Hindu-muslim Holi Procession : होली पर सांप्रदायिक सद्भाव को बरकरार रखने के लिए उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर में करीब 67 मस्जिदें तो संभल में कम से कम 10 मस्जिदें तिरपाल से ढकी गईं हैं. दूसरे राज्यों के दूसरे शहरों से भी ऐसी खबरें आ रही हैं. लेकिन सवाल यह है कि ये कितना सही या गलत है ? होली के रंग से बचने के लिए घर से ना निकलने की सलाह देना और मस्जिदों को इस तरह ढक कर असामाजिक तत्वों से बचाना. संभावित घटनाओं से बचने का एकमात्र उपाय है ? ऐसा माना जा सकता है कि मस्जिदों को तिरपाल से ढंकने का कदम प्रशासन और स्थानीय समुदायों द्वारा आपसी सौहार्द बनाए रखने के उद्देश्य से उठाना सही है क्योंकि होली के दौरान कुछ असामाजिक तत्व मस्जिदों और अन्य धार्मिक स्थलों पर रंग डालने जैसी हरकतें कर सकते हैं, जिससे सांप्रदायिक तनाव बढ़ने की संभावना होती है,तो तिरपाल लगाना एक निवारक उपाय हो सकता है, लेकिन यह किसी स्थायी समाधान का संकेत नहीं है. प्रशासन का यह तरीका संभावित टकराव को रोकने की कोशिश तो है, लेकिन क्या असली समस्या पर पर्दा डालने का प्रयास नहीं है ? दरअसल प्रशासन को ऐसे असामाजिक तत्वों पर सख्ती से कार्रवाई करनी चाहिए ताकि धार्मिक स्थलों की पवित्रता बनी रहे और किसी भी अप्रिय स्थिति की नौबत न आए. मस्जिदों को इस तरह ढक कर असामाजिक तत्वों से बचाने का उपाय सिवाय कुछ सवालों से बचने के अलावा कुछ नहीं है.
समाज में आपसी विश्वास बढ़ाने के लिए धार्मिक नेताओं, राजनीतिक पार्टियों, नेताओं और समुदायों के लोगों के बीच संवाद होना जरूरी है. स्थायी समाधान के लिए जरूरी है कि कानून व्यवस्था मजबूत हो और भाईचारे को प्रोत्साहित किया जाए जिससे किसी भी धर्म या समुदाय को इस तरह के एहतियाती उपाय करने की आवश्यकता न पड़े. लेकिन इसके विपरीत राजनेताओं का और धार्मिक नेताओं का बयान ऐसा होता है, मानो राजनीति के अलावा इस देश में सब कुछ गलत है.
होली एक सांस्कृतिक और धार्मिक त्योहार है, जो भारत में विशेष रूप से हिंदू धर्म में मनाया जाता है. इसमें रंग, उत्सव और आनंद का माहौल होता है. बाकि होली खेलना या ना खेलना, एक व्यक्तिगत निर्णय है. इसके अलावा कोई भी तर्क,तार्किक नहीं हो सकता है. राजनीतिक और सामाजिक महत्वाकांक्षा को साधने के लिए कुछ लोग या फिर लोगों का एक समूह इसे धार्मिक परंपरा, विशेष रीति-रिवाजों का पालन, कोई विशेष प्रथा या फिर धार्मिक मान्यताओं का बहाना बना इसका समर्थन या फिर विरोध करते है. जैसे कुछ लोगों को लगता है कि खुदा या अल्लाह को होली के रंग से डर लगता है. अगर कोई यह सोचता है कि अल्लाह या किसी ईश्वर को रंग, त्योहार या परंपरा से डर हो सकता है, तो यह विचार ही तर्कहीन है. क्योंकि एक मान्यता ये है कि ईश्वर सभी चीज़ों का सृजनकर्ता है, फिर इस मान्यता के अनुसार उसे किसी भी मानव-निर्मित परंपरा या गतिविधि से भय कैसा? अल्लाह या किसी भी ईश्वर को होली के रंगों से डरने का सवाल ही नहीं उठता. अगर कोई इंसान अपनी धार्मिक मान्यताओं के आधार पर किसी परंपरा में भाग लेना या न लेना चुनता है, तो यह उसका व्यक्तिगत निर्णय है.हालाँकि, कुछ धार्मिक परंपराएं अपने अनुयायियों को विशेष रीति-रिवाजों का पालन करने या कुछ प्रथाओं से बचने की सलाह देती हैं. यह लोगों की धार्मिक मान्यताओं का हिस्सा हो सकता है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि ईश्वर स्वयं किसी चीज़ से डरते हैं.
ये ठीक उसी तरह है जैसा कुछ लोगों द्वारा मंदिर जाने वालों को सांप्रदायिक कहा जाता है. अब यह धारणा सिवाय किसी पूर्वाग्रह या गलतफहमी पर आधारित होने के अलावा और कुछ नहीं है. किसी व्यक्ति का मंदिर जाना उसकी धार्मिक आस्था का हिस्सा हो सकता है, लेकिन यह आवश्यक नहीं कि वह अन्य धर्मों के प्रति मंदिर जाने वाला व्यक्ति असहिष्णु हो. जैसे हाल ही में केरल के कासरगोड जिले में स्थित एक मंदिर ने हाल ही में रमजान के पवित्र महीने के दौरान मुस्लिम समुदाय के लिए इफ्तार का आयोजन किया, जिसमें सभी धर्मों के लोगों ने भाग लिया. अब आप इसको क्या कहेंगे ? दरअसल कासरगोड मंदिर में इफ्तार का आयोजन इस बात का प्रमाण है कि धार्मिक आस्था और सांप्रदायिक सद्भाव साथ-साथ चल सकते हैं. इसलिए हमें ऐसे सकारात्मक उदाहरणों को प्रोत्साहित करना चाहिए और सभी धर्मों के प्रति सम्मान और समझ को बढ़ावा देना चाहिए. लेकिन इसमें शर्त ये है कि धार्मिक आस्था और सांप्रदायिक सद्भाव को राजनीतिक महत्वाकांक्षा की ग्रहन ना लगे.