लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान विपक्ष ने सरकार को संविधान के मुद्दे पर घेरने की पूरी कोशिश की। चुनावी नतीजों में इसका फायदा भी हुआ। पिछले एक दशक में सदन में नेता प्रतिपक्ष नहीं बना पाने पाने वाली विपक्ष को इस चुनाव में ना सिर्फ यह पद मिला बल्कि जनता द्वारा मजबूत जनादेश के साथ विपक्ष की जिम्मेदारी भी मिली और इससे पहले के दो आम चुनाव में अपने दम पर बहुमत हासिल करने वाली बीजेपी 18 वीं लोकसभा के कार्यकाल में सरकार चलाने के लिए अपने सहयोगियों पर निर्भर हो गई। पार्टी के खिलाफ विपक्ष और खासकर कांग्रेस का “संविधान बचाओ” मुहिम का असर चुनावी नतीजों पर ज्यादा पड़ा। पार्टी का यह मुहिम लोकसभा में सांसदों के शपथ ग्रहण में दिखा। जब विपक्ष के नेता संविधान की कॉपी लेकर न सिर्फ संसद भवन तक पहुँचे बल्कि नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने अपने सांसद सदस्यता की शपथ भी संविधान की कॉपी लेकर ही ली। संविधान के मुद्दे पूरे चुनाव प्रचार में अपनी सफाई देती बीजेपी को इस मुद्दे पर कांग्रेस को घेरने का एक और मौका तब मिला जब प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा घोषित आपातकाल की तारीख लोकसभा के सेशन के दौरान आ पड़ी। बीजेपी ने मौके को खूब भुनाया और लोकसभा के नवनिर्वाचित अध्यक्ष ने सदन में अपने पहले भाषण की शुरूआत की तो संबोधन के अंत में Emergency के लिए संसद में 2 मिनट का मौन रखने का निर्देश दिया। विपक्ष ने इसका विरोध किया लेकिन एनडीए के नेताओं ने 50 साल पहले देश में घोषित आपातकाल के लिए सदन के बाहर प्रदर्शन किया।
लोकतंत्र का काला अध्याय
यादें तारीख बनकर लौट आती है या फिर आप यह कहो की तारीख यादें लेकर आती है। जून का महिना भारत के इतिहास का वो पन्ना है जिसमें कई गाथाएं अंकित है। आजादी से पहले यह तारीख देश को अपने महान सपूतों की अमर गाथाएं याद दिलाती है तो आजादी के बाद लाचारी व्यक्त करती दिखती है। ये दोनों ही इतने महत्वपूर्ण है कि दोनों को सहेजे रखना भारतीय लोकतंत्र की मजबूरी है। ताकि वर्तमान को रास्ता बता भविष्य को सवारा जा सके। जून का यह महिना एक तरफ छत्रपति शिवाजी महाराज, प्लासी ,रानी लक्ष्मीबाई, चापेकर बंधुओं आदि के संघर्षों की याद दिलाता है तो यह भारतीय लोकतंत्र की जबदस्ती हत्या का चश्मदीद भी है। करीब 50 साल पहले घटी उस घटना का प्रभाव आज तक है। जिसको लेकर पार्टी के राजनीतिक विरोधियों के पास सवाल कई हैं। सवाल पूछने वालों में सिर्फ राजनीतिक पार्टी तक नहीं हैं। बल्कि इसमें समाजिक संगठनों वैचारिक समूहों और मीडिया के साथ साथ आम इंसान भी शामिल है। जिनके लिए कांग्रेस को घेरने के लिए आपातकाल एक अचूक अस्त्र की है। हालांकि पार्टी इस निर्णय को लेकर अपना बचाव करती जरूर नजर आती है लेकिन कांग्रेस के पास आज भी उस निर्णय को लेकर कोई सटीक बचाव नहीं है
इंदिरा गांधी ने Emergency क्यों लगाया ?
