संपादक डेस्क। इन दिनों सोशल मीडिया पर ज्ञान का शैलाब आया हुआ हैं। खासकर यौन हिंसा, बलात्कार से जुड़े मामलों को लेकर। लोग लिख रहें है, पढ़ रहें हैं सोशल मीडिया की भाषा में कहूँ तो लाइक कर रहें, कॉमेंट कर रहें, शेयर कर रहें…मै भी यही कर रहा। हमरा ऐसा करने से हमें लग रहा कि हम इस अपराध को जड़ से खत्म कर रहें हैं। लेकिन यह सिर्फ मेरा और ऐसा करने वालों का दिखावा है। ये दिखावा हमारा सामाजिक होना, समृद्ध होना, वैचारिक होना, और अंत में मानव होने का दिखावा है।
सुबह सुबह कोलकत्ता हैवानियत कांड की पीड़िता की कुछ फोटो सोशल मीडिया के जरिए मेरे फोन तक पहुंची। कुछ लोगों ने इसे खूब शेयर करने के निर्देश दिए, तो कुछ लोगों का आदेश था कि दूसरे लोगों की तरह मै भी इसे सोशल मीडिया के जरिए लोगों तक पहुंचाने का काम कर अपना कर्तव्य पूरा करू। हालांकि कुछ लोगों की नसीहत यह भी थी कि ऐसे चीजों का विस्तार न दे, वो भी इन परिस्थियों में… हैरान करने वाली बात यह लगी कि सोशल मीडिया से फोटो डाउनलोड कर भेजने वालों में अधिकांश लोग ऐसे निकले जिन्हें नहीं मालूम फोटो किसकी है, घटना क्या है? कहां की है? और वो फोटो क्यों शेयर कर रहें। जैसा की लिखा हुआ था, कोलकत्ता में रेप का शिकार हुई पीड़िता। लोगों को भी इतना ही मालूम था। ये कुछ उसी तरह का है जो 108 बार राम लिख कर 10 लोगों को फ़ॉरवर्ड करने से शुभ होने का दिलाशा देता हैं। खैर मुद्दे पर आते हैं…. एक ग्रुप से दूसरे ग्रुप में और एक व्यक्ति से दूसरे को फोटो शेयर कर देने भर क्या इस तरीके की चीज खत्म हो जाएगी। मोमबत्ती जलाने भर से रेप पीड़िता को न्याय मिल जाएगा? सवालों की लंबी सूची में तर्कों के भी लंबी लिस्ट है। जो वास्तव में सिर्फ असली मुद्दे से भटकाने का काम करते हैं।
बलात्कार जैसे घिनौने अपराध की कोई निश्चित परिभाषा नहीं रह गई है। आप यह नहीं कह सकते की ऐसे हुआ तो ये रेप है ? उसके साथ हुआ तो रेप है? वहां हुआ तो रेप है ? उसने किया तो रेप है ? आदि। क्योंकि कई ऐसे भी खबरें है…जहां एक मासूम अपने ही घर में अपने पिता द्वारा यौन हिंसा का शिकार हो जाती है। अब किसी लड़की के लिए उसके पिता के गोद से सुरक्षित स्थान क्या हो सकता है, मुझे नहीं मालूम। पिता, बेटे, भाई, पति , परिवार, रिस्तेदार आदि कई ऐसे चेहरे है जिन्होंने अपने विक्षिप्त मानसिकता के कारण पूरे पुरुष जाती को कलंकित कर दिया है। इसके दूसरे पहलुओं में भले ही संख्या कम हो लेकर माँ, बेटी ,बहन, पत्नी, आदि चेहरों के किरदारों ने नारी जाती के साथ न्याय नहीं किया है। ना तो उम्र की सीमा है, ना ही समय निश्चित है, और तो और स्थान पर निर्धारित नहीं। अधिकांश मामलों में लड़कियां तो गिनती के कुछ मामलों में लड़के इस अपराध का शिकार हो रहे हैं। ऐसे में अपराधी किसे माना जाए यह एक दुविधा है और सवाल भी क्या हम सही में समाजिक होने के लायक हैं ?
