CBSE से क्यों नाराज चल रहे लाखों छात्र-छात्रा…क्या है ऑन-स्क्रीन मार्किंग सिस्टम जिसको लेकर उठ रहे सवाल

CBSE News : देश के सबसे बड़े स्कूल बोर्ड्स में शामिल CBSE (सेंट्रल बोर्ड ऑफ सेकेंडरी एजुकेशन) इस साल अपनी नई मूल्यांकन प्रणाली को लेकर विवादों में घिर गया है. 12वीं बोर्ड परीक्षा 2026 में पहली बार लागू किए गए ऑन-स्क्रीन मार्किंग सिस्टम (OSM) को लेकर छात्रों, अभिभावकों और शिक्षकों ने गंभीर सवाल उठाए हैं. 13 मई को परिणाम घोषित होने के बाद से ही सोशल मीडिया और छात्र संगठनों के बीच शिकायतों की बाढ़ आ गई. कई छात्रों ने आरोप लगाया कि उनकी उत्तर पुस्तिकाएं धुंधली थीं, कुछ पन्ने गायब थे और कई मामलों में दूसरे छात्रों की कॉपियां अपलोड कर दी गईं.

क्या है ऑन-स्क्रीन मार्किंग सिस्टम?

इस वर्ष CBSE ने पारंपरिक फिजिकल कॉपी जांच प्रक्रिया को बदलते हुए डिजिटल मूल्यांकन प्रणाली लागू की. इसके तहत छात्रों की उत्तर पुस्तिकाओं को पहले स्कैन किया गया और फिर उन्हें एक ऑनलाइन पोर्टल पर अपलोड कर परीक्षकों द्वारा स्क्रीन पर जांचा गया. बोर्ड का दावा था कि इस प्रणाली से टोटलिंग और कैलकुलेशन की गलतियां कम होंगी, नंबर अपलोड करने में पारदर्शिता आएगी और मूल्यांकन प्रक्रिया अधिक मानकीकृत होगी. हालांकि, परिणाम सामने आने के बाद यही सिस्टम सवालों के घेरे में आ गया.

पास प्रतिशत में गिरावट

CBSE के अनुसार इस वर्ष 12वीं का कुल पास प्रतिशत 85.29% रहा, जबकि पिछले वर्ष यह 88.39% था. साथ ही 90% से अधिक अंक हासिल करने वाले छात्रों की संख्या में लगभग 16% की गिरावट दर्ज की गई. इसके बाद छात्रों और अभिभावकों ने मार्किंग प्रक्रिया पर सवाल उठाने शुरू कर दिए.

कॉपियां मांगने वालों की संख्या दोगुनी से ज्यादा

23 मई तक CBSE को कुल 2.94 लाख आवेदन प्राप्त हुए, जिनमें लगभग 8.5 लाख उत्तर पुस्तिकाओं की प्रतियां मांगी गईं. पिछले वर्ष यह संख्या करीब 3.5 लाख थी. इस भारी दबाव के कारण बोर्ड का पेमेंट पोर्टल कई बार क्रैश हो गया. छात्रों ने शिकायत की कि भुगतान के बाद रसीद नहीं मिली,कई बार दोहरा भुगतान कट गया,पोर्टल बार-बार बंद हो रहा था और रिवैल्यूएशन प्रक्रिया समय पर पूरी नहीं हो पा रही थी. स्थिति बिगड़ने के बाद बोर्ड ने आवेदन की अंतिम तिथि 25 मई तक बढ़ा दी. साथ ही उत्तर पुस्तिका की प्रति प्राप्त करने की फीस ₹700 से घटाकर ₹100 कर दी गई.

रिवैल्यूएशन प्रक्रिया भी सवालों में

छात्रों का कहना है कि रिवैल्यूएशन तभी संभव है जब उत्तर पुस्तिका की कॉपी समय पर मिले. लेकिन पोर्टल और पेमेंट सिस्टम की तकनीकी खामियों के कारण कई छात्र निर्धारित समय में आवेदन तक नहीं कर सके. शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि इतनी बड़ी परीक्षा प्रणाली में डिजिटल बदलाव लागू करने से पहले व्यापक परीक्षण जरूरी था.

क्या बिना तैयारी लागू किया गया OSM सिस्टम?

रिपोर्ट्स के अनुसार CBSE की गवर्निंग बॉडी की बैठकों में पहले सुझाव दिया गया था कि ऑन-स्क्रीन मार्किंग सिस्टम का पायलट प्रोजेक्ट चलाया जाए. हालांकि क्षेत्रीय स्तर पर व्यापक परीक्षण नहीं किया गया. बताया जा रहा है कि जनवरी 2026 में केवल पांच स्कूलों में ड्राई रन आयोजित किया गया था और शिक्षकों को सीमित ट्रेनिंग दी गई थी. कई शिक्षकों ने बाद में स्वीकार किया कि प्रशिक्षण पर्याप्त नहीं था.

IIT मद्रास और IIT कानपुर को जांच की जिम्मेदारी

बढ़ते विवाद के बीच केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय ने CBSE से विस्तृत रिपोर्ट मांगी है. साथ ही IIT मद्रास और IIT कानपुर की तकनीकी टीमों को पूरे OSM सिस्टम की जांच की जिम्मेदारी सौंपी गई है. जांच में यह देखा जाएगा कि सॉफ्टवेयर में तकनीकी खामियां थीं या नहीं, सर्वर क्षमता पर्याप्त थी या नहीं, किसी साइबर अटैक की आशंका तो नहीं थी और डेटा अपलोडिंग और स्कैनिंग प्रक्रिया में त्रुटियां हुईं या नहीं. IIT मद्रास के निदेशक वी. कामाकोटी ने डिनायल ऑफ सर्विस (DoS) अटैक की संभावना से भी इनकार नहीं किया है. इसका मतलब है कि अत्यधिक ट्रैफिक भेजकर पोर्टल को बाधित करने की कोशिश की गई हो सकती है.

छात्रों का सबसे बड़ा सवाल

छात्रों और अभिभावकों का कहना है कि यदि सिस्टम पूरी तरह तैयार और सुरक्षित था, तो फिर धुंधली कॉपियां क्यों अपलोड हुईं? उत्तर पुस्तिकाओं के पन्ने कैसे गायब हुए? दूसरे छात्रों की कॉपियां गलत अकाउंट्स में कैसे पहुंचीं? स्टेप मार्किंग और फाइनल टोटल में गड़बड़ियां क्यों दिखीं? इन सवालों का जवाब अभी तक स्पष्ट रूप से सामने नहीं आया है.

बोर्ड पर बढ़ रहा दबाव

विशेषज्ञों का मानना है कि तकनीक आधारित मूल्यांकन भविष्य की जरूरत है, लेकिन बिना पर्याप्त तैयारी और परीक्षण के इसे लागू करना लाखों छात्रों के भविष्य को जोखिम में डाल सकता है. अब सभी की नजर CBSE और शिक्षा मंत्रालय की जांच रिपोर्ट पर टिकी है. छात्रों और अभिभावकों की मांग है कि जिन छात्रों के अंक प्रभावित हुए हैं, उन्हें जल्द न्याय मिले और भविष्य में ऐसी तकनीकी विफलताओं को रोका जाए. क्योंकि यह केवल एक तकनीकी गड़बड़ी का मामला नहीं, बल्कि लाखों छात्रों के भविष्य और भरोसे का सवाल है.

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