प्राइवेट कोचिंग या ट्यूशन में पढ़ाने से रोक…लेकिन गैर-शैक्षणिक कार्यों से सरकारी शिक्षकों को कब मिलेगी छुट्टी ?

bihar private coaching rule : मेरे पड़ोस में एक व्यक्ति रहते हैं, जो पेशे से शिक्षक हैं और पढ़ने-पढ़ाने के कार्य में उनकी गहरी रुचि है. बिहार की शिक्षा व्यवस्था पर चर्चा करते हुए वे अक्सर व्यंग्यात्मक अंदाज में कहते हैं कि राज्य में शिक्षा की तंगी हालात के पीछे एक बड़ा कारण यह भी है कि शिक्षकों से सिर्फ शिक्षण संबंधी कार्य नहीं कराए जाते…बल्की उनकी व्यस्ता गैर शैक्षणिक कार्यों में अधिक रहता हैं.

हालांकि, यह विषय इस लेख के मुख्य दायरे से थोड़ा अलग है. वर्तमान चर्चा का केंद्र बिहार सरकार का हालिया निर्देश है, जिसके तहत सरकारी स्कूलों के शिक्षकों को निजी कोचिंग या ट्यूशन पढ़ाने से रोकने का फैसला लिया गया है. मेरे समझ से यह बिहार सरकार द्वारा लिए गए फैसलों में सबसे बेहतरीन फैसलों में से एक है. बस इसमें एक बात और जुड़नी चाहिए कि शिक्षकों से केवल पढ़ाई और शिक्षा से संबंधित कार्य ही कराए जाएं, ताकि वे अपना पूरा ध्यान बच्चों की शिक्षा और गुणवत्ता सुधारने पर दे सकें…लेकिन शिक्षकों से कराए जाने वाले गैर-शैक्षणिक कार्यों को लेकर स्पष्ट नीति नहीं होने के कारण यह फैसला आधा-अधुरा जान पड़ता है.चुनाव ड्यूटी, जनगणना, आपदा राहत कार्य, प्रशासनिक रिपोर्टिंग जैसे कई सरकारी कार्यों में शिक्षकों की भागीदारी बनी हुई है. ऐसे में यह जरूरी है कि शिक्षकों को शिक्षण कार्य के लिए पर्याप्त समय मिले, ताकि वे बच्चों की पढ़ाई और शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने पर अपना पूरा ध्यान दे सकें.

प्राइवेट कोचिंग या ट्यूशन नहीं पढ़ा सकेंगे सरकारी टीचर

ज्ञात हो कि बिहार शिक्षा विभाग ने सरकारी शिक्षकों के प्राइवेट कोचिंग संस्थानों, कमर्शियल शिक्षण केंद्रों और निजी ट्यूशन से जुड़ने पर रोक लगाने के निर्देश जारी किए हैं. विभाग के अनुसार नियमित, नियोजित और संविदा पर कार्यरत कोई भी शिक्षक किसी निजी शैक्षणिक संस्था या व्यावसायिक कोचिंग सेंटर से नहीं जुड़ सकता. सरकार का कहना है कि इस फैसला का उद्देश्य सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की उपस्थिति बढ़ाना और पढ़ाई के स्तर में सुधार करना है. शिक्षा विभाग ने स्पष्ट किया है कि आदेश का उल्लंघन करने वाले शिक्षकों पर विभागीय कार्रवाई की जा सकती है. इसमें वेतन रोकने से लेकर निलंबन तक की कार्रवाई शामिल हो सकती है. इसके साथ ही जिला शिक्षा पदाधिकारियों (DEO) को निगरानी बढ़ाने और औचक जांच करने के निर्देश दिए गए हैं, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि सरकारी शिक्षक स्कूल समय के बाद भी नियमों का उल्लंघन करते हुए निजी कोचिंग गतिविधियों में शामिल न हों.

गैर-शैक्षणिक जिम्मेदारियों में व्यस्त होते हैं सरकारी शिक्षक!

सरकार का दावा है कि इन फैसलों का उद्देश्य सरकारी स्कूलों में पढ़ाई का माहौल बेहतर बनाना और छात्रों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराना है. एक तरफ जहां इस फैसला का स्वागत किया जा रहा वहीं कई शिक्षकों और उनके संगठनों का तर्क है कि शिक्षकों पर बढ़ते गैर-शैक्षणिक कार्यों का बोझ कम किया जाना चाहिए, ताकि वे अपनी प्राथमिक जिम्मेदारी यानी शिक्षण कार्य पर अधिक ध्यान दे सकें. कई विशेषज्ञों का मानना है कि सरकारी शिक्षक लंबे समय तक चुनाव, जनगणना, आपदा राहत और प्रशासनिक कार्यों जैसी दूसरे गैर-शैक्षणिक जिम्मेदारियां निभाते हैं, जिसका असर होता है कि व्यवहारिक स्तर पर शिक्षकों पर कई अतिरिक्त प्रशासनिक जिम्मेदारियां आने की शिकायतें सामने आती हैं और कक्षा में पढ़ाई का समय भी प्रभावित होता है. इसलिए इसको लेकर भी स्पष्ट नीति होनी चाहिए.