नई दिल्ली। पिछले एक दशक में भारत में दिल टूटने और प्रेम-संबंधों की वजह से Suicides के मामले तेजी से बढ़े हैं. राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़ों के मुताबिक, 2013 से 2022 के बीच 74,000 से अधिक लोगों ने रिश्तों में विफलता के कारण अपनी जान दी. मानसिक तनाव, सामाजिक दबाव, और रिश्तों में असफलता युवाओं को ऐसे खतरनाक कदम उठाने के लिए मजबूर कर रही है.
- 76% आत्महत्या प्रेम-संबंधों के टूटने से जुड़ी हैं.
- 13.3% मामलों में विवाहेतर संबंध मुख्य कारण बने.
इन्हीं मुद्दों के कारण लगभग 30,000 से अधिक हत्याएं दर्ज की गईं. इनमें से 52% हत्याएं सीधे प्रेम-संबंधों से जुड़ी थीं और 46% मामलों में विवाहेतर संबंध वजह बने.
क्या है Suicides की वजह
स्मार्टफोन और सोशल मीडिया के बढ़ते उपयोग ने इन घटनाओं(Suicides) में योगदान दिया है. विशेषज्ञों का मानना है कि सोशल मीडिया के माध्यम से रिश्तों में दखल, विश्वास की कमी, और अन्य मानसिक तनाव बढ़ गए हैं, जिससे लोग आत्महत्या और हिंसा की ओर बढ़ रहे हैं. यह समस्या केवल व्यक्तिगत नहीं है, बल्कि एक गंभीर सामाजिक मुद्दा बन चुकी है.विशेषज्ञ इस पर जोर देते हैं कि मनोवैज्ञानिक परामर्श और समाज में संवेदनशीलता बढ़ाने की आवश्यकता है.स्कूल और कॉलेज स्तर पर मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता कार्यक्रम शुरू किए जाने चाहिए.
औसतन हर दिन 45 लोग कर रहे Suicides
वर्ष 2012 में, जब सोशल मीडिया का व्यापक प्रसार नहीं हुआ था, प्रेम-संबंधों के कारण आत्महत्या के मामले तुलनात्मक रूप से कम थे. उस समय, 3,849 लोग ऐसे मामलों में अपनी जान गवां बैठे, यानी औसतन 10 लोग प्रतिदिन. लेकिन 2022 में, सोशल मीडिया और डिजिटल संवाद के बढ़ते प्रभाव के बीच यह संख्या खतरनाक रूप से बढ़कर 16,751 हो गई, यानी औसतन हर दिन 45 लोगों ने प्रेम-संबंधों में असफलता या दिल टूटने के कारण आत्महत्या की.
क्या कहते हैं विशेषज्ञ?
विशेषज्ञों का कहना है कि युवाओं को रिश्तों को बेहतर समझने और तनाव को सही तरीके से संभालने के लिए परामर्श और सहायता मिलनी चाहिए. परिवार और समाज की भूमिका भी अहम है, ताकि लोग अपनी भावनाओं को बेहतर तरीके से प्रबंधित कर सकें.
Suicides रोकथाम का प्रयास
हर साल 10 सितंबर को विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस मनाया जाता है. पिछले साल की इसकी थीम “Creating Hope Through Action” लोगों को यह याद दिलाने का प्रयास करती है कि हर मुश्किल का समाधान है. दिल टूटना एक मानसिक और सामाजिक समस्या के रूप में उभर रहा है. इसे हल करने के लिए रिश्तों में पारदर्शिता, सहानुभूति और पेशेवर मदद की जरूरत है.