Pappu yadav : महिला आरक्षण और राजनीति में महिलाओं की भागीदारी को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है. पूर्णिया से निर्दलीय सांसद पप्पू यादव ने एक सार्वजनिक बयान में दावा किया है कि राजनीति में आने वाली 90% महिलाओं को किसी न किसी नेता के दबाव या शोषण का सामना करना पड़ता है. उनके इस बयान ने सियासी गलियारों में तीखी प्रतिक्रिया पैदा कर दी है.
महिलाओं की भागीदारी पर सवाल
सांसद ने अपने संबोधन में कहा कि महिलाओं के खिलाफ शोषण केवल राजनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज के कई क्षेत्रों में यह एक व्यापक समस्या है. उन्होंने स्कूल, कॉलेज और ऑफिस जैसे स्थानों का जिक्र करते हुए कहा कि महिलाओं को हर स्तर पर उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है और अक्सर उन्हें न्याय नहीं मिल पाता. पप्पू यादव ने दलित और पिछड़े वर्ग की महिलाओं की भागीदारी पर भी सवाल उठाए. उनका कहना है कि देश के उच्च पदों जैसे न्यायपालिका, सेना, पुलिस, विश्वविद्यालय और मीडिया में दलित और अत्यंत पिछड़े वर्ग (EBC) की महिलाओं की मौजूदगी बेहद कम है. उन्होंने मांग की कि महिला आरक्षण लागू करने से पहले जातिगत जनगणना कराई जानी चाहिए ताकि वास्तविक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जा सके.
लोकसभा में क्यों गिर गया महिला आरक्षण बिल
महिला आरक्षण बिल, जिसे 2023 में भारी बहुमत से पारित किया गया था, अभी तक लागू नहीं हो पाया है. इस कानून के तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं को 33% आरक्षण देने का प्रावधान है. हालांकि, इसके लागू होने की शर्त परिसीमन (Delimitation) और जनगणना से जुड़ी हुई है. हाल ही में सरकार ने इसे जल्द लागू करने के लिए एक नया संविधान संशोधन प्रस्ताव पेश किया था, जिसमें लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाकर 850 करने और 2011 की जनगणना के आधार पर परिसीमन लागू करने की बात कही गई थी. लेकिन यह प्रस्ताव संसद में आवश्यक दो-तिहाई बहुमत हासिल नहीं कर सका और गिर गया.
इस प्रस्ताव को लेकर विवाद भी सामने आया. रिपोर्ट्स के अनुसार, अगर यह लागू होता तो हिंदी भाषी राज्यों की लोकसभा सीटें बढ़ जातीं, जबकि दक्षिण भारत के राज्यों की हिस्सेदारी घट सकती थी.