पटना। दिल्ली, महाराष्ट्र और हरियाणा विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद कांग्रेस ने अब बिहार में आगामी विधानसभा चुनाव(Bihar assembly elections) की तैयारियों को गति दे दी है. 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद अब तक चार राज्यों में हुए चुनावों में कांग्रेस को बड़ा झटका लगा है, जिससे बिहार चुनाव पार्टी के लिए बेहद अहम हो गया है.
आरजेडी के साथ गठबंधन और कांग्रेस की कमजोर स्थिति
बिहार की राजनीति में कांग्रेस ने लंबे समय से राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के साथ गठबंधन की राह अपनाई है. हालांकि, इस गठबंधन में कांग्रेस हमेशा दूसरी भूमिका में ही रही है. लोकसभा चुनाव में भी आरजेडी-कांग्रेस गठबंधन को अपेक्षित सफलता नहीं मिली थी, खासकर जब इसकी तुलना उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी-कांग्रेस गठबंधन से की गई.
लेकिन अब बिहार में कांग्रेस के अंदरूनी हालात भी तनावपूर्ण होते जा रहे हैं. पार्टी के भीतर नेतृत्व को लेकर असमंजस की स्थिति बनी हुई है. नई रणनीति के तहत पार्टी ने अपने नए प्रभारी कृष्णा अल्लावरू को मैदान में उतारा है, लेकिन उनके आते ही राज्य इकाई में पुराने गिले-शिकवे और अंदरूनी टकराव खुलकर सामने आने लगे हैं.
Bihar assembly elections : कन्हैया कुमार चर्चा का विषय
कांग्रेस के युवा नेता कन्हैया कुमार बिहार की राजनीति में एक महत्वपूर्ण चेहरा बनकर उभर रहे हैं. 2019 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने बेगूसराय से CPI के टिकट पर चुनाव लड़ा था, लेकिन हार गए. इसके बाद 2024 के चुनाव में वह दिल्ली से कांग्रेस के टिकट पर मैदान में उतरे लेकिन वहां भी असफल रहे. अब वह बिहार में अपने जनाधार को मजबूत करने के लिए ‘पलायन रोको, रोजगार दो’ नामक पदयात्रा की योजना बना रहे हैं. इस यात्रा का आयोजन युवा कांग्रेस और नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया (NSUI) द्वारा किया जा रहा है.
कन्हैया कुमार को NSUI का प्रभारी भी नियुक्त किया गया है. लेकिन उनकी भूमिका को लेकर पार्टी में असंतोष उभरने लगा है. पटना में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में जब पदयात्रा की घोषणा की गई, तो पार्टी के अन्य वरिष्ठ नेताओं को इस आयोजन से बाहर रखा गया. एक वरिष्ठ कांग्रेस नेता ने नाराजगी जाहिर करते हुए कहा, “इतनी जल्दबाजी क्यों? दूसरे नेताओं को इस बारे में सूचित क्यों नहीं किया गया? जब पार्टी चुनावी मुहिम शुरू कर रही है, तो सभी को साथ लेकर क्यों नहीं चला जा रहा?”
रमजान के महीने में पदयात्रा पर उठे सवाल
कांग्रेस के अंदरूनी कलह को बढ़ाने वाला एक और मुद्दा इस पदयात्रा का समय भी बना है. पार्टी के कई मुस्लिम नेताओं ने सवाल उठाया है कि रमजान के दौरान यह यात्रा क्यों रखी गई, जब मुस्लिम समुदाय उपवास में रहेगा? यह यात्रा ऐसे कई जिलों से होकर गुजरेगी, जहां मुस्लिम समुदाय की आबादी 20% से अधिक है. कांग्रेस और आरजेडी के लिए मुस्लिम वोट बैंक बेहद अहम है, इसलिए कई वरिष्ठ नेताओं ने पार्टी नेतृत्व से यात्रा को 30 मार्च के बाद आयोजित करने की अपील की है.
Bihar assembly elections : बैठक स्थगित, कन्हैया को “फ्री हिट”
दिल्ली से लोकसभा चुनाव हारने के बाद कन्हैया कुमार ने बिहार में सक्रिय होने की इच्छा जाहिर की थी. हालांकि, कांग्रेस के कई स्थानीय नेताओं को यह लग रहा है कि कन्हैया को बेवजह प्राथमिकता दी जा रही है और बाकी नेताओं को दरकिनार किया जा रहा है. पार्टी की चुनावी रणनीति को लेकर दिल्ली में एक महत्वपूर्ण बैठक होनी थी, जिसे अब 18 मार्च तक स्थगित कर दिया गया है. ऐसा माना जा रहा है कि पार्टी के भीतर बढ़ते असंतोष को देखते हुए बैठक को टाल दिया गया है.
गठबंधन में बढ़ती दूरियां, आरजेडी की नाराजगी
कांग्रेस के आंतरिक मामलों को उसके सहयोगी आरजेडी ने भी गौर से देखा है. हाल ही में पटना में कन्हैया कुमार के समर्थकों ने उन्हें “बिहार का मुख्यमंत्री” बनाने के नारे लगाए, जिससे आरजेडी में नाराजगी बढ़ गई. पार्टी का मानना है कि कांग्रेस इस तरह के कदमों से गठबंधन के संतुलन को बिगाड़ रही है.
एक वरिष्ठ आरजेडी नेता ने कहा, “कांग्रेस अपने सहयोगियों को दरकिनार कर रही है और उन्हें उचित सम्मान नहीं दे रही है. दिल्ली में जो हुआ वह अलग था, लेकिन बिहार का राजनीतिक परिदृश्य अलग है.” यह बयान स्पष्ट रूप से दिखाता है कि कांग्रेस और आरजेडी के बीच मतभेद गहराते जा रहे हैं.
Bihar assembly elections : कांग्रेस अपने मतभेदों को सुलझा पाएगी?
बिहार विधानसभा चुनाव कांग्रेस के लिए न सिर्फ एक चुनौती है, बल्कि अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए एक अवसर भी. लेकिन पार्टी के भीतर चल रहे अंतर्कलह, नेतृत्व की अस्पष्टता और गठबंधन में बढ़ती दरारें इसे और कठिन बना सकती हैं. आगामी दिनों में कांग्रेस की रणनीति यह तय करेगी कि वह अपने सहयोगियों और नेताओं को साथ लेकर चुनावी समर में उतरेगी या फिर अंदरूनी कलह के कारण और अधिक कमजोर हो जाएगी.