कोलकाता में एक ट्रेनी डॉक्टर से पहले रेप और फिर हत्या मामले में देश भर में डॉक्टरों का प्रदर्शन चल रहा है,जनता के साथ साथ सरकार भी सड़क पर है? राज्य की शासन- प्रशासन अपने हाथ खड़े कर चुकी है। लेकिन ठीक इसी वक्त इस घिनौने अपराध की एक और खबर से परिचय हो रहा हैं। मामला एक नाबालिग लड़की के साथ दरिंदगी का है। चुकी छोटे शहर की घटना है, और देश और राज्य की राजनीति प्रभावित हो जाए उतनी बड़ी नहीं है। इसलिए हो सकता है आपने सुर्खियां न देखी हो। देश में हर साल रेप जैसे घृणित अपराधों की ठीक ठिक संख्या कितनी हैं इसका कोई एक वास्तविक आंकड़ा तो नहीं हैं लेकिन सरकार कहती है 2018 में भारत में कुल 33,977 बलात्कार के अपराध दर्ज किये गए। नए आंकड़ों में यह और भी हैरान करने वाला हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार, 2022 में भारत में हर दिन औसतन लगभग 90 बलात्कार की घटनाएं दर्ज की गईं। जिसका मतलब हैं हर घंटे करीब 3 लड़की व्यक्तिगत या सामूहिक तौर पर इस अपराध का शिकार होती हैं।
अब सरकार ने ये आँकड़े तो जारी कर दिए। लेकिन यह नहीं बताया कि अपराध को रोकने के लिए जमीनी स्तर पर क्या किया। ( कागजी तौर पर अपराधियों के लिए तो मौत की सजा तक का प्रावधान है। अपराधियों को न्यूनतम सजा 10 साल कैद और अधिकतम उम्र कैद की सजा का प्रावधान भी है ) NCRB के आंकड़ों के मुताबिक 2018 से 2022 के बीच बलात्कार के मामलों में दोष साबित होने की दर 27 से 28 प्रतिशत थी। अब देश में जब हर 15 मिनट में एक बलात्कार की घटना समाने आ रही है। हम सजा तो बाद में पहले रेप हुआ कि नहीं यह भी साबित नहीं कर पा रहे।
इसी विषय से संबंधित कुछ दिन पहले की खबर बिहार से हैं। जहां रेप के बदले अपराधी से महज 2000 रुपये का हरजाना भरने और मामला खत्म करने का फैसला स्थानीय पंचायत के पंचों ने सुनाया है। मामले में सुनवाई के दौरान पंचों ने यह भी कहा की रेप के लिए लड़के दोषी नहीं हैं। पंचायत के इस फैसले का खबर बनने के पिछे कई वजह हैं। लेकिन लड़के बलात्कार के लिए दोषी नहीं होते है। यह बड़ा मुद्दा हैं। क्योंकि देश का बड़ा वर्ग जिसमें सभी श्रेणी के लोग आते हैं, देश का न्याय तंत्र, देश का संविधान, कानून आदि ऐसे मामलों में यह फैसला नहीं कर पता है कि असल में इस घृणित कृत्य के लिए दोषी कौन हैं ? इस अपराध के लिए कोई लड़की को दोषी मानता है। कोई लकड़ियों के कपड़ों को अपराधी मानता है। कुछ ऐसे भी फैसले जहां लड़कों को दोषी माना गया, तो कुछ घटनाएं ऐसे हैं जो अपने अपराध के लिए अपराधी का इंतजार कर रहा हैं। मगर सबसे अंत में जो चीज बचती है वो हैं बलात्कार का अपराधी कौन ?
लेखक के अपने विचार है…