सरकार का ओवरकॉन्फिडेंस डुबो रही अर्थव्यवस्था..! दावा राजनीतिक नैरेटिव के कारण कमजोर हो रहा भारतीय रुपया

India economy crisis : अपने कई सार्वजनिक रिपोर्ट में सरकार ने लगभग ये मान लिया है कि मौजुदा दौर भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए सबसे संकट का दौर हैं. एक तरफ दिन प्रतिदिन जहां महंगाई बढ़ रही वहीं रुपया भी कमजोर हो रहा है. देश की मौजुदा हालात को लेकर जाने-माने अर्थशास्त्री सुरजीत भल्ला का मानना है कि यह एक दिन में घटने वाली घटना नहीं हैं. उनका मानना है कि देश के मौजूदा आर्थिक हालात के लिए वर्तमान सरकार दोषी हैं. अर्थशास्त्री सुरजीत भल्ला The Indian Express में प्रकाशित अपने एक लेख ( BJP is Winning Elections but Losing the Economy) में दावा करते हैं कि भारतीय जनता पार्टी राजनीतिक रूप से मजबूत जरूर हुई है, लेकिन आर्थिक मोर्चे पर स्थिति चिंताजनक बनी हुई है. जानकारी के लिए बता दें कि भल्ला भारत सरकार के पहले आधिकारिक घरेलू आय सर्वेक्षण के टेक्निकल एक्सपर्ट ग्रुप के चेयरमैन रह चुके हैं. उनके लेख ने अर्थव्यवस्था, निवेश, रुपये की गिरावट और सरकारी नीति निर्माण को लेकर गंभीर बहस छेड़ दी है.

सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था का दावा कितना सही?

भल्ला अपने लेख में लिखते हैं कि भारत को लगातार दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था बताना अधूरी तस्वीर पेश करता है. उनके अनुसार यदि केवल बड़ी अर्थव्यवस्थाओं की तुलना की जाए तो भारत की स्थिति मजबूत दिख सकती है, लेकिन व्यापक वैश्विक आंकड़ों में तस्वीर बदल जाती है. उनके मुताबिक 2014 के बाद जीडीपी ग्रोथ में भारत की रैंक नौवीं है जबकी प्रति व्यक्ति जीडीपी वृद्धि में भारत आठवें स्थान पर है, और अमेरिकी डॉलर के आधार पर ग्रोथ रैंकिंग में भारत 16वें नंबर पर पहुंच गया. भल्ला ने तुलना करते हुए लिखते हैं कि डॉलर आधारित वृद्धि दर में Bangladesh 8.3% की वृद्धि के साथ पहले स्थान पर है, जबकि Ethiopia 7.2% के साथ दूसरे स्थान पर रहा. इस लिस्ट में भारत 4.7% की वृद्धि के साथ काफी पीछे दिखाई देता है.

रुपया लगातार कमजोर क्यों हो रहा है?

लेख में भारतीय मुद्रा की गिरती स्थिति पर भी चिंता जताई गई है. भल्ला के अनुसार रुपया पिछले एक साल में डॉलर के मुकाबले लगभग 12% तक कमजोर हुआ. रुपया में यह गिरावट लगातार सातवें वर्ष जारी रही. इसके साथ 2025 में भारतीय रुपया एशिया की कमजोर मुद्राओं में लिस्टेड है. वे सवाल उठाते हैं कि जब महंगाई नियंत्रण में हो, चालू खाता घाटा संभालने योग्य हो और राजनीतिक स्थिरता बनी हुई हो, तब विदेशी निवेशकों का भरोसा बढ़ना चाहिए. ऐसे माहौल में मुद्रा मजबूत होनी चाहिए, लेकिन वास्तविकता इसके उलट दिखाई देती है. उनका तर्क है कि केवल राजनीतिक नैरेटिव बनाने के लिए आर्थिक आंकड़ों का चयनात्मक इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए.

निवेशकों का भरोसा क्यों टूट रहा है?

भल्ला के अनुसार सरकार असली आर्थिक सुधारों की जगह केवल बैंड-एड लगा रही है. उनका कहना है कि सरकार लगातार उद्योगपतियों से निवेश की अपील तो करती है, लेकिन नीतिगत स्थिरता और भरोसा देने में विफल रही है. वे लिखते हैं कि निवेशक केवल राष्ट्रवाद या भाषणों के आधार पर अरबों डॉलर का निवेश नहीं करते. उन्हें भरोसेमंद नीति, स्थिर नियामकीय ढांचा और कानूनी सुरक्षा चाहिए. भल्ला का दावा है कि मौजूदा माहौल निवेशकों को यह संदेश दे रहा है कि या तो भारत से बाहर निकल जाओ, या फिर यहां निवेश करने से बचो. भल्ला ने भारत की Bilateral Investment Treaty (BIT) नीति की भी आलोचना की है. 2015 में जोड़े गए नए प्रावधानों के तहत विदेशी निवेशक किसी विवाद की स्थिति में सीधे अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता अदालत नहीं जा सकते. पहले उन्हें भारत की अदालतों में पांच साल तक कानूनी प्रक्रिया से गुजरना होता है. भल्ला का सवाल है कि जब भारतीय कंपनियां खुद अदालतों में लंबी देरी से परेशान रहती हैं, तो विदेशी निवेशक अपनी पूंजी जोखिम में डालकर वर्षों तक कानूनी लड़ाई क्यों लड़ेंगे?

ओवरकॉन्फिडेंस सबसे बड़ा खतरा

लेख के अंत में भल्ला ने सरकार को चेतावनी देते हुए कहा कि लगातार चुनावी सफलता सरकारों में अत्यधिक आत्मविश्वास पैदा कर सकती है. इससे यह भ्रम बनने लगता है कि आर्थिक नीतियां भी उतनी ही सफल हैं. उन्होंने कहा कि चुनाव सत्ता दिला सकते हैं, लेकिन स्थायी समृद्धि केवल मजबूत आर्थिक नीतियों, निवेश-अनुकूल माहौल और संस्थागत भरोसे से ही आ सकती है. देश के युवाओं और नीति विशेषज्ञों का एक वर्ग लगातार मांग कर रहा है कि राजनीतिक विमर्श को धार्मिक और भावनात्मक मुद्दों से हटाकर रोजगार, निवेश, महंगाई और आर्थिक विकास जैसे वास्तविक मुद्दों पर केंद्रित किया जाए.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *