की गिरफ्तारी पर रोक लगा दी थी. इसके विपरीत, कुछ दिन पहले न्यायमूर्ति विवेक कुमार सिंह ने एक अन्य मामले में सुनवाई करते हुए कहा था कि कोई भी शादीशुदा पुरुष या महिला, अपने जीवनसाथी के जीवित रहते और तलाक लिए बिना किसी अन्य व्यक्ति के साथ कानूनी रूप से लिव-इन रिलेशनशिप में नहीं रह सकते. अदालत ने इस मामले में याचिकाकर्ताओं को सुरक्षा देने से इनकार करते हुए कहा कि ऐसा संबंध कानूनी रूप से संरक्षित नहीं किया जा सकता. हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि याचिकाकर्ताओं को किसी प्रकार का खतरा है, तो वे पुलिस अधीक्षक से संपर्क कर सकते हैं.

विशेषज्ञों ने बताया क्यों हुआ फैसले में अंतर

इलाहाबाद उच्च न्यायालय बार एसोसिएशन के अध्यक्ष राकेश पांडे ने मीडिया द्वारा पूछे जानें पर इन दोनों मामलों पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि दोनों मामलों की प्रकृति अलग थी. उनके अनुसार, एक मामले में याचिकाकर्ताओं ने केवल पुलिस सुरक्षा की मांग की थी, जबकि दूसरे मामले में उनके खिलाफ दर्ज प्राथमिकी को चुनौती दी गई थी. उन्होंने बताया कि जिस मामले में सुरक्षा की मांग की गई थी, उसमें अदालत ने इसे व्यावहारिक नहीं माना और याचिकाकर्ताओं को पुलिस से संपर्क करने का सुझाव दिया. वहीं, दूसरे मामले में अदालत के सामने यह सवाल था कि क्या सहमति से साथ रहने वाले दो वयस्कों के खिलाफ कोई अपराध बनता है. इस पर अदालत ने स्पष्ट किया कि लिव-इन रिलेशनशिप अपने आप में किसी कानून के तहत अपराध नहीं है.

राकेश पांडे ने आगे कहा कि भारतीय कानून की धारा 494 और 495 बिना तलाक लिए दूसरी शादी को अपराध मानती हैं. इसलिए, अपराध की स्थिति तब बनती है जब कोई व्यक्ति विवाह रहते हुए दूसरा विवाह करता है, न कि केवल सहमति से लिव-इन में रहने पर. विशेषज्ञों का मानना है कि इन दोनों फैसलों को विरोधाभासी नहीं बल्कि अलग-अलग कानूनी परिस्थितियों के आधार पर दिया गया निर्णय समझा जाना चाहिए.

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