fuel price impact : पश्चिम एशिया संकट के बीच संभावित मंदी की खबरों के साथ शुक्रवार की सुबह आम भारतीयों के लिए तेल की कीमतों में बढ़ोतरी के साथ हुई. देश भर में पेट्रोल-डीजल ₹3-3 प्रति लीटर महंगे हुए हैं. इससे पहले सोना-चांदी की कीमतों में इजाफा हुआ तो तो इसके बाद फिर अमूल और मदर डेयरी ने दूध की कीमतें बढ़ा दी उसके बाद फिर सीएनजी की कीमतों में बढ़ोतरी हुई, कुल मिलाकर देखें तो पश्चिम एशिया में जारी युद्ध और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति में आई बाधाओं का असर अब भारत की अर्थव्यवस्था पर भी दिखाई देने लगा है. पेट्रोल-डीजल की कीमतों, गैस की उपलब्धता, महंगाई, रोजगार और छोटे कारोबारियों को लेकर चिंता लगातार बढ़ रही है. हालात पर काबू पाने के लिए प्रधानमंत्री ने ईंधन बचत, वर्क फ्रॉम होम और गैर-जरूरी खर्चों में कटौती की अपील की है. जो बताता है कि हालात कितना भयावह है. इसके साथ-साथ देश की आर्थिक हालात पर भी बहस तेज हो गई है.
ऊर्जा संकट से उत्पादन पर असर
जानकारों का दावा है कि सरकार को ऊर्जा संकट और सप्लाई शॉक के खतरे को पहले ही स्वीकार कर लेना चाहिए था. मीडिया रिपोर्ट की मानें तो पश्चिम एशिया में युद्ध शुरू होने के बाद दुनिया को ऊर्जा आपूर्ति का बड़ा झटका लगा है, जिसका सीधा असर भारत जैसे आयात-निर्भर देशों पर पड़ रहा है. पश्चिम एशिया से दुनिया को मिलने वाले कच्चे तेल और गैस की आपूर्ति में भारी कमी आई है. जानकारों का कहना है कि ऊर्जा सिर्फ पेट्रोल-डीजल तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका उपयोग परिवहन, उद्योग, घरेलू गैस, उर्वरक, दवाइयों, प्लास्टिक और माइनिंग जैसे लगभग हर क्षेत्र में होता है. ऐसे में यदि ऊर्जा की कमी होती है तो उत्पादन भी प्रभावित होता है.
पेट्रोल-डीजल की कीमत और बढ़ती महंगाई
हालांकि आज से पहले पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों में स्थिरता दिखाई दे रही है, लेकिन जैसा कि विशेषज्ञों का मानना था,आने वाले समय में ईंधन महंगा हो सकता है. शुक्रवार की सुबह देश भर में पेट्रोल-डीजल ₹3-3 प्रति लीटर महंगे हुए हैं. जिसका असर सीधे परिवहन, खाद्य पदार्थों और दैनिक जरूरतों की चीजों पर पड़ेगा. गरीब और निम्न आय वर्ग पहले से ही महंगाई की मार झेल रहे हैं. घरेलू गैस सिलेंडर की कीमतों में बढ़ोतरी, ढाबों और छोटे रेस्तरां में खाने की लागत बढ़ना, ई-रिक्शा और स्थानीय परिवहन के किराए में इजाफा जैसे मुद्दे आम लोगों की परेशानी बढ़ा रहे हैं. मीडिया रिपोर्ट में आम लोगों के हवाले से दावा किया जा रहा कि शहरों में काम करने वाले मजदूर और असंगठित क्षेत्र के कर्मचारी मौजूदा हालात के कारण अब दोहरी मार झेल रहे हैं, एक तरफ रोजगार में कमी तो दूसरी तरफ बढ़ती महंगाई.
स्टॉक मार्केट में गिरावट क्यों?
इससे पहले प्रधानमंत्री की अपील और ऊर्जा संकट से जुड़ी चर्चाओं के बाद शेयर बाजार में आई गिरावट को लेकर भी सवाल उठे. जिसको लेकर विशेषज्ञ दावा करते हैं कि बाजार अनिश्चितता से सबसे ज्यादा प्रभावित होता है. उनका कहना है कि निवेशकों को पहले उम्मीद थी कि युद्ध जल्दी खत्म हो जाएगा और सप्लाई सामान्य हो जाएगी, लेकिन हालात लंबे संकट की ओर संकेत कर रहे हैं. ऐसे में उत्पादन घटने, महंगाई बढ़ने और कॉरपोरेट मुनाफे पर असर की आशंका से बाजार में दबाव बढ़ा. विशेषज्ञों का कहना है कि यदि रिफाइनरियों के पास मौजूद तेल भंडार कम होने लगते हैं और आयात प्रभावित होता है, तो आने वाले समय में अर्थव्यवस्था पर और दबाव बढ़ सकता है.
छोटे कारोबार और एमएसएमई सेक्टर पर संकट
विशेषज्ञों का मानना है कि सबसे ज्यादा खतरा माइक्रो और छोटे कारोबारियों को है. भारत में रोजगार का बड़ा हिस्सा माइक्रो यूनिट्स और असंगठित क्षेत्र से आता है. दरअसल छोटे कारोबारियों के पास सीमित वर्किंग कैपिटल होता है. नतीजा महंगाई बढ़ने, कच्चा माल महंगा होने और मांग घटने की स्थिति में ये इकाइयां जल्दी संकट में आ जाती हैं. ऐसे में जिस संकट की संभावना है उसके निवारण के लिए यदि सरकार समय रहते सहायता नहीं देती, तो बड़े पैमाने पर बेरोजगारी और अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ सकती है. फिलहाल बढ़ती महंगाई, ऊर्जा संकट, रोजगार पर दबाव और वैश्विक अनिश्चितता ने आम लोगों की चिंताओं को बढ़ा दिया है. आने वाले महीनों में सरकार के फैसले और वैश्विक हालात यह तय करेंगे कि भारतीय अर्थव्यवस्था इस संकट से कितनी तेजी से उबर पाती है.