Vote Adhikar Yatra : बिहार में वोट अधिकार यात्रा के दौरान वीआईपी सुप्रीमो मुकेश सहनी का गुस्सा और उनके भीतर की बेचैनी स्पष्ट रूप से देखी जा सकती थी. सासाराम में आयोजित एक कार्यक्रम में सहनी का रवैया उनके पहले के उत्साही और जोशीले अंदाज से पूरी तरह अलग था जैसा कि महागठबंधन की सभाओं में हमेशा जो ऊर्जा और उत्साह सहनी में दिखता था. हालांकि उन्होंने विपक्ष की एकजुटता और भाजपा को सत्ता से बेदखल करने का संकल्प तो दोहराया, लेकिन वे तेजस्वी यादव और लालू यादव का नाम लेने से परहेज करते हुए साफ दिखे.
यह पहली बार था कि सहनी ने महागठबंधन के शीर्ष नेताओं का नाम भी बेहद सहेजे हुए लिया और उनकी ओर से कभी तेजस्वी का समर्थन नहीं दिखा,जैसा पहले हुआ करता था. यही नहीं,अलग अलग मंचों से खुद को कई बार डिप्टी CM का दावेदार बताने वाले सहनी ने खुद को डिप्टी सीएम के रूप में प्रस्तुत करने से भी परहेज किया. ऐसा प्रतीत होता है कि महागठबंधन में अपनी स्थिति को लेकर उनका आत्मविश्वास डगमगाया है.
क्या है सहनी की जिद?
सन ऑफ मल्लाह के नाम से खुद को प्रोजेक्ट करने वाले मुकेश सहनी ने बिहार में निषाद समुदाय (लगभग 12-13% वोट शेयर) के मतदाताओं के बीच खुद को एक मजबूत राजनीतिक ताकत के रूप में उभारा है. उनकी पार्टी VIP इस समुदाय का प्रतिनिधित्व करती है, जो अति पिछड़ा वर्ग में आता है. वह महागठबंधन में एक महज एक सहयोगी की भूमिका से संतुष्ट नहीं हैं और लगातार अपनी राजनीतिक स्थिति को मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं.
सहनी ने कई बार स्पष्ट किया है कि वह महागठबंधन में 60 विधानसभा सीटों की मांग कर रहे हैं. विशेष रूप से चंपारण और दरभंगा जैसे इलाकों में उनकी पार्टी की प्रभावी पकड़ को देखते हुए यह मांग उनकी पार्टी की मजबूत स्थिति का प्रतीक है. इससे महागठबंधन के अन्य घटक दलों में तनाव बढ़ गया है. महागठबंधन में पहले से पांच पार्टियां हैं, और अब दो नए दलों के आने से सीटों का बंटवारा और भी जटिल हो गया है. इस बार 243 सीटों को सात दलों में बांटना होगा, और जाहिर है कि बिना किसी दल को नुकसान पहुंचाए यह काम संभव नहीं है.
मुकेश सहनी को मिलेगा डिप्टी सीएम का पद
मुकेश सहनी ने खुलकर उपमुख्यमंत्री पद की दावेदारी की है. उन्होंने यह स्पष्ट किया कि अगर तेजस्वी यादव मुख्यमंत्री बनते हैं, तो वह सरकार में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के लिए उपमुख्यमंत्री का पद चाहते हैं. उनकी यह मांग महागठबंधन में एक बड़ा सिरदर्द बन चुकी है. सहनी की ये महत्वाकांक्षाएं महागठबंधन के लिए एक गंभीर चुनौती पेश कर रही हैं, खासकर इसलिए क्योंकि सहनी के निषाद समुदाय के वोटों की महत्ता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.
दो नावों की सवारी?
