Indian Economy Inflation : बीते कुछ दिनों में एक के बाद एक जरूरी चिजों की किमतों में हुई बढ़ोतरी के कारण भारत की अर्थव्यवस्था एक बार फिर कई मोर्चों पर दबाव में दिखाई दे रही है. पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतें, एलपीजी सिलेंडर के दामों में उछाल, रुपये की कमजोरी और विदेशी निवेश के बाहर जाने जैसी घटनाओं ने आर्थिक चिंताओं को तेज कर दिया है. इसके अलावा सरकार ने भी देश की अर्थव्यवस्था और आर्थिक संकट को लेकर संकेत दिए हैं. जिसके बाद सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या भारत फिर से 2013 जैसी फ्रेजाइल फाइव जैसी स्थिति की ओर बढ़ रहा है?
तेल की बढ़ती कीमतें बनीं सबसे बड़ा खतरा
दअसल अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों में तेजी भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनती दिख रही है. भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल आयात करता है. ऐसे में तेल महंगा होने का सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था और आम लोगों की जेब पर पड़ता है. मीडिया रिपोर्ट की मानें तो 2014 में जब केंद्र में प्रधानमंत्री Narendra Modi की सरकार आई थी, तब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल करीब 40 डॉलर प्रति बैरल तक गिर गया जिसका फायदा ये हुआ कि उस दौर में भारत की GDP ग्रोथ 8% से ऊपर पहुंच गई. लेकिन फिर बीते दो सालों में कच्चे तेल की कीमत प्रति बैरल $100 से अधीक हो चुके हैं. और अब हालात बदल चुके हैं. तेल की कीमतों में लगातार उछाल से भारत का आयात बिल तेजी से बढ़ रहा है. अर्थशास्त्रियों के अनुसार अगर कच्चा तेल लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बना रहता है, तो भारत का व्यापार घाटा (Trade Deficit) और महंगाई दोनों बढ़ेंगे. रिपोर्ट के अनुसार 12 साल में पहली बार कच्चा तेल प्रति बैरल $115 से $106 के बीच पहुंच गया है,जानकारी के लिए बताते चलें की एक बैरल में 159 लीटर तेल होता हैं !
आम आदमी पर सीधा असर
महंगे ईंधन का असर सिर्फ पेट्रोल पंप तक सीमित नहीं रहता. ट्रांसपोर्ट महंगा होने से खाद्य पदार्थों से लेकर रोजमर्रा के सामान तक सब कुछ महंगा हो जाता है. विशेषज्ञों का कहना है कि महंगाई का सबसे ज्यादा असर गरीब और निम्न मध्यम वर्ग पर पड़ता है. अमीर तबका अपनी खपत कम नहीं करता, जबकि कम आय वाले परिवार जरूरतें घटाने को मजबूर हो जाते हैं. इसी स्थिति को अर्थशास्त्र में K-shaped Economy कहा जाता है. आसान भाषा में कहें तो इसका मतलब है अमीर और गरीब के बीच की खाई और चौड़ी जाना.
कमजोर होता रुपया और घटता फॉरेक्स रिजर्व
इसके साथ साथ डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया लगातार दबाव में है. विदेशी निवेशकों द्वारा पूंजी निकालने और आयात बिल बढ़ने से रुपये पर असर पड़ा है. विशेषज्ञों का मानना है कि अगर विदेशी मुद्रा भंडार (Forex Reserve) पर दबाव जारी रहा, तो सरकार को रुपये को संभालने के लिए और कड़े कदम उठाने पड़ सकते हैं. रुपये की मजबुती के साथ सबसे बड़ी चुनौती है लगातार विदेशी निवेशकों का बाहर जाना.
विदेशी निवेशक क्यों जा रहे हैं?
मौजूदा आर्थिक हालात और संभावित संकट के कारण विश्लेषकों का मानना है,कि वैश्विक निवेशकों का ध्यान अब पूर्वी एशियाई देशों की ओर बढ़ रहा है. China Plus One रणनीति और AI सेक्टर में तेज निवेश के कारण वियतनाम, इंडोनेशिया और अन्य एशियाई देशों को ज्यादा आकर्षक माना जा रहा है. China Plus One का मतलब है कि कंपनियां चीन के अलावा एशिया के दूसरे देशों में भी निवेश और उत्पादन केंद्र स्थापित कर रही हैं.
AI रेस में पीछे छूटता भारत?
भारत की आर्थिक बहस में अब Artificial Intelligence (AI) भी बड़ा मुद्दा बन चुका है. कई ग्लोबल निवेशक का कहना है कि दुनिया के कई निवेशक भारत को AI Race में पिछड़ता हुआ देख रहे हैं. आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार दुनिया में AI मॉडल ट्रेन करने वाले स्टार्टअप्स में भारत की हिस्सेदारी बेहद कम है, जबकि अमेरिका और यूरोप इस क्षेत्र में आगे हैं. कई मीडिया रिपोर्ट में पूर्व RBI गवर्नर Raghuram Rajan सहित कई अर्थशास्त्रियों के हावाले से दावा किया गया है कि भारत को केवल टेक्नोलॉजी का उपभोक्ता नहीं, बल्कि निर्माता बनने की दिशा में काम करना होगा.
सरकार के सामने क्या है रास्ता
रुपये में कमजोरी, बढ़ता व्यापार घाटा ,विदेशी पूंजी का बाहर जाना ,महंगा तेल और धीमी होती खपत को लेकर कुछ अर्थशास्त्रियों का मानना है कि मौजूदा हालात कई मायनों में 2013 जैसे दिखाई दे रहे हैं. हालांकि कई विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि आज भारत की अर्थव्यवस्था 2013 की तुलना में अधिक मजबूत और बड़ी है. बैंकिंग सिस्टम अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में है और इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश भी बढ़ा है.
सरकार के सामने सबसे बड़ा सवाल
सरकार के सामने अब दो रास्ते हैं, महंगाई से राहत देने के लिए टैक्स कम करे और दीर्घकालिक सुधारों (Structural Reforms) पर जोर दे. अर्थशास्त्रियों का मानना है कि केवल खपत घटाने की अपील से समस्या का समाधान नहीं होगा. भारत को स्थिति से बचने के लिए उत्पादन बढ़ाना होगा, निर्यात मजबूत करना होगा, रोजगार पैदा करने होंगे, AI और नई तकनीकों में निवेश बढ़ाना होगा तथा विदेशी निवेश आकर्षित करना होगा. कुल मिलाकर भारत इस समय एक ऐसे आर्थिक मोड़ पर खड़ा है जहां वैश्विक संकट, महंगा तेल, कमजोर रुपया और तकनीकी बदलाव एक साथ चुनौती बनकर सामने आए हैं. फिलहाल स्थिति गंभीर जरूर है, लेकिन आने वाले महीनों में सरकार की नीतियां, वैश्विक तेल बाजार और निवेशकों का भरोसा तय करेगा कि भारत इस दबाव से कितनी मजबूती से बाहर निकलता है.