Muslim reservation : देश में लोकसभा चुनाव के लिए तीसरे चरण की वोटिंग खत्म हो चकई है। बिहार के पाँच सीटों पर इस चरण में हुए मतदान के बीच राजद सुप्रीमो लालू यादव ने एक बार फिर से चुनावी सुर्खियां अपनी तरफ मोड़ दी। श्री यादव का एक बयान फिर से चर्चा में आ गया। मीडिया के एक सवाल पर उन्होंने कहा कि मुसलमानों को आरक्षण मिलना चाहिए। लालू यादव ने मीडिया के सवालों का जबाव देते हुए कहा कि बीजेपी डर गई हैं, इसलिए वो अब लोगों को भड़का रही हैं। भाजपा देश के संविधान को खत्म करना चाहती हैं, आरक्षण का प्रावधान है तो मुसलमानों को पूरा आरक्षण मिलना चाहिए।
Muslim reservation को लेकर राजद सुप्रीमो ने क्या कहा ?
आखिर यह आरक्षण किस मर्ज की दवा है जिसपर देश का हर बड़ा छोटा राजनेता अपनी बात कहने की कोशिश करतें हैं। मंच कोई भी हो लेकिन आरक्षण मुद्दा होता ही हैं। पिछले दिनों चुनावी सभा में बीजेपी नेता और प्रधानमंत्री ने देश में धर्म के आधार पर मुसलमानों को आरक्षण नहीं देने की बात कही थी। जो काफी चर्चा में रहा लेकिन अब आरजेडी नेता और बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू यादव यह कहते हुए सुर्खियां बटोर ली कि अगर प्रावधान हैं तो मुस्लिमों को आरक्षण मिलेगा।
मुस्लिम आरक्षण के पीछे की राजनीति
केंद्र सरकार के आँकड़े और 2011 जनगणना के अनुसार भारत में मुस्लिम आबादी देश के कुल आबादी का 14.2 % था। जो करीब 17.22 करोड़ हैं। पिछले दिनों आयी अलग अलग रिपोर्ट्स के अनुसार देश में वर्तमान संख्या में करीब 19.75 करोड़ मुस्लिम आबादी होने का अनुमान हैं।आँकड़े लोकसभा में सरकार से पूछे गए सवाल के जवाब में केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी की तरफ से दी गई। इसका मतलब हुआ कि देश में करीब 17 % आबादी मुसलमानों की हैं और बाकी के 83 % आबादी में हिन्दू, सिख, ईसाई आदि आते हैं। पिछले कुछ सालों से भारतीय राजनीति के तौर तरीके में प्राथमिकताओं को काफी महत्व दिया जाने लगा हैं। इन तौर तरीके में जातिगत राजनीति, सांप्रदायिक राजनीत, धर्म की राजनीति, आदि। इसका मुख्य कारण कुर्सी के प्रति असीमित महत्वाकांक्षा हैं।
भारत में आरक्षण की लड़ाई कब शुरु हुई ?
खासकर 1980 के बाद इसमें काफी तीव्रता देखी गई। 1980 के बाद राजनैतिक दलों के लिए विचारधारा से ज्यादा महत्वपूर्ण सत्ता और कुर्सी हो गई। इस दौरान देश की सभी राजनीतिक पार्टियां एक खास विचारधार की समर्थक हो गई जो कि किसी खास धर्म, जाती, समुदाय आदि से प्रभावित थे या फिर उनकी विचारधारा इसी के इर्दगिर्द घूमती थी। जैसे जैसे समय बीता राजनीति में वोटों के आधार पर एक खास तबगा को महत्ता मिलने लगी। राजनेता खुले मंच से उस विचारधारा को स्वीकार करने लगे। इसको आधार मानकर खेमों में बटने लगें। जिसका परिणाम हुआ कि अब नतीजों का खेमा बंट चुका था। एक खेमा वोट लेने भर से मतलब रखने लगा दूसरा खेमे को सिर्फ वोट देने भर से मतलब था। यह काफी लंबा समय तो नहीं चला लेकिन इसने यह सुनिश्चित कर दी कि भविष्य में इसका प्रभाव बड़े लंबे समय तक रहने वाला है।
लोकसभा चुनाव 2024 में पीएम ने Muslim reservation पर क्या कहा ?
उदाहरण के लिए आप वर्तमान में चल रही राजनीतिक उठा पटक देख सकतें हैं। इस तुष्टीकरण को कांग्रेस ने अनदेखा करने का दिखावा किया आज वहीं कांग्रेस के वापसी का एक मात्र विकल्प दिखाई दे रहा हैं। हालांकि यह आधा सच हैं लेकिन आधा सच भी तो सच होता हैं। लोकसभा चुनाव 2024 में 400 पार करने के इरादे से उतरी भाजपा जिस पिच पर खेलने की तैयारी कर रही थी महज दूसरे चरण के बाद ही मतदान के प्रति लोगों की उदासीनता ने बीजेपी को अपनी संभल कर खेलने पर मजबूर कर दिया। नतिजन बीजेपी की विचारधारा में जो समुदाय कभी नहीं रहा।पार्टी ने उसे कंधा बनाया और विपक्ष पर वॉर करनी शुरू की और तीसरे चरण के मतदान खत्म होने तक उसका निशाना लग भी गया । लोकसभा चुनाव से जिस समुदाय के लिए यह कहे जाते थे ” न दूरी है न खाई है, मोदी हमारा भाई है ” वोटिंग में गिरावट कहिए या फिर विपक्ष पर निशाना वर्तमान में सबसे बड़ी पार्टी ने अपनी रणनीति बदल दी और पिच पर वापस लौट आए।
क्या है Muslim reservation का नया मुद्दा ?
कुल मिलाकर आरक्षण का मुद्दा सिर्फ कागजी या चुनावी नहीं है। आम जनता जिसे इससे लाभ मिलता है या लाभ मिलता दिखता वो EVM में बटन वहीं दबाती है जहां इसकी पूरी संभावना होती हैं। पिछले 2 दशक के चुनाव परिणाम तो ऐसा ही बयां करते हैं। लेकिन अब इसमें भी तड़का लगाया गया है। ये तड़का है जातिवाद का। कांग्रेस पहले से कह रही हैं जिसकी जितनी जिसकी जितनी भागीदारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी। बिहार में जातीय जनगणना करवा कर नीतीश ने एक कदम बढ़ा दिया था लेकिन अब वो एनडीए के हिस्सेदार हैं। मगर दूसरे पार्टियों के मुंह अब खून लग चुका हैं। ऐसे में देखना बड़ा दिलचस्प होगा कि आरक्षण की कहानी पर फिल्म कौन बनाता हैं।