RCB victory parade stampede : क्या कोई जीत इतनी बड़ी हो सकती है कि उसके जश्न में ज़िंदगियाँ दाँव पर लगा दी जाएँ? क्या एक ट्रॉफी की चमक उन 11 चेहरों की चमक से ज़्यादा कीमती है जो अब हमारे बीच नहीं रहा?
बुधवार की शाम बेंगलुरु के लिए जश्न की नहीं मातम की शाम बनकर आई.जहां चिन्नास्वामी स्टेडियम के अंदर हजारों लोग रॉयल चैलेंजर्स बैंगलोर (RCB) की पहली आईपीएल जीत का जश्न मनाने उमड़े थे, वहीं स्टेडियम के बाहर खड़ी लाखों लोगों की भीड़ में 11 जिंदगियाँ हमेशा के लिए खो गई और दर्जनों घायल हुए. इन 11 चेहरों के लिए कोई क्लाइमेक्स नहीं था. भीड़ के कारण न तो उन्हें कप देखने को मिला और ना ही पसंदीदा खिलाड़ियों की एक झलक. मिला तो सिर्फ धक्का मिला, धूल मिली और फिर मौत का आलिंगन. सवाल ये नहीं है कि हादसा कैसे हुआ ? बड़ा सवाल ये है कि सरकार और प्रशासन की मौजूदगी के बाद भी इसे टाला क्यों नहीं जा सका?
कर्नाटक के मुख्यमंत्री ने इसे दूसरे अन्य घटना की तरह अप्रत्याशित दुर्घटना बताया, क्रिकेट संघ पर उंगली उठाई और फिर कुंभ मेले से तुलना कर राजनीति से भी जोड़ दिया. ताकि दूसरी पार्टी कुछ ज्यादा आरोप ना लगा सकें. लेकिन जिस देश में क्रिकेट सिर्फ खेल नहीं होकर… भावना है…दीवानगी है. उस देश में क्रिकेट के भीड़ के कारण ऐसे हादसों का होना क्या यह सिर्फ एक संयोग था? क्या लाखों की भीड़ का जमा होना इतना अप्रत्याशित था? क्या किसी को इसका अंदाज़ा नहीं था कि शहर की सड़कों पर इतनी भीड़ उतरेगी?
भारत में क्रिकेट के प्रति दीवानगी का मंजर ऐसा है कि बचपन की वो गलियां याद आने लगती हैं, जहाँ क्रिकेट खेलने के लिए शाम की रौशनी से दौड़ लगाती थी. जहाँ टॉस जीतना किसी वर्ल्ड कप जैसा लगता था. लेकिन तब उस दीवानगी में जान का डर नहीं था. लेकिन अब ये दीवानगी खून मांगने लगी है? अब जश्न मौत के साए में मनाया जा रहा है. और हम चुप हैं. आप खुद सोचिए जिस उत्सव में भाग लेने के लिए लोग पहुंचे थे वहां एक तरफ स्टेडियम के भीतर संगीत बजाया जा रहा था, मंच सजाया था, ट्रॉफी चमक रही थी तो दूसरी तरफ बाहर, सड़क पर किसी की साँसें टूट रही थीं.. कोई CPR माँग रहा था.. कोई मदद के लिए पुकार रहा था. लेकिन वहाँ जवाब देने वाला कोई नहीं था. क्योंकि जिन्हें जवाब देना था वो हाथ में कप लिए कैमरे के सामने सेल्फी ले रहे थे.मानों न BCCI… न IPL… न प्रशासन…ना वो खिलाड़ी… 11 लोगों की मौत किसी की ज़िम्मेदारी ही न हो.
जश्न का हक़ सभी को है. जीत की खुशी मनाना भी जरूरी है. लेकिन जब कोई जश्न दूसरों की जान ले ले तो क्या हमें ठहरकर ये नहीं सोचना चाहिए कि हमने कहाँ चूक रहें? क्या ट्रॉफी की तस्वीरें निहारने से पहले हमें उन 11 चेहरों की तस्वीरें भी नहीं देखनी चाहिए जो अब कभी स्टेडियम नहीं आ सकेंगे? इन सवालों के साथ हमें तय करना होगा कि क्या हम सिर्फ तमाशा देखने वाले रहेंगे या कभी इस व्यवस्था पर सवाल भी करेंगे. क्योंकि भीड़ का भले कोई चेहरा नहीं होता…लेकिन उनमें शामिल हर चेहरे का एक परिवार होता है..जिसकी कीमत एक ट्रॉफी की चमक से ज्यादा होती है…