पूर्व प्रधानमंत्री की वो कविताएं जिसके विरोधी भी थे कायल, पढ़िए भारत रत्न Atal Bihari Vajpayee की पसंदीदा रचनाएं

साहित्य। 16 अगस्त को भारत के पूर्व प्रधानमंत्री और बीजेपी के दिग्गज नेता अटल बिहारी वाजपेयी (Atal Bihari Vajpayee) की पुण्यतिथि है। पूर्व प्रधानमंत्री के पुण्यतिथि पर देश भर के दिग्गज नेता और लोग उन्हें याद कर रहे हैं। अटल बिहारी वाजपेयी का जन्म 25 दिसंबर 1924 को हुआ था। वाजपेयी तीन बार भारत के प्रधानमंत्री रहे। Atal Bihari Vajpayee पहली बार 1996 में सिर्फ़ 13 दिनों के लिए प्रधानमंत्री बने थे, फिर 1998 में 13 महीनों के लिए और आखिर में 1999 से 2004 तक वो देश के प्रधानमंत्री के पद पर रहें। फिर 16 अगस्त 2018 को उनका निधन हो गया। आज उनके पुण्यतिथि पर लोग उन्हें श्रद्धांजलि दे रहें हैं। पढ़िए Atal Bihari Vajpayee द्वारा लिखी उनकी पसंदीदा कविता जिन्हें वो अक्सर गाया करते थे।

* गीत नया गाता हूँ *

टूटे हुए तारों से फूटे वासंती स्वर

पत्थर की छाती में उग आया नव अंकुर

झरे सब पीले पात, कोयल की कुहुक रात

प्राची में अरुणिमा की रेख देख पाता हूँ

गीत नया गाता हूँ

टूटे हुए सपनों की कौन सुने सिसकी

अंतर की चीर व्यथा पलकों पर ठिठकी

हार नहीं मानूँगा, रार नहीं ठानूँगा

काल के कपाल पे लिखता मिटाता हूँ

गीत नया गाता हूँ

क्रेडिट – पुस्तक : मेरी इक्यावन कविताएँ,
प्रकाशन : किताबघर

* दूर कहीं कोई रोता है *

तन पर पहरा, भटक रहा मन,

साथी है केवल सूनापन,

बिछुड़ गया क्या स्वजन किसी का,

क्रंदन सदा करुण होता है।

जन्म दिवस पर हम इठलाते,

क्यों न मरण-त्यौहार मनाते,

अंतिम यात्रा के अवसर पर,

आँसू का अशकुन होता है।

अंतर रोएँ, आँख न रोएँ,

धुल जाएँगे स्वप्न सँजोए,

छलना भरे विश्व में,

केवल सपना ही सच होता है।

इस जीवन से मृत्यु भली है,

आतंकित जब गली-गली है,

मैं भी रोता आस-पास जब,

कोई कहीं नहीं होता है।

दूर कहीं कोई रोता है।

क्रेडिट- पुस्तक : मेरी इक्यावन कविताएँ
प्रकाशन : किताबघर

* आओ फिर से दिया जलाएँ *

भरी दुपहरी में अँधियारा

सूरज परछाईं से हारा

अंतरतम का नेह निचोड़ें, बुझी हुई बाती सुलगाएँ

आओ फिर से दिया जलाएँ

हम पड़ाव को समझे मंज़िल

लक्ष्य हुआ आँखों से ओझल

वतर्मान के मोहजाल में आने वाला कल न भुलाएँ

आओ फिर से दिया जलाएँ

आहुति बाक़ी यज्ञ अधूरा

अपनों के विघ्नों ने घेरा

अंतिम जय का वज्र बनाने नव दधीचि हड्डियाँ गलाएँ

आओ फिर से दिया जलाएँ

क्रेडिट – स्रोत : पुस्तक : मेरी इक्यावन कविताएँ
प्रकाशन : किताबघर

*ऊँचाई *

ऊँचे पहाड़ पर,

पेड़ नहीं लगते,

पौधे नहीं उगते,

न घास ही जमती है।

जमती है सिर्फ़ बर्फ़,

जो कफ़न की तरह सफ़ेद

और मौत की तरह ठंडी होती है

खेलती, खिलखिलाती नदी,

जिसका रूप धारण कर,

अपने भाग्य पर बूँद-बूँद रोती है।

ऐसी ऊँचाई,

जिसका परस,

पानी को पत्थर कर दे,

ऐसी ऊँचाई

जिसका दरस हीन भाव भर दे,

अभिनंदन की अधिकारी है,

आरोहियों के लिए आमंत्रण है,

उस पर झंडे गाड़े जा सकते हैं,

किंतु कोई गौरैया,

वहाँ नीड़ नहीं बना सकती,

न कोई थका-माँदा बटोही,

उसकी छाँव में पल भर पलक ही झपका सकता है।

सच्चाई यह है कि

केवल ऊँचाई ही काफ़ी नहीं होती,

सबसे अलग-थलग,

परिवेश से पृथक,

अपनों से कटा-बँटा,

शून्य में अकेला खड़ा होना,

पहाड़ की महानता नहीं,

मजबूरी है।

ऊँचाई और गहराई में

आकाश-पाताल की दूरी है।

जो जितना ऊँचा,

उतना एकाकी होता है,

हर भार को स्वयं ढोता है,

चेहरे पर मुस्कानें चिपका,

मन ही मन रोता है।

ज़रूरी यह है कि

ऊँचाई के साथ विस्तार भी हो,

जिससे मनुष्य,

ठूँठ-सा खड़ा न रहे,

औरों से घुले-मिले,

किसी को साथ ले,

किसी के संग चले।

भीड़ में खो जाना,

यादों में डूब जाना,

स्वयं को भूल जाना,

अस्तित्व को अर्थ,

जीवन को सुगंध देता है।

धरती को बौनों की नहीं,

ऊँचे क़द के इंसानों की ज़रूरत है।

इतने ऊँचे कि आसमान छू लें,

नए नक्षत्रों में प्रतिभा के बीज बो लें,

किंतु इतने ऊँचे भी नहीं,

कि पाँव तले दूब ही न जमे,

कोई काँटा न चुभे,

कोई कली न खिले।

न वसंत हो, न पतझड़,

हो सिर्फ़ ऊँचाई का अंधड़,

मात्र अकेलेपन का सन्नाटा।

मेरे प्रभु!

मुझे इतनी ऊँचाई कभी मत देना,

ग़ैरों को गले न लगा सकूँ,

इतनी रुखाई कभी मत देना।

क्रेडिट- पुस्तक : मेरी इक्यावन कविताएँ
प्रकाशन : किताबघर

* न मैं चुप हूँ, न गाता हूँ *

सवेरा है मगर पूरब दिशा में घिर रहे बादल

रूई से धुँधलके में मील के पत्थर पड़े घायल

ठिठके पाँव

ओझल गाँव

जड़ता है न गतिमयता

स्वयं को दूसरों की दृष्टि से मैं देख पाता हूँ

न मैं चुप हूँ न गाता हूँ

समय की सर्द साँसों ने चिनारों को झुलस डाला

मगर हिमपात को देती चुनौती एक द्रुममाला

बिखरे नीड़

विहँसी चीड़

आँसू हैं न मुस्कानें

हिमानी झील के तट पर अकेला गुनगुनाता हूँ

न मैं चुप हूँ न गाता हूँ

क्रेडिट – पुस्तक : मेरी इक्यावन कविताएँ
प्रकाशन : किताबघर प्रकान संस्करण : 2017

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