मुकेश सहनी की सियासी यात्रा में हमेशा दो नावों की सवारी करने की आदत रही है. पहले वह महागठबंधन का हिस्सा बने, फिर एन वक्त पर एनडीए में शामिल हो गए, जहां भाजपा ने उन्हें 11 सीटें दीं. अब एक बार फिर वह महागठबंधन से उम्मीदें लगाकर अपनी राजनीतिक चालें बढ़ा रहे हैं, लेकिन यह भी चर्चा में है कि वह भाजपा से बातचीत कर रहे हैं.
सहनी की राजनीतिक सटीकता यह है कि वे हर स्थिति में अपने लिए सबसे अधिक लाभ लेने की कोशिश करते हैं. इसके बावजूद, जब महागठबंधन के नेताओं ने उन्हें उपमुख्यमंत्री बनाने से इंकार किया, तो उनकी नाराजगी एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया थी. यही वजह थी कि उन्होंने अपने संबोधन में तेजस्वी यादव का नाम लेने से भी बचने का निर्णय लिया.
सीट बंटवारे की गुत्थी
महागठबंधन में कांग्रेस, RJD और VIP के बीच सीटों का बंटवारा एक जटिल मुद्दा बन चुका है. कांग्रेस की सीटों की संख्या को लेकर अभी तक कोई स्पष्टता नहीं है. पिछले चुनाव में कांग्रेस ने 70 सीटों पर चुनाव लड़ा था, लेकिन इस बार VIP के बढ़ते प्रभाव और RJD के हिस्से की सीटों की संख्या के चलते उसकी सीटें कम हो सकती हैं. कांग्रेस इसे स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है, और अब वह अपने हिस्से को बढ़ाने की मांग कर रही है.
कांग्रेस का यह रवैया महागठबंधन में तनाव का कारण बन रहा है. सीटों के बंटवारे पर अब तक कोई ठोस बातचीत नहीं हो पाई है. केवल दावेदारी और रणनीतिक कूटनीति की बातें हो रही हैं, लेकिन इन बातों से महागठबंधन को कोई ठोस दिशा नहीं मिल रही है.
RJD की स्थिति
RJD, जो महागठबंधन की सबसे बड़ी पार्टी है, अब अपनी स्थिति को लेकर कड़ी चुनौती महसूस कर रही है. तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री बनाने के उनके ख्वाब को सहनी की महत्वाकांक्षाएं और कांग्रेस की रणनीति कमजोर कर रही हैं. तेजस्वी यादव ने महागठबंधन के चुनावों में नेतृत्व किया है, और उनकी स्वीकार्यता भी बढ़ी है, लेकिन अब महागठबंधन के भीतर बैठे कुछ नेता, जैसे अब्दुल बारी सिद्दीकी, सहनी की डिप्टी सीएम की दावेदारी को खारिज कर रहे हैं, जिससे गठबंधन में दरार बढ़ी है.
क्या कोई समाधान मिलेगा?
महागठबंधन के सामने चुनौतियों का पहाड़ है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि कोई समाधान नहीं निकाला जा सकता. सबसे बड़ा सवाल सीट बंटवारे को लेकर है, जिसमें VIP की मांगों को लेकर संतुलन बनाना पड़ेगा. मुकेश सहनी को 60 सीटों की जगह 20-25 सीटें देने और प्रभावशाली क्षेत्रों में प्राथमिकता देने का एक रास्ता हो सकता है. साथ ही, डिप्टी सीएम की कुर्सी देने से सहनी की महत्वाकांक्षाओं को शांत किया जा सकता है, बशर्ते RJD और कांग्रेस इस पर सहमत हो जाएं.
लेकिन इन सब के बीच, कांग्रेस का रुख महागठबंधन की संभावनाओं के लिए एक बड़ा सवाल बन चुका है. राहुल गांधी ने सासाराम में इस मुद्दे पर कोई बयान नहीं दिया, जिससे गठबंधन की स्थिरता और भविष्य को लेकर संशय की स्थिति बनी हुई है. हालांकि, महागठबंधन के लिए रास्ता निकालना संभव है, लेकिन यह बहुत ही कठिन और चुनौतीपूर्ण होगा.