दोस्त वह परिवार होते हैं जिन्हें हम खुद चुनते हैं, और यह बात बहुत हद तक सही भी है. दोस्त (Friendships) ही वो लोग होते हैं जो हमारे अच्छे और बुरे पहलू को जानते हैं, और इसके बावजूद, वे हमें वैसे ही स्वीकार करते हैं जैसे हम हैं. हालांकि, दोस्ती को मजबूत बनाने और उसे समय के साथ बेहतर बनाने में समय लगता है. कुछ लोग आसानी से दोस्त बना लेते हैं, जबकि दूसरों को इसमें अधिक समय लगता है और उनके पास सिर्फ मुट्ठी भर दोस्त होते हैं.
लेकिन सवाल यह है कि कुछ लोग दोस्त बनाने में इतने सफल क्यों होते हैं और क्या वजह है कि कुछ दोस्ती समय के साथ कमजोर पड़ जाती हैं?
Friendships कमजोर क्यों पड़ जाती हैं?
इसका विश्लेषण हाल ही में इवोल्यूशनरी साइकोलॉजिकल साइंस में प्रकाशित एक अध्ययन में किया गया है, जिसमें सात प्रमुख तरीकों की पहचान की गई है, जिनसे लोग अपनी दोस्ती को मजबूत बनाते हैं. यह अध्ययन मेनेलाओस अपोस्टोलो और उनकी टीम द्वारा किया गया था. उन्होंने इस बात पर ध्यान केंद्रित किया कि लोग अपनी दोस्ती को मजबूत करने के लिए कौन-कौन सी रणनीतियों का इस्तेमाल करते हैं.
सात मुख्य आदतें
- सहायता प्रदान करना
- बातचीत बढ़ाना
- नियमित संचार बनाए रखना
- उपहार देना
- विश्वास का निर्माण करना
- पारिवारिक संबंधों को बढ़ावा देना
- सहमति व्यक्त करना
Friendships : अध्यान का रिपोर्ट क्या रहा
अध्यान में यह भी पाया गया कि दोस्ती को मजबूत बनाने में सबसे प्रभावी तरीका एक-दूसरे की मदद करना है, खासकर मुश्किल समय में. इसके अलावा, नियमित संपर्क बनाए रखना और दोस्तों के साथ समय बिताना भी रिश्तों को गहरा करने में मदद करता है.
अध्यान से यह भी स्पष्ट हुआ कि व्यक्ति का व्यक्तित्व प्रकार और उसकी उम्र दोस्ती को मजबूत करने की उसकी रणनीतियों पर असर डालते हैं. उदाहरण के लिए, महिलाओं द्वारा इन सात रणनीतियों का उपयोग पुरुषों की तुलना में अधिक किया जाता है. वहीं, युवा लोग अपनी दोस्ती को और गहरा करने के लिए बातचीत और विश्वास निर्माण पर अधिक जोर देते हैं.
अध्यान में यह भी देखा गया कि जो लोग दूसरों के साथ अधिक सहमत होते हैं, वे अपनी दोस्ती को मजबूत करने के लिए समर्थन देने का तरीका अपनाते हैं. इसके विपरीत, जो लोग अधिक मिलनसार और बहिर्मुखी होते हैं, वे दोस्ती को मजबूत बनाने के लिए इन सातों रणनीतियों का मिश्रण इस्तेमाल करते हैं.
अध्ययन में क्या थी सीमाएं
हालांकि इस अध्ययन में कुछ सीमाएँ भी थीं. जैसे, जिन लोगों ने अध्ययन में अपनी प्रतिक्रियाएँ दी थीं, उनके द्वारा रिपोर्ट किए गए परिणाम पूरी तरह से सटीक नहीं हो सकते हैं. इसके अलावा यह अध्ययन मुख्य रूप से ग्रीक भाषी लोगों पर आधारित था, इसलिए इसके परिणाम पूरी दुनिया में समान रूप से लागू नहीं होते.