जानकार बताते है कि पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी अगर जून 1975 को हुए तीन घटनाओं से नहीं डरती और थोड़ा संभल कर फ़ैसले लेती तो देश में अनावश्यक आपातकाल लागू नहीं होता। इन घटनाओं में, इंदिरा गांधी के करीबी सलाहकार और विश्वासपात्र जो 1971 के बांग्लादेश मुक्ति युद्ध में भारतीय हस्तक्षेप का मुख्य वास्तुकार माने जाने वाले डीपी धर की मृत्यु, इंदिरा गांधी के खिलाफ इलाहाबाद उच्च न्यायालय का फैसला और गुजरात विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की हार। अगर कांग्रेस नेता इन चीजों से संभल जाती तो देश के अतीत के पन्नों में तीसरा आपातकाल का जिक्र शायद नहीं होता। आपातकाल (Emergency) लागू होने को लेकर ज्यादातर लोग मानते है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के निर्णय से पहले ही श्रीमती प्रधानमंत्री ने विपक्ष और आम जनता में अपनी सरकार के प्रति रोष की मंशा भांप ली थी और कुछ अलग निर्णय को लेकर विचार में थी। फ़ैसले से पहले तक वो इस बात को लेकर निश्चिंत थी कि देशभर में उनकी सरकार के प्रति व्याप्त असंतोष को लेकर संविधान और कानून को अपने पक्ष में कर लेगी। लेकिन इलाहाबाद कोर्ट के फ़ैसले के बदले इंदिरा गांधी ने अपने बचाव के लिए, तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद (Fakhruddin Ali Ahmed) से देश में जबदरस्ती Emergency लगाने वाले दस्तावेज पर हस्ताक्षर करवा लिए और फिर दबाव में मंत्रियों को भी हाँ बोलने पड़ा। अपने ही मंत्रियों कए सवालों से बचती हुई इंदिरा ने देश में आपातकाल की घोषणा कर दी गई । मीडिया रिपोर्ट्स की माने तो प्रधानमंत्री कार्यालय में काम करने वाले एक अफसर ने अपने प्रतिदिन लिखने वाले डायरी में लिखा था कि श्रीमती गांधी (Indira Gandhi) किसी भी कीमत पर अपनी कुर्सी छोड़ने से पहले कई बार सोचेंगी।
25 जून के बाद क्या हुआ ?
साल 1975 मशहूर पत्रिका टाइम ने भारत में घट रही घटनाओं को लेकर एक रिपोर्ट्स प्रकाशित की जिसका शीर्षक था ” इंदिरा की तानाशाही कायम है। ” ये सिर्फ शीर्षक भर नहीं था। बल्कि भारत के राजनेता, राजनीतिक पार्टियों, सामाजिक संगठन, वैचारिक समूह और मीडिया पर बीत रही वो हकीकत थी, जिसे इंदिरा गांधी अपने महत्वाकांक्षा के तले रौंद रही थी। सरकार और अपनी कृत्यों को छिपाने के लिए गांधी का हर वो फैसला ले रही थी, जो इंदिरा गांधी के रास्ते में पथर बन रहा था या बन सकता था। मीडिया को खबरों के प्रकाशन की अनुमति नहीं थी, राजनेताओं को जेल में बंद किया जा रहा था। ऐसी फिल्में, कहानी, किताब, पत्रिकाओं रिपोर्ट्स आदि जिसमें सरकार की निरंकुश शासन की हकीकत छापी जा रही थी। उसे न सिर्फ बैन किया गया बल्कि फिल्मों के रील्स और पत्रिकाओं को सरेआम जलाया जा रहा था। समाचार पत्र, रेडियो, सिनेमा, आदि पर पाबंदियाँ लगा दी गई। प्रकाशन से पहले सरकार की अनुमति अनिवार्य कर दी गई। ऐसा नहीं करने वालों को जेल में कैद किया जाने लगा। लाइसेंस रद्द की जाने लगी और सबसे बड़ी बात की आम नागरिकों के मौलिक अधिकारों को रद्द कर दिए गए। चुनाव स्थगित कर दिए गए।
देश में Emergency कब लगा ?
- आपातकाल के दौरान भारत के राष्ट्रपति – राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद
- आपातकाल के दौरान भारत के प्रधानमंत्री – इंदिरा गांधी
- आपातकाल संविधान के किस अनुच्छेद के तहत लागू हुआ – अनुच्छेद 352
- भारत में इमरजेंसी कब तक लागू रहा – 25 जून 1975 से 21 मार्च 1977 ( 21 महीने)