अल्ट्रा-पॉपुलिज्म नीति से बाधित हो रहा बिहार का विकास..! विपक्ष का आरोप और फंड संकट की क्या है असली वजह

Bihar economic policy : बिहार में एनडीए सरकार पर अल्ट्रा-पॉपुलिज्म यानी अत्यधिक लोकलुभावन नीतियां अपनाने के आरोप को लेकर सियासी घमासान तेज हो गया है. विपक्ष का कहना है कि राज्य सरकार लगभग 50,000 करोड़ रुपये की योजनाओं और राहत वितरण में खर्च कर रही है, जबकि राज्य खुद गंभीर फंड संकट से जूझ रहा है.

विकास कार्यों पर पड़ा असर

मीडिया रिपोर्ट में सरकारी अधिकारियों और ठेकेदारों के हवाले से दावा किया गया है कि राज्य में ग्रामीण कार्य, सड़क निर्माण और लोक स्वास्थ्य अभियंत्रण विभाग की कई परियोजनाएं भुगतान न होने के कारण प्रभावित हुई हैं. सरकार पैसे की कमी का हवाला देकर आंशिक भुगतान कर रही है. हालांकि यह समस्या किसी एक विभाग तक सीमित नहीं है, बल्कि कई विभागों में ऐसी स्थिति बनी हुई है. छोटे ठेकेदारों को भुगतान न मिलने के कारण काम रोकने की नौबत आ गई है. रिपोर्ट की मानें तो सिर्फ ग्रामीण कार्य और सड़क निर्माण विभाग पर ही करीब 15,000 करोड़ रुपये का बकाया बताया जा रहा है.

विपक्ष का हमला

मामले को लेकर आरजेडी के राष्ट्रीय प्रवक्ता सुबोध कुमार मेहता ने सरकार की आलोचना करते हुए कहा कि जब किसी राज्य की वार्षिक आय 65,000 करोड़ रुपये हो और वह 50,000 करोड़ रुपये से ज्यादा की राहत योजनाएं चलाए तो ऐसी स्थिति होना तय है. उन्होंने इसे नीतिगत पंगुता बताया और कहा कि बिहार के पास महाराष्ट्र और गुजरात जैसे राज्यों की तरह राजस्व बढ़ाने वाले बड़े प्रोजेक्ट नहीं हैं. वहीं इस मामले में कांग्रेस प्रवक्ता असित नाथ तिवारी ने भी सरकार को घेरते हुए कहा कि एक तरफ मुख्यमंत्री Nitish Kumar समृद्धि यात्रा कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर राज्य के खजाने खाली होने की बात सामने आ रही है.

सरकार का पक्ष

वहीं जेडीयू ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि फंड की कमी अस्थायी है. पार्टी के मुख्य प्रवक्ता नीरज कुमार ने कहा कि सरकार ने अपने आवंटित फंड का 100% उपयोग किया है और पिछली सरकारों की तरह मार्च में अतिरिक्त निकासी नहीं की गई है. उन्होंने भरोसा दिलाया कि सरकार अपनी कल्याणकारी योजनाओं को जारी रखेगी और जल्द ही स्थिति सामान्य हो जाएगी.

फंड संकट की क्या है असली वजह

2025 विधानसभा चुनाव से पहले राज्य सरकार ने मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना शुरू की, जिसके तहत करीब 18,000 करोड़ रुपये 1.82 करोड़ महिलाओं को दिए गए. इसके अलावा 1.89 करोड़ उपभोक्ताओं को हर साल करीब 5,000 करोड़ रुपये की बिजली सब्सिडी दी जा रही है. सरकारी अधिकारियों का कहना है कि सिर्फ कल्याणकारी योजनाएं ही इस संकट की वजह नहीं हैं. बिहार की आय का बड़ा हिस्सा (करीब 74%) केंद्र सरकार पर निर्भर है. अगर केंद्र से पैसे आने में देरी हो जाए या विभाग समय पर उपयोग प्रमाणपत्र (Utilisation Certificates) जमा न करें, तो फंड का प्रवाह रुक जाता है. इसके अलावा राज्य के कुल बजट का लगभग 45% हिस्सा वेतन, पेंशन और पुराने कर्ज के ब्याज में खर्च हो जाता है, जिससे नए प्रोजेक्ट और ठेकेदारों के भुगतान के लिए बहुत कम राशि बचती है.

मार्च ब्लूज और बढ़ता दबाव

रिपोर्ट में वित्त विभाग के एक अधिकारी के हवाले से दावा किया गया कि फंड की कमी होने पर सरकार अक्सर कल्याणकारी योजनाओं को प्राथमिकता देती है और ठेकेदारों का भुगतान टाल दिया जाता है. अगर 31 मार्च तक बिल पास नहीं हो पाता, तो वह राशि समाप्त मानी जाती है और अगले बजट में दोबारा मांग करनी पड़ती है. इससे बकाया भुगतान का बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है. कुल मिलाकर बिहार में एक तरफ सामाजिक योजनाओं के जरिए जनता को राहत देने की कोशिश हो रही है, वहीं दूसरी तरफ फंड की कमी से विकास कार्य प्रभावित हो रहे हैं. आने वाले समय में सरकार के लिए संतुलन बनाना बड़ी चुनौती साबित हो सकता है.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *