पटना : बिहार विधानसभा(Bihar politics) में सोमवार को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और विपक्ष के नेता (LoP) तेजस्वी यादव के बीच तीखी नोकझोंक देखने को मिली. मुख्यमंत्री ने तेजस्वी की राजनीतिक अनुभवहीनता पर कटाक्ष करते हुए उनके पिता, राष्ट्रीय जनता दल (राजद) सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव को लेकर एक बड़ा दावा किया. नीतीश ने कहा कि 1990 में मुख्यमंत्री बनने में लालू की मदद करने का श्रेय उन्हें जाता है.
“तुम्हारे पिता को हमने मुख्यमंत्री बनाया था. यहां तक कि तुम्हारी जाति के लोग भी उनके खिलाफ थे, लेकिन मैंने उनका समर्थन किया,” नीतीश ने सदन में कहा. उनकी यह टिप्पणी बिहार की राजनीति में दशकों से चले आ रहे इस प्रतिद्वंद्विता को फिर से उजागर कर गई. इस टिप्पणी से नाराज तेजस्वी विधानसभा से बाहर चले गए.
इतिहास की परछाई: 1974 से शुरू हुआ सफर
नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव की राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता की जड़ें 1974 के छात्र आंदोलन से जुड़ी हैं. उस समय लालू पटना विश्वविद्यालय छात्रसंघ (PUSU) के अध्यक्ष थे, जबकि नीतीश बिहार कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग में छात्र नेता थे. दोनों ने सक्रिय राजनीति में कदम रखा, लेकिन उनके राजनीतिक सफर अलग-अलग दिशा में आगे बढ़े.
लालू ने 1977 में इमरजेंसी के बाद छपरा लोकसभा सीट से जीत दर्ज की, जबकि नीतीश को लगातार दो विधानसभा चुनावों (1977 और 1980) में हार का सामना करना पड़ा. आखिरकार, 1985 में हरनौत विधानसभा सीट से जीतकर उन्होंने राजनीति में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई.
Bihar politics : समाजवादी राजनीति में सत्ता संघर्ष
1980 के दशक के अंत तक बिहार में समाजवादी राजनीति पर विनीायक प्रसाद यादव, अनुप लाल यादव और गजेन्द्र हिमांशु जैसे वरिष्ठ नेता हावी थे. हालांकि, इस दौर में एक नई पीढ़ी भी उभर रही थी, जिसमें लालू, नीतीश, शिवानंद तिवारी, रघुवंश प्रसाद सिंह, जगदानंद सिंह और विजय कृष्ण शामिल थे.
1988 में कर्पूरी ठाकुर के निधन के बाद पार्टी में अंदरूनी संघर्ष शुरू हुआ. शरद यादव, जो पूर्व हरियाणा मुख्यमंत्री देवी लाल के करीबी थे, अनुप लाल यादव को नेता प्रतिपक्ष (LoP) बनवाना चाहते थे. लेकिन, इसी बीच लालू ने खुद को कर्पूरी ठाकुर का उत्तराधिकारी साबित करने की कोशिश की. इस दौरान नीतीश कुमार और शिवानंद तिवारी ने लालू का समर्थन किया और उन्हें 1989 में नेता प्रतिपक्ष बनने में मदद की.
2015 में द इंडियन एक्सप्रेस को दिए अपने एक इंटरव्यू में नीतीश ने कहा था, “हमने लालू प्रसाद का समर्थन इसलिए किया क्योंकि वह हमारी पीढ़ी के नेता थे. हमने सत्ता को अपनी पीढ़ी में लाने के लिए उन्हें समर्थन दिया.”
1990: बिहार के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर लालू
1990 के बिहार विधानसभा चुनावों ने राज्य की राजनीति की दिशा ही बदल दी. जनता दल ने बहुमत तो हासिल किया लेकिन मुख्यमंत्री पद के लिए गुटबाजी शुरू हो गई. वीपी सिंह पूर्व मुख्यमंत्री राम सुंदर दास को मुख्यमंत्री बनाना चाहते थे, जबकि देवी लाल ने लालू का समर्थन किया. इसी बीच लालू ने चंद्रशेखर से मदद मांगी, जो पहले रघुनाथ झा के पक्ष में थे. लेकिन जब चंद्रशेखर को एहसास हुआ कि झा जीत नहीं सकते, तो उन्होंने लालू को समर्थन दे दिया. अंततः जनता दल के आंतरिक चुनाव में लालू को 59 वोट मिले, जबकि राम सुंदर दास को 56 और रघुनाथ झा को 14 वोट मिले. इन्हीं 14 वोटों ने लालू की जीत सुनिश्चित की.
समाजवादी नेता विजयवंत चौधरी ने कहते हैं कि उस समय, मैं चंद्रशेखर के खेमे में था और मैंने देखा कि शिवानंद तिवारी और नीतीश कुमार ने लालू के लिए कितनी जबरदस्त पैरवी की. लालू के मुख्यमंत्री बनने में उनके साथियों का बड़ा योगदान था. यही बात नीतीश ने तेजस्वी को ताने के रूप में कही होगी.”
Bihar politics : नीतीश कुमार का उदय और लालू से अलगाव
नीतीश कुमार का लालू का समर्थन करने का फैसला पूरी तरह निस्वार्थ नहीं था. 1989 में उन्हें बरौनी लोकसभा सीट के लिए टिकट मिला था, जिससे उन्होंने वरिष्ठ कांग्रेसी नेता राम लखन सिंह यादव को हराकर अपनी मजबूत राजनीतिक पहचान बनाई. यह जीत उनके लिए भविष्य की संभावनाओं का द्वार खोल गई.
लेकिन, जैसे-जैसे लालू ने अपनी सत्ता मजबूत की, नीतीश से उनकी दूरी बढ़ती गई. 1994 में नीतीश ने जॉर्ज फर्नांडिस के साथ मिलकर जनता दल से अलग होकर समता पार्टी बना ली और दोनों के रास्ते पूरी तरह अलग हो गए.
लालू का वीपी सिंह से भी टकराव हुआ. 1991 में जब पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह बिहार चुनाव प्रचार के लिए आए, तो लालू ने उन्हें व्यंग्यात्मक अंदाज में कहा, “राजा साहब, मेरी सीट से हट जाइए.” सिंह को मजबूरन उनकी बात माननी पड़ी.
राजनीति में बदले रिश्ते और फिर दरारें
1994 के बाद नीतीश और लालू के रास्ते अलग हो गए, लेकिन 2015 में दोनों ने कांग्रेस के साथ मिलकर महागठबंधन बनाया. हालांकि, यह गठबंधन ज्यादा समय तक नहीं चला और 2017 में नीतीश फिर से बीजेपी के साथ चले गए. 2022 में दोनों एक बार फिर साथ आए, लेकिन 2024 की शुरुआत में यह गठबंधन फिर टूट गया.
Bihar politics : तेजस्वी-नीतीश की नई राजनीतिक लड़ाई
लालू प्रसाद यादव की बिगड़ती सेहत के चलते उनके बेटे तेजस्वी यादव ने पार्टी की कमान संभाली है. हालांकि, नीतीश कुमार लगातार उन्हें ‘बच्चा’ (अनुभवहीन) कहकर उनकी राजनीतिक क्षमता पर सवाल उठाते रहते हैं.
बिहार विधानसभा में हालिया बहस सिर्फ व्यक्तिगत कटाक्ष नहीं थी, बल्कि यह उस गहरी राजनीतिक विरासत की याद दिलाती है जिसने बिहार की राजनीति को दशकों से प्रभावित किया है. अब देखना यह है कि तेजस्वी यादव अपने पिता की छाया से निकलकर खुद की अलग पहचान बना पाते हैं या नहीं, लेकिन एक बात तो तय है—बिहार की राजनीति में अभी और उतार-चढ़ाव बाकी हैं.