महज 15 दिनों के लिए साल भर का विवाद…UP में कांवड़ यात्रा पर क्यों होती है राजनीति?

Kanwar yatra : सावन का महीना शुरू होते ही उत्तर भारत के कई हिस्सों में कांवड़ यात्रा की रौनक देखने को मिलने लगती है. यह धार्मिक यात्रा उत्तर प्रदेश,उत्तराखंड, बिहार और झारखंड जैसे राज्यों में श्रद्धालुओं के लिए गहरी आस्था का विषय है.हालांकि यूपी के कुछ इलाकों में यह धार्मिक यात्रा सामाजिक और राजनीतिक विवाद के भेंट भी चढ़ जाता है.

शुरुआत उत्तर प्रदेश से हो चुकी है तो इस लेख की शुरुआत यहीं से करते हैं.यूपी में सावन का आधा महीना कांवड़ियों के नाम रहता है. सावन के महीने में होने वाली यह यात्रा प्रदेश में विशेष रूप से हरिद्वार से गंगाजल लाकर मेरठ,गाजियाबाद,मुजफ्फरनगर होते हुए श्रद्धालु अपने गांवों और कस्बों के शिव मंदिरों में जल अर्पित कर सम्पन्न करते हैं. वैसे तो सावन के पहले और बाद में कांवड़ यात्रा होती है लेकिन जो धूम और उत्साह सावन में इस यात्रा को लेकर देखी जाती है वो दूसरे महीने में नहीं देखने को मिलता है और सावन में भी इसका धूम महज पंद्रह दिनों तक ही रहती है.

राजनीतिक रूप से भले ही उत्तर प्रदेश के कांवड़ यात्रा की चर्चा खूब होती हो लेकिन बिहार के सुल्तानगंज से शुरु होकर झारखंड के देवघर को जाने वाली कांवड़ यात्रा ऐतिहासिक यात्रा के रूप में ख्याति प्राप्त कर चुका है. बिहार से शुरु होने वाली यह यात्रा भागलपुर जिले के सुल्तानगंज से शुरू होकर झारखंड के देवघर स्थित बाबा बैद्यनाथ धाम तक जाती है, जिसे श्रद्धालु बाबाधाम के नाम से जानते हैं. वैसे तो यह यात्रा पूरे साल चलती है, लेकिन सावन में इसकी रफ्तार और भी तेज हो जाती है.करीब 100 किलोमीटर लंबी इस यात्रा का 80 किलोमीटर हिस्सा बिहार में पड़ता है. सुल्तानगंज से देवघर तक का यह रास्ता कच्चा, पक्का, पहाड़ी और जंगलों से होकर गुजरता है. श्रद्धालु नंगे पांव यात्रा करते हुए शिवगंगा में स्नान कर बाबा बैद्यनाथ को जल अर्पित करते है.

सालभर चलने वाली यह कांवड़ यात्रा कभी राजनीति का शिकार हुई हो ऐसी खबरें ना के बराबर ही है….लेकिन सावन के महीने में उत्तर प्रदेश के घर घर से निकलने वाली कांवड़ यात्रा ना सिर्फ राजनीति का शिकार होती है बल्कि यह धार्मिक यात्रा सामाजिक तनावों और प्रशासनिक चुनौतियों का केंद्र बनती दिखती है. यात्रा मार्ग में सरकारी, गैर-सरकारी संस्थाओं और स्वयंसेवकों द्वारा पंडाल, चिकित्सा कैंप और भोजनालय लगाए जाते हैं, जो 24 घंटे खुले भी रहते हैं. लेकिन यहां मिलने वाली सुविधा, सुरक्षा और विश्वसनीयता अकसर सवालों के घेरे में आ खड़ी हो जाती है और प्रशासन के लिए व्यवस्था लागू करने से ज्यादा इन मार्गों पर धार्मिक सौहार्द बनाए रखना एक बड़ी चुनौती होती है. इसके पीछे कई कारण हैं, जो सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक कारणों का मिश्रण हैं.

लाखों हिंदू श्रद्धालुओं की आस्था का प्रतीक कांवड़ यात्रा का उपयोग राजनीतिक दल और नेता अपने कथित हिंदुत्व विचारधारा के नाम पर वोट बैंक को साधने के लिए करते हैं. सोशल मीडिया पर वायरल कई तस्वीरों और वीडियो के कारण इस मार्ग पर दुकानों और ढाबों के लिए बनाए गए नियमों ने विवाद को जन्म दिया है.  यात्रा मार्ग से निकला यह विवाद सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है. इन सब कारकों से आप यह अंदाजा लगा सकते है कि यह कितना बड़ा राजनीतिक मुद्दा है.

हालांकि इसमें भी काफी हद तक सच्चाई है कि कुछ लोग कांवड़ यात्रा को सांप्रदायिक तनाव बढ़ाने के अवसर के रूप में देखते हैं. उदाहरण के लिए, मुजफ्फरनगर में धर्म जानने के लिए दुकानदारों की चेकिंग या कपड़े उतरवाने की जो घटनाएं सामने आईं है या फिर पहचान छिपा कर आस्था के साथ खिलवाड़ की जो खबरें सामने आती है वह ना सिर्फ  दोनों पक्ष और विपक्ष के बीच वैचारिक टकराव को जन्म देता है, बल्कि राजनीतिक दलों द्वारा इसे अपने-अपने पक्ष में भुनाने को की जाने वाली कोशिश ही तो राजनीति है. कांवड़ यात्रा उत्तर भारतीय राज्यों में बड़े पैमाने पर होती है, जहां हिंदू मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते हैं. कुछ राजनीतिक दल इसे हिंदुत्व के प्रतीक के रूप में पेश करके अपने समर्थन को मजबूत करने की कोशिश करते हैं. वहीं विपक्ष इसे धर्म के नाम पर वोट बैंक की राजनीति कहकर इसका विरोध करता है.

देखा जाए तो कांवड़ यात्रा मूल रूप से धार्मिक और आध्यात्मिक है, लेकिन हाल के वर्षों में इसे लेकर बनाए गए नियम, प्रशासनिक हस्तक्षेप, और हिंसक घटनाओं ने इसे राजनीतिक बहस का मुद्दा बना दिया है. यह धार्मिक आयोजन, जो कभी सौहार्द और भाईचारे का प्रतीक था अब कुछ हद तक ध्रुवीकरण और सियासी रणनीतियों का हिस्सा बन गया है.

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