Bihar governance scheme : 19 मई 2026 को बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने राज्य की 874 पंचायतों में एक साथ सहयोग शिविर अभियान की शुरुआत की. सारण जिले की डुमरी बुजुर्ग पंचायत से इस महत्वाकांक्षी योजना का शुभारंभ करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि इसका उद्देश्य ग्रामीणों की समस्याओं का समाधान गांव स्तर पर और तय समय सीमा के भीतर उपलब्ध कराना है. सरकार के अनुसार अब हर महीने के पहले और तीसरे मंगलवार को पंचायतों में विशेष शिविर लगाए जाएंगे, जहां राशन कार्ड, जन्म प्रमाणपत्र, जमीन का पट्टा, पेंशन, आय-जाति-निवास प्रमाणपत्र जैसी सेवाओं से जुड़ी शिकायतों का मौके पर निपटारा किया जाएगा. मुख्यमंत्री ने मंच से कई लाभार्थियों को प्रमाणपत्र और सरकारी दस्तावेज सौंपे तथा लोगों को भरोसा दिलाया कि मुख्यमंत्री कार्यालय स्वयं इस अभियान की निगरानी करेगा.
शिकायतों की निगरानी सीधे मुख्यमंत्री कार्यालय से
सरकार का दावा है कि यह योजना केवल शिविर तक सीमित नहीं रहेगा. बल्की इसके लिए ऑनलाइन पोर्टल और हेल्पलाइन नंबर की व्यवस्था भी की गई है, जहां लोग शिकायत दर्ज करा सकेंगे. मुख्यमंत्री ने दावा किया कि सहयोग शिविर के माध्यम से की गई शिकायत के निवारण के लिए शिविर के 10वें, 20वें और 25वें दिन संबंधित विभागों को रिमाइंडर भेजा जाएगा और 30 दिनों के भीतर शिकायत का समाधान नहीं होने पर संबंधित अधिकारी पर कार्रवाई होगी. मुख्यमंत्री ने यहां तक कहा कि अगर 30 दिनों के भीतर शिकायत का समाधान नहीं होता है तो 31वें दिन संबंधित अधिकारी स्वत निलंबित माने जाएंगे.
जब RTPS पहले से है, तो नई योजना क्यों?
लेकिन सबसे ज्यादा चर्चा इस बात को लेकर हो रही है कि जब राज्य में पहले से RTPS की लागू है तो नई योजना का मकसद क्या है. जानकारी के लिए बता दें कि बिहार में 2011 से लोक सेवा का अधिकार कानून (RTPS) लागू है. इस कानून के तहत नागरिकों को समयबद्ध सरकारी सेवाएं उपलब्ध कराने का प्रावधान है. सेवा में देरी होने पर अधिकारियों पर आर्थिक दंड लगाने का नियम भी मौजूद है. ऐसे में जब पहले से एक कानूनी व्यवस्था मौजूद है, तो फिर सहयोग शिविर जैसी नई पहल की आवश्यकता क्यों पड़ी? इसके जबाव में विशेषज्ञों और प्रशासनिक जानकार कहते हैं कि इसका सबसे बड़ा कारण RTPS का कमजोर क्रियान्वयन है. उनका मानना है कि भले ही कागज पर RTPS कानून प्रभावी हो लेकिन सच्चाई यह है कि इसके बावजूद गांव और पंचायत स्तर पर लोगों को अब भी प्रमाणपत्र, पेंशन, राशन कार्ड और भूमि संबंधी मामलों के लिए महीनों चक्कर लगाने पड़ते हैं.
RTPS की विफलता की स्वीकारोक्ति है सहयोग शिविर?
कुल मिलाकर देखें तो RTPS और सहयोग शिविर, दोनों व्यवस्थाओं का उद्देश्य सरकारी सेवाएं उपलब्ध कराना है, लेकिन दोनों की कार्यप्रणाली अलग है. RTPS के कानूनी अधिकार है. लेकिन सहयोग शिविर एक शिकायत निवारण अभियान है. जिसका एक अर्थ ये भी है कि सरकार अब सेवा उपलब्ध कराने की पारंपरिक व्यवस्था से आगे बढ़कर डोरस्टेप गवर्नेंस मॉडल पर जोर दे रही है.
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सहयोग शिविर अप्रत्यक्ष रूप से इस बात का संकेत है कि RTPS अपेक्षित स्तर पर प्रभावी नहीं हो पाया. यदि समयबद्ध सेवा कानून पूरी तरह काम कर रहा होता, तो लोगों को शिकायतों के समाधान के लिए अलग से पंचायत स्तरीय शिविरों की आवश्यकता नहीं पड़ती. यही कारण है कि मुख्यमंत्री ने इस बार अधिकारियों पर अधिक कठोर जवाबदेही तय करने की कोशिश की है.
कितना सफल हो पाएगा सम्राट चौधरी का ड्रीम प्रोजेक्ट
मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी पहले भी यह संकेत दे चुके थे कि स्थानीय स्तर पर प्रशासनिक निष्क्रियता आम लोगों की सबसे बड़ी समस्या है. मुख्यमंत्री पद संभालने के बाद पत्रकारों से बातचीत में उन्होंने कहा था कि लोगों को छोटे-छोटे कामों के लिए ब्लॉक और जिला कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ते हैं. सहयोग शिविर को उसी समस्या के समाधान के तौर पर देखा जा रहा है. राजनीतिक रूप से भी यह योजना महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि यह सीधे ग्रामीण मतदाताओं और पंचायत स्तर के प्रशासन को जोड़ती है.
हालांकि योजना की घोषणा और सख्त चेतावनियों ने प्रशासनिक हलकों में हलचल पैदा की है, लेकिन इसकी असली परीक्षा आने वाले महीनों में होगी. लेकिन फिलहाल तो सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या पंचायत स्तर पर पर्याप्त अधिकारी और संसाधन उपलब्ध होंगे? क्या 30 दिनों में सभी शिकायतों का समाधान संभव होगा? और क्या वास्तव में अधिकारियों पर कार्रवाई होगी? यदि सरकार इन सवालों का जवाब व्यवहारिक स्तर पर दे पाती है, तो सहयोग शिविर बिहार की प्रशासनिक व्यवस्था में बड़ा बदलाव साबित हो सकता है. वरना यह भी कई सरकारी अभियानों की तरह केवल घोषणाओं तक सीमित रह सकता है.