Shibu Soren life Story : आदिवासी समुदाय के हक और उनकी जीवनशैली से जुड़ा हुआ नारा “जल, जंगल, जमीन” आज भी भारतीय राजनीति और समाज में गहरी छाप छोड़ता है. यह नारा आदिवासियों के प्राकृतिक संसाधनों,जल, जंगल और जमीन पर उनके पारंपरिक अधिकारों का प्रतीक बन चुका है, जो उनके अस्तित्व, संस्कृति और आजीविका के लिए अभिन्न हैं.
इस नारे को जन-जन तक पहुंचाने और इसे आदिवासी अधिकारों का प्रतीक बनाने का श्रेय जाता है शिबू सोरेन को. जिन्होंने दुनिया को अब अलविदा कह दिया. वे 81 साल के थे और बीते करीब डेढ़ महीने से वे ब्रेन स्टोक और शरीर के बाएं हिस्से में पैरालिसिस का इलाज के दिल्ली के सर गंगाराम हॉस्पिटल में एडमिट थे.
झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) के संस्थापक और झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री शिबू सोरेन, जिन्हें “दिशोम गुरु” के नाम से जाना जाता है. भले वो अब दुनिया में नहीं रहे लेकिन शिबू सोरेन का संघर्ष आज भी आदिवासियों के शोषण और उनके प्राकृतिक संसाधनों पर गैर-आदिवासियों के कब्जे के खिलाफ खड़ा है. जल, जंगल, जमीन का नारा आदिवासी समुदाय के जीवन का हिस्सा बन चुका है. यह नारा एक आंदोलन की शुरुआत का प्रतीक है, जो आदिवासियों को उनके अधिकार दिलाने और उनके खिलाफ हो रहे शोषण और भूमि हड़पने की प्रक्रिया के खिलाफ खड़ा हुआ. शिबू सोरेन के नेतृत्व में आदिवासियों ने “धानकटनी आंदोलन” जैसी कई मुहिमों की शुरुआत की, जिसका उद्देश्य उनकी जमीन की वापसी और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करना था.
शिबू सोरेन ने आदिवासियों की जमीन की रक्षा के लिए कई कानूनों को लागू करने की दिशा में काम किया. इनमें छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम (CNT) और संथाल परगना काश्तकारी अधिनियम (SPT) जैसे महत्वपूर्ण कानून शामिल थे, जो आदिवासी भूमि के अधिकारों की रक्षा करते थे.
शिबू सोरेन का जन्म 11 जनवरी 1944 को झारखंड के रामगढ़ जिले के नेमरा गांव में हुआ था. वे संथाल आदिवासी समुदाय से हैं, और अपने समुदाय के अधिकारों के लिए उनके संघर्ष ने उन्हें एक महत्वपूर्ण नेता बना दिया. 1972 में झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) की स्थापना के साथ उन्होंने आदिवासियों और मूलवासियों के अधिकारों के लिए अपनी राजनीति की शुरुआत की. झारखंड मुक्ति मोर्चा का उद्देश्य सिर्फ आदिवासियों के अधिकारों की रक्षा करना नहीं था, बल्कि यह झारखंड को एक अलग राज्य का दर्जा दिलाने की दिशा में भी था. शिबू सोरेन ने इस आंदोलन में “जल, जंगल, जमीन” के नारे को प्रमुखता दी, जो आदिवासियों के प्राकृतिक संसाधनों पर उनके अधिकारों की बात करता है.
शिबू सोरेन तीन बार झारखंड के मुख्यमंत्री बने (2005, 2008-09, और 2010 में). हालांकि उनका कार्यकाल छोटा और विवादों से घिरा रहा. इसके बावजूद वे हमेशा आदिवासियों के अधिकारों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता में सख्त रहे.
शिबू सोरेन के राजनीतिक कार्यकाल पर भ्रष्टाचार और हत्या के आरोप लगे, जिनमें 1994 में उनके निजी सचिव की हत्या का मामला प्रमुख था. हालांकि, बाद में वे कुछ मामलों में बरी हुए. उनका जीवन एक ओर जननेता के रूप में आदिवासियों का मसीहा था,वहीं दूसरी ओर विवादित और आलोचनाओं के घेरे में भी था. इन सब के बाद भी उनकी छवि आज भी एक संघर्षशील और विवादास्पद नेता की बनी हुई है. इसके बावजूद, उन्होंने अपनी राजनीतिक और सामाजिक गतिविधियों के माध्यम से आदिवासियों के अधिकारों की रक्षा के लिए कई ऐतिहासिक कदम उठाए.
उनकी यह सोच थी कि “जल, जंगल, जमीन” आदिवासियों की विरासत हैं और इन संसाधनों का संरक्षण उनके जीवन और पहचान के लिए अत्यंत आवश्यक है. इस दृष्टिकोण ने आदिवासी समुदायों में एक नई उम्मीद और संघर्ष की लहर पैदा की. शिबू सोरेन का परिवार भी झारखंड की राजनीति में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. उनका बेटा हेमंत सोरेन वर्तमान में झारखंड के मुख्यमंत्री हैं, और उनके नेतृत्व में झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) अभी भी राज्य की राजनीति में प्रभावी है.
शिबू सोरेन को झारखंड के आदिवासी समुदायों के बीच एक मसीहा के रूप में देखा जाता है. उनके द्वारा किए गए आंदोलनों ने 2000 में झारखंड को अलग राज्य बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. शिबू सोरेन न केवल झारखंड के आदिवासी समुदायों के अधिकारों के लिए एक प्रेरणा स्रोत रहे हैं, बल्कि उनके आंदोलनों ने पूरे देश में आदिवासी अधिकारों और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण बदलाव लाए. उनकी राजनीतिक यात्रा, संघर्ष और विरासत आज भी भारतीय राजनीति में जीवित है, और “जल, जंगल, जमीन” का नारा आज भी उनके आदिवासी अधिकारों के आंदोलन का प्रतीक बना हुआ है.