नगरवधुएँ अख़बार नहीं पढ़तीं – अनिल यादव

पढ़ने की नसीहतों के बीच एक कहानी पढ़ी। जिसने बताया अखबार पढ़ने की जरूरत क्यों होती है। हर सूचना जो अखबार के पन्नों पर छाप दी जाती है महज सूचना भर नहीं होता। किसी भी दौर में सूचना प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल समाज के सभी वर्गों के लिए कारगर साबित हुआ है। समाज की मुख्यधारा से अलग एक आम आदमी से लेकर समाज के सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति इन्हीं सूचनाओं के कड़ी में बँधा हुआ है। इसकी अहमियत क्या है? इसेआप अपने आम जिंदगी में होने वाले उथलपुथल से समझ सकते हैं। सूचनाएं हमारे लिए कितना महत्वपूर्ण है इसकी कोई निर्धारित परिभाषा नहीं है ना ही हो सकती है। सूचनाओं की इस कहानी में भी कुछ ऐसा ही हैं। जहाँ सब कुछ होते हुए भी बहुत कुछ अधूरा लगता है।

बिना नायक की कोई कहानी कैसी होगी? सोचिए उस नायक के बारे में जिसकी कोई कहानी नहीं होती हैं, या फिर मानी नहीं जाती हैं। ऐसी ही एक नायिका है जिसकी यह पूरी कहानी हैं। इस लंबी कहानी में किरदार है, घटना हैं, कई कहानियाँ है, कई घटनाएं भी हैं। लेकिन हर किसी को तलाश है, एक मुकम्मल कहानी कि जो समाज का हिस्सा होने के बाद भी हिस्सा माना नहीं जा रहा हैं।

किताब अपने साथ साथ कई सवालों को जिल्द में समेटे समाज के सामने अपनी दबी जुबान से यह पूछ नजर आती हैं कि हमारा क्या कसूर है? और हर उस सवाल पर मानने और ना मानने का सुरक्षित अधिकार जताते हुए समाज अपनी सभ्यता का प्रमाण देता नजर आता है। अपने पिछड़ेपन पर पर्दा डालते हुए अपने आधुनिकता का दिखावा करता हुआ यह समाज कई मौके पर विवस भी नजर आता हैं। लेकिन चुकी समाज ताकतवर होता है इसलिए उसे इन सबों से छूट दी गई है। यह छूट है कुछ भी करने की और कुछ जरूरी कामों को देखकर राजनीतिक, सामाजिक, और आर्थिक परिस्थिति के आधार पर मुँह मोड़ लेने की। ये किताब उन्हीं चीजों का सबूत हैं।

आज जब यह कहानी “नगरवधुएँ अख़बार नहीं पढ़तीं ” पढ़ा… अहसास हुआ समाज के कितने सच होते हैं। उनमें कितने सच, सच होते हैं, और कितने झूठ में बदल जाते हैं। लेकिन बदलने से पहले हम कितने जान पाते हैं। ऐसे में जब सामाज की अपनी दिखावटी विवसता हो फिर किसी सूचना का महज होना भी पर्याप्त होता हैं। हम सामाजिक रूप से कितने अपंग हैं यह कहानी “नगरवधुएँ अख़बार नहीं पढ़तीं” जिसे अनिल यादव ने लिखा है, उसका एक उदाहरण भी है…..

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