अमेरिका में रखा सोना वापस क्यों लेना चाहता है जर्मनी, बदलते वैश्विक समीकरणों के बीच क्या है यह मांग?

Gold repatriation : दुनिया की राजनीति में हलचल है. वैश्विक विश्वास की नींव दरक रही है और इसकी गूंज अब केंद्रीय बैंकों की तिजोरियों तक पहुंच गई है. अमेरिका की विदेश नीति में लगातार हो रहे बदलावों और डोनाल्ड ट्रंप के अप्रत्याशित बयानों के बीच अब जर्मनी भी सवाल करने लगा है, क्या हमारा सोना सही जगह पर है? 3400 टन से अधिक सोने के भंडार के साथ जर्मनी अमेरिका के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा गोल्ड होल्डर है. लेकिन इसका बड़ा हिस्सा दशकों से अमेरिका समेत कुछ विदेशी बैंकों में रखा गया है. अब जब दुनिया का भरोसा अमेरिका पर डगमगा रहा है, जर्मनी जैसे देशों के मन में यह सवाल उभर रहा है कि क्या उनका खजाना सुरक्षित हाथों में है?

क्यों अमेरिका में रखा गया जर्मनी का Gold ?

दूसरे विश्व युद्ध के बाद जर्मनी बर्बाद हो चुका था और हिटलर की विरासत के बाद देश दो हिस्सों में बंट गया था. पश्चिमी जर्मनी ने जब अर्थव्यवस्था को फिर से खड़ा करने का फैसला लिया, तो अमेरिका उसके सबसे बड़े सहयोगी के तौर पर उभरा. उस दौर में वैश्विक लेनदेन सोने के आधार पर होता था और न्यूयॉर्क में सोना रखने से अंतरराष्ट्रीय ट्रांजैक्शन में सुविधा मिलती थी. वहीं, शीत युद्ध के तनावपूर्ण दौर में पश्चिमी देशों को यह आशंका भी थी कि अगर फिर कभी युद्ध हुआ, तो सोना सुरक्षित नहीं रहेगा. ऐसे में न्यूयॉर्क का फेडरल रिजर्व बैंक दुनिया की सबसे सुरक्षित लॉकर बन गया, जहां सिर्फ जर्मनी ही नहीं, बल्कि दर्जनों देशों ने अपना सोना जमा कर दिया.

अब क्यों लेना चाहता है जर्मनी अपना सोना?

बीते कुछ वर्षों में जर्मनी ने अमेरिका से धीरे-धीरे अपना सोना वापस मंगवाना शुरू किया है, लेकिन अभी भी उसका एक बड़ा हिस्सा लगभग 1200 टन न्यूयॉर्क में ही है. हाल के घटनाक्रमों ने इस चिंता को और बढ़ा दिया है. ट्रंप प्रशासन के दौरान अमेरिका का व्यवहार पारंपरिक सहयोगियों के प्रति अप्रत्याशित रहा है, नाटो को कमजोर करने की बातें, यूरोपीय देशों पर टैरिफ की धमकियां, और रूस के साथ समीकरण सुधारने की कोशिशें. इन सबके बीच जर्मन नेतृत्व और जनता में यह सवाल जोर पकड़ रहा है कि क्या अमेरिका अब भी उतना भरोसेमंद साझेदार है? क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक यूनियन जैसे प्रमुख राजनीतिक दल अब खुलकर मांग कर रहे हैं कि जर्मनी को अपना संपूर्ण सोना वापस बुला लेना चाहिए. यह सिर्फ अर्थव्यवस्था नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता और संप्रभुता का सवाल भी बन चुका है.

विदेशी बैंकों में रखा सोना कितना सुरक्षित है?

तकनीकी रूप से देखा जाए, तो विदेश में रखा सोना संबंधित देश का ही होता है. लेकिन जब इसे लौटाने की बात आती है, तो अंतिम फैसला उस देश के बैंक और सरकार के हाथों में होता है, जहां सोना रखा गया है. ऐसे कई उदाहरण सामने आ चुके हैं, वेनेजुएला ने जब लंदन से अपना सोना वापस मांगा, तो ब्रिटेन ने वहां की सरकार को वैध न मानते हुए गोल्ड देने से इनकार कर दिया. 2012 में जर्मनी ने भी जब अमेरिका से सोना मांगा था, तो उसे एकमुश्त लौटाने की बजाय धीरे-धीरे देने की बात की गई, जिससे वहां जनता के बीच शंका बढ़ी थी. इसका एक बड़ा जोखिम यह है कि किसी राजनीतिक या आर्थिक कारण से अगर होस्ट देश ने सोना लौटाने से इनकार कर दिया, तो उसका कोई पुख्ता कानूनी उपाय नहीं होता.

Gold रिपैट्रिएशन: एक वैश्विक चलन

आज जर्मनी अकेला देश नहीं है जो अपना सोना वापस बुलाने की सोच रहा है. हाल के वर्षों में कई देश गोल्ड रिपैट्रिएशन की राह पर चल चुके हैं. वजह स्पष्ट है,वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में कोई भी देश अपने खजाने पर दूसरे देश की ‘तालाबंदी’ का जोखिम नहीं उठाना चाहता. हालांकि अमेरिका जैसे देश के लिए जर्मनी का यह कदम एक चेतावनी भी है. अगर उसने इस प्रक्रिया में कोई बाधा डाली, तो बाकी देश भी डरकर अपनी जमा पूंजी वापस मांग सकते हैं. इससे अमेरिकी वित्तीय व्यवस्था की साख को गहरी चोट लग सकती है.

सबको गुल्लक अब अपने पास चाहिए

जर्मनी के लिए यह सिर्फ सोने का मामला नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता और आत्मविश्वास का भी है. जैसे कोई बच्चा जब बड़ा हो जाता है, तो अपनी गुल्लक (Gold) खुद संभालना चाहता है, वैसे ही जर्मनी अब अपने खजाने पर सीधी निगरानी चाहता है. अंतरराष्ट्रीय संबंधों की दुनिया में अब भरोसा ‘बैंक लॉकर’ की तरह नहीं रहा, जिसे एक बार बंद किया और ताला लगा दिया. अब हर देश चाहता है कि चाबी भी उसके ही हाथ में हो.

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