ओवैसी क्यों बन सकते हैं तेजस्वी के मुख्यमंत्री बनने की राह में सबसे बड़ी रुकावट? जानें क्या कहता है समीकरण 

Bihar chunav : बिहार में इस साल के आखिर में होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर सियासी पारा चढ़ हुआ है। राज्य की सत्ता पर काबिज होने के लिए दो बड़े गठबंधन एनडीए और इंडिया ब्लॉक तैयारियों में जुटे हैं। एनडीए में भाजपा, जेडीयू, हम (मांझी) और एलजेपी (रामविलास) शामिल हैं, जबकि इंडिया गठबंधन में राजद, कांग्रेस, वाम दल, वीआईपी और एलजेपी (पशुपति पारस) का साथ है।

हालांकि, इन दोनों गठबंधनों के भीतर सीट बंटवारे को लेकर मतभेद और मंथन जारी है। इसी बीच एक ऐसा नाम फिर से चर्चा में है जो न एनडीए का हिस्सा है और न इंडिया गठबंधन का असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM। और यही पार्टी फिलहाल तेजस्वी यादव के मुख्यमंत्री बनने की राह में सबसे बड़ी चुनौती बनती दिख रही है।

क्यों ओवैसी से डर रहे हैं लालू और तेजस्वी?

बिहार की राजनीति में राजद हमेशा से मुस्लिम-यादव (MY) समीकरण पर निर्भर रही है। लालू यादव के दौर से लेकर तेजस्वी यादव तक, मुस्लिम वोटबैंक राजद का मजबूत स्तंभ रहा है,खासकर सीमांचल इलाके में। लेकिन पिछले कुछ सालों में ओवैसी की AIMIM ने इस क्षेत्र में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई है।

2020 विधानसभा चुनाव में AIMIM ने सीमांचल की 5 सीटों पर जीत दर्ज की थी। ये वही सीटें थीं, जहां मुस्लिम आबादी बहुल है और पारंपरिक रूप से राजद का प्रभाव रहा करता था। हालांकि बाद में AIMIM के 4 विधायकों को राजद में शामिल हो गए जिससे पार्टी को तत्कालिक राहत तो मिली, लेकिन रिपोर्ट की मानें तो ओवैसी की पकड़ कम नहीं हुई।

इस बार क्यों ज्यादा खतरा?

AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी लगातार बिहार के दौरे कर रहे हैं। सीमांचल के कई जिलों में उनकी पार्टी की सक्रियता बढ़ी है। कटिहार, किशनगंज, अररिया और पूर्णिया जैसे जिलों में AIMIM की मौजूदगी से तेजस्वी यादव की चिंता बढ़ गई है। अगर ओवैसी यहां अच्छा प्रदर्शन करते हैं, तो इससे सीधे तौर पर राजद का मुस्लिम वोट बैंक टूटेगा और इसका फायदा भाजपा-जेडीयू गठबंधन को मिल सकता है।

क्या AIMIM को लेकर रणनीति में बदलाव होगा?

तेजस्वी यादव और उनके रणनीतिकारों के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है AIMIM को नजरअंदाज करें या किसी रूप में सीमित सहयोग का रास्ता तलाशें। लेकिन अभी तक के संकेत यही हैं कि राजद AIMIM के साथ किसी भी तरह के गठबंधन से बचना चाहता है। पार्टी मान रही है कि AIMIM का साथ लेने से ओबीसी, दलित और सेक्युलर वोटरों में भ्रम पैदा होगा, और इससे अन्य पार्टियों को फायदा मिलेगा।

राजद के लिए असली चुनौती सीमांचल !

राजनीतिक विश्लेषकों की माने तो बिहार चुनाव में तेजस्वी यादव की राह में असली चुनौती भाजपा या जेडीयू नहीं, बल्कि सीमांचल के वो इलाके हैं जहां AIMIM की जड़ें गहराती जा रही हैं। यदि AIMIM यहां 8-10 सीटें निकालने में कामयाब होती है, तो महागठबंधन का समीकरण गड़बड़ा सकता है और यही तेजस्वी के मुख्यमंत्री बनने के सपने की सबसे बड़ी रुकावट बन सकता है।

 

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