बिहार की सियासत में पूरी तरह से परिपक्व हो गए हैं तेजस्वी यादव ! पिता के नाम भी विधानसभा में क्यों मौन रह गए नेता विपक्ष

Tejasvi yadav politics : लालू यादव ने अपने बेटे को जो राजनीति सिखाई है उसका अभ्यास वो सही कर रहे हैं…हालांकि यह पहली बार नहीं है जब उन्होंने राजनीतिक धैर्य का परिचय दिया हो… बिहार विधानसभा का मानसून सत्र 2025 राज्य के नेताओं की वो हकीकत बयां कर रहा है जिसमें आप ये समझ सकते है उन्होंने नेता होना ही क्यों चुना है. चाहे यह राजनीति उन्हें जागीर में मिली हो या फिर किसी दूसरे तरीके से…बिहार विधानसभा की हालिया कार्यवाही को अगर ध्यान से देखा जाए तो यह बातें बिल्कुल साफ हैं कि…विपक्ष हो या सरकार, किसी को जनता से कोई सरोकार नहीं है. इसलिए तो आज 20 साल बाद भी चर्चा मुख्यमंत्री लालू यादव और राजद सरकार की होती है. नतीजा राज्य की मौजूदा राजनीति अपने विकास कार्यों या नीति संवादों के इर्दगिर्द नहीं घूमती, बल्कि दशकों पुराने ‘लालू युग’ के राजनीतिक साए में ही अपनी दिशा तलाशती नजर आती है।

बीच का लगभग 4 साल छोड़ दें तो बीते 20 सालों से राज्य की सत्ता पर काबिज बीजेपी-जदयू सरकार की मौजूदा रणनीति को देखकर लगता है कि विकास कार्यों, प्रशासनिक उपलब्धियों या जनता के रोजमर्रा के मुद्दों पर बात करने की ज़रूरत उन्हें नहीं लगती। क्योंकि सदन में जो बहस हो रही है, वह नीतियों पर कम और लालू यादव के राजनीतिक अतीत पर ज्यादा होती है। आप इसे सत्ता की कुर्सी तक पहुंचने का एक प्रकार का सियासी शॉर्टकट कह सकते हैं.जब कोई जवाब न हो,तो पिछली पीढ़ी की गलतियों की किताब खोल दी जाए। लेकिन सवाल यह है कि क्या बिहार की जनता बार-बार उन्हीं बहसों को क्यों सुनती रहेगी, जिनका वर्तमान से कोई सीधा संबंध नहीं है? आंकड़ों की बात मानें तो राज्य की जो मौजूदा हालात है वो पिछली सरकार से तो बदतर है…

एक तरफ बीजेपी-जदयू की बयान बाजी है तो दूसरी तरफ तेजस्वी यादव की राजनीति जो अब परिपक्वता की उस सीढ़ी पर पहुँच चुका है, जहां वो व्यक्तिगत हमलों,परिवार पर कीचड़ उछालने की कोशिशों और सत्ताधारी दल की छींटाकशी से न तो नेता विपक्ष ना तो विचलित होते हैं और न ही हड़बड़ाते हैं।

लालू राज का ये राजकुमार राजनीतिक धैर्य की उस कसौटी को पार कर लिया है. जिसका उदाहरण बिहार विधानसभा की आज की कार्रवाई है. बिहार में जारी SIR को लेकर तेजस्वी यादव जब सरकार को घेरने खड़े हुए तो सम्राट चौधरी ने लालू यादव राज की याद दिलाई। जैसे सत्ता पक्ष के पास हर सवाल का एक ही जवाब है लालू यादव का अतीत। क्योंकि बाकी काम तो सोशल मीडिया कर ही देता है. जैसा की आज भी हुआ.सोशल मीडिया पर चल रही वायरल क्लिप की सच्चाई और विधानसभा में हुई असल बातचीत में बड़ा फर्क है। जिस ‘गीला होने’ वाली टिप्पणी को लेकर हंगामा मचाया गया,वह तेजस्वी यादव ने सम्राट चौधरी को सीधे संबोधित कर नहीं कही थी। बल्कि यह उन विधायकों की ओर इशारा था, जो बिना कारण शोर मचा रहे थे। लेकिन सत्ता पक्ष ने जानबूझकर उसे गलत ढंग से पेश किया ताकि असल मुद्दे से ध्यान हटाया जा सके।

जबकि होना ये चाहिए था सम्राट चौधरी को अपने द्वारा प्रयोग किए गए शब्दों के लिए माफी मांग लें…वैसे भी सदन सांसद का हो या बिहार विधानसभा का ये ऐसी जगह बन चुकी है जहाँ नीतियों पर बहस कम और चरित्र हनन ज्यादा होता है। जो संस्थान जनता की आवाज़ उठाने और लोकतांत्रिक संवाद की मिसाल बनने चाहिए,वो अब निजी छींटाकशी का मंच बनकर रह गए हैं।

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