बिहार में कितना सफल होगा राहुल गांधी का दांव ? जानें क्या है कांग्रेस की नई दलित रणनीति

Congress strategy in Bihar : दरभंगा में ‘शिक्षा न्याय संवाद’ के जरिए कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि पार्टी अब दलित और पिछड़े वर्गों को केंद्र में रखकर अपनी चुनावी रणनीति को धार देने में जुट गई है। अंबेडकर हॉस्टल में अनुसूचित जाति और जनजाति (SC/ST) समुदाय के छात्रों से मुलाकात और तीन ठोस मांगों जातीय जनगणना, निजी संस्थानों में आरक्षण, और SC-ST सब प्लान फंड की सुनिश्चितता के जरिए राहुल गांधी ने सामाजिक न्याय की राजनीति को नए सिरे से परिभाषित करने की कोशिश की है।

हालांकि स्थानीय प्रशासन ने इस कार्यक्रम की अनुमति नहीं दी थी, लेकिन कांग्रेस ने इस असहमति को एक राजनीतिक अवसर में बदल दिया। यह बिहार में पिछले पांच महीनों में राहुल गांधी की चौथी यात्रा थी और यह संयोग नहीं हो सकता। केंद्र सरकार द्वारा हाल ही में जातीय जनगणना कराने की घोषणा और बिहार में आगामी विधानसभा चुनाव को देखते हुए यह दौरा खासा रणनीतिक नजर आता है।

बदले समीकरणों में कांग्रेस की नई राह

कांग्रेस की इस बार की रणनीति पर अगर गौर किया जाए, तो साफ होता है कि पार्टी ने अपने पारंपरिक दलित वोट बैंक को फिर से साधने की ठानी है। यही वजह है कि पार्टी नेतृत्व में बदलाव करते हुए अखिलेश प्रसाद सिंह की जगह दलित नेता राजेश राम को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया। साथ ही, सुशील पासी जैसे सामाजिक रूप से प्रभावशाली नेता को बिहार का सह-प्रभारी नियुक्त किया गया। इतना ही नहीं, कांग्रेस ने इस वर्ष फरवरी में पहली बार प्रसिद्ध पासी नेता जगलाल चौधरी की 130वीं जयंती मनाई, जिसमें खुद राहुल गांधी ने भाग लिया। ये सभी कदम इस ओर इशारा करते हैं कि कांग्रेस बिहार में अपने खोए जनाधार को पुनः हासिल करने की गंभीर कोशिश कर रही है।

वोट शेयर की सच्चाई

लेकिन ज़मीनी सच्चाई कांग्रेस के लिए चुनौतीपूर्ण (Congress strategy in Bihar) बनी हुई है। 1990 के दशक में जहां कांग्रेस का वोट शेयर लगभग 25% के करीब था, वहीं 2020 के विधानसभा चुनाव में यह गिरकर 9.48% तक पहुंच गया।

वर्ष – वोट शेयर (%)

  • 1990 -24.78%
  • 1995 -16.30%
  • 2000 -11.06%
  • 2005 -6.09%
  • 2010 -8.37%
  • 2015 -6.7%
  • 2020 -9.48%

नीतीश कुमार के सत्ता में आने के बाद कांग्रेस का पतन लगातार जारी रहा है। एक समय था जब दलित कांग्रेस का मजबूत वोट बैंक हुआ करते थे, लेकिन 2005 के बाद जेडीयू ने इस वर्ग को अपने पक्ष में मोड़ लिया।

Congress strategy in Bihar : क्या बदलेगी तस्वीर?

बिहार की राजनीति में दलित समुदाय की अहम भूमिका है, राज्य की 243 विधानसभा सीटों में से 38 अनुसूचित जाति और 2 अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं। ऐसे में कांग्रेस (Congress strategy in Bihar) यदि इस वर्ग को फिर से अपने साथ जोड़ने में सफल होती है, तो यह पार्टी के लिए निर्णायक मोड़ साबित हो सकता है। लेकिन सिर्फ प्रतीकात्मक कार्यक्रमों या नेताओं की नियुक्तियों से बात नहीं बनेगी। राहुल गांधी को यह साबित करना होगा कि कांग्रेस की यह नई पहल केवल चुनावी रणनीति नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय की एक गंभीर प्रतिबद्धता है। अगर कांग्रेस यह दिखा सके कि वह सचमुच दलितों के अधिकारों और विकास के लिए समर्पित है, तो शायद उसे अपनी खोई राजनीतिक जमीन वापस मिल सके। लेकिन यह सफर आसान नहीं होगा। उसे लगातार, स्पष्ट और ज़मीनी स्तर पर काम करना होगा वर्ना यह कोशिश भी महज़ एक चुनावी स्टंट बनकर रह जाएगी।

राहुल गांधी की बिहार में आक्रामक सक्रियता और दलित समुदाय के प्रति उनका झुकाव कांग्रेस के लिए नई संभावनाओं के दरवाज़े खोल सकता है। लेकिन इतिहास और वर्तमान हालातों को देखते हुए यह स्पष्ट है कि इस रणनीति की सफलता के लिए शब्दों से ज्यादा कर्म की ज़रूरत होगी। बिहार में कांग्रेस का भविष्य इसी पर निर्भर करता है कि वह अपनी बात को नारेबाज़ी से आगे ले जाकर ज़मीनी हकीकत में कैसे बदलती है।

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