इस बड़े नेता के कहने पर NDA से अलग हुए थे नीतीश कुमार…मधुबनी रैली में पीएम मोदी के सामने बिहार CM का कबूलनामा

bihar elections । जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले को लेकर बिहार के मधुबनी में गुरुवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पाकिस्तान को सख्त संदेश दिया और कहा कि इस हमले का ऐसा जवाब दिया जाएगा जिसकी किसी ने कल्पना नहीं की होगी। वहीं, इसी मंच से बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने एक बड़ा राजनीतिक बयान देकर सबको चौंका दिया। मंच से नीतीश कुमार ने कहा कि  केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह  के कहने पर NDA से वो अलग हुए थे.

ललन सिंह  के कहने पर NDA से अलग हुए नीतीश

जनता दल (यूनाइटेड) के वरिष्ठ नेता और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपने ही सहयोगी व केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह को वर्ष 2022 में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) से पार्टी के अलग होने का जिम्मेदार ठहराया। चौंकाने वाली बात यह रही कि यह बयान ललन सिंह की मौजूदगी में दिया गया। नीतीश ने बिना नाम लिए कहा कि बीच में हमारे पार्टी ने गड़बड़ कर दी थी, सीएम नीतीश ने मंच से कहा- बीच में गड़बड़ कर दिया हमारे पार्टी ने। और यहीं बैठे हुए हैं, आप उन्हीं से पूछिए। अब हमलोग कभी उसके साथ नहीं जा सकते हैं (RJD की ओर इशारा)। उनके खिलाफ हमलोग 2005 में लड़े थे। एक-एक काम हुआ। और सारा काम आप के हित में करेंगे। हालांकि यह बयान देने के तुरंत बाद नीतीश कुमार ने डैमेज कंट्रोल करते हुए कहा कि ललन सिंह को जल्दी ही यह समझ आ गया था कि आरजेडी कुछ गड़बड़ी कर रही है, और अपनी गलती महसूस करते हुए उन्होंने जेडीयू को फिर से एनडीए में वापस लाने की कोशिश की।

नीतीश-ललन संबंधों में आई दरार की कहानी

ललन सिंह को नीतीश कुमार का पुराना और भरोसेमंद साथी माना जाता रहा है। लेकिन 2022 से 2023 के बीच ललन सिंह और आरजेडी प्रमुख लालू प्रसाद यादव की नजदीकियों को लेकर अटकलें तेज थीं। जेडीयू नेताओं के अनुसार, यही कारण रहा कि नीतीश कुमार और ललन सिंह के रिश्तों में खटास आ गई। इसका असर दिसंबर 2023 में दिखाई दिया, जब नीतीश कुमार ने जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष का पद फिर से संभाला और ललन सिंह को हटाकर खुद अध्यक्ष बन गए। इसके एक महीने बाद यानी जनवरी 2024 में जेडीयू ने एक बार फिर एनडीए में वापसी की।

जब नीतीश ने सार्वजनिक रूप से मानी गलती

NDA में वापसी के बाद से नीतीश कुमार कई बार सार्वजनिक मंचों से यह स्वीकार कर चुके हैं कि 2022 में बीजेपी से गठबंधन तोड़ना उनकी गलती थी। उन्होंने मार्च 2024 में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के साथ एक रैली में भी दो टूक कहा था कि वे अब कभी भी बीजेपी का साथ नहीं छोड़ेंगे, और पिछली दो बार का अलगाव गलती था।

NDA गठबंधन में ही निखरती है नीतीश की सियासी चमक

नीतीश कुमार का सियासी ग्राफ हर बार एनडीए के साथ रहते हुए ही तेजी से ऊपर गया है। अक्टूबर 2005 में जब वे पहली बार एनडीए के सीएम चेहरा बने, तब गठबंधन ने 243 सीटों में से 130 से अधिक सीटें जीती थीं और जेडीयू गठबंधन की वरिष्ठ पार्टी बनकर उभरी थी। 2009 के लोकसभा चुनाव में भी एनडीए को बिहार में 31 सीटें मिली थीं, जिनमें से 21 जेडीयू के खाते में गईं। इसके बाद 2010 के विधानसभा चुनाव में एनडीए ने 206 सीटों के साथ प्रचंड बहुमत हासिल किया था। जेडीयू ने अकेले 115 सीटें जीती थीं।

लेकिन नीतीश की राष्ट्रीय महत्वाकांक्षाएं और नरेंद्र मोदी से मतभेद के कारण उन्होंने जून 2013 में एनडीए से नाता तोड़ लिया। 2014 के लोकसभा चुनाव में जेडीयू को महज दो सीटें ही मिलीं। बाद में उन्होंने आरजेडी से गठजोड़ किया और भले ही 2015 में फिर से सीएम बने, लेकिन पार्टी की ताकत घट चुकी थी और उन्हें उभरते नेता तेजस्वी यादव के साथ तालमेल बिठाना पड़ा। 2017 में उन्होंने फिर से पलटी मारी और एनडीए में लौटे, लेकिन तब तक उनकी राजनीतिक हैसियत को ठेस लग चुकी थी। इसके बाद वे 2022 में फिर से महागठबंधन में शामिल हुए और 2024 की शुरुआत में एक बार फिर एनडीए में लौटे।

नीतीश के बयान का क्या है राजनीतिक संदेश

मधुबनी की रैली में दिए गए नीतीश कुमार के बयान को दो तरह से देखा जा रहा है, एक ओर यह एनडीए को विश्वास दिलाने की कोशिश है कि अब कोई ‘यू-टर्न’ नहीं होगा, वहीं दूसरी ओर यह बयान उनके भीतर की राजनीतिक मजबूरियों और पार्टी में मची अंदरूनी खींचतान की ओर संकेत कर रहा है